पानी संरक्षित करने की ये विधि अपनाइए, सूखे ट्यूबवेल से भी आने लगेगा पानी

पानी संरक्षित करने की ये विधि अपनाइए, सूखे ट्यूबवेल से भी आने लगेगा पानीग्राउंड वाटर रिचार्ज बोर बनाकर गंगा मित्र बचा रहे पानी 

गाँव कनेक्शन की खास सीरीज 'पानी कनेक्शन' में पानी की समस्या, जल संकट, पानी का दुरुपयोग के साथ ही उन लोगों की बात हो रही है, जो पानी बचाने के लिए प्रयासरत है। इस सीरीज में हम आपको पानी की वास्तविक स्थिति से रू-ब-रू कराने का प्रयास करेंगे। सीरीज की शुरुआत एक सकारात्मक खबर से करते हैं.......

जब पानी खूब बरसता है तो पानी का संकट क्यों ? क्योंकि बारिश का पानी नदियों में बह जाता है। अगर इस पानी में गंदगी हुई, केमिकल हुए तो नदियां दूषित होंगी। यही हाल गंगा का हुआ है। आैद्योगिक कचरे के अलावा खेतों के यूरिया आैर पेस्टीसाइड वाले पानी ने भी गंगा को बहुत दूषित किया है। खेतों का ये पानी साफ होकर गंगा तक पहुंचे, इसके लिए उत्तर प्रदेश में कुछ अनोखा प्रयोग हो रहा है।

खेतों का पानी एक जगह संरक्षित हो जो गंगा में न गिरे, इसके लिए किसानों ने ग्राउंड वाटर रिचार्ज बोर बनाकर सैकड़ों एकड़ भूमि का पानी संरक्षित किया है। ग्राउंड वाटर रिचार्ज बोर से किसान बरसात का करोड़ों लीटर पानी संरक्षित कर रहे हैं, जिससे इसके आसपास की जमीन को सिंचित करने में किसानों को कोई असुविधा नहीं हो रही है।

'नदियों के लिए जीवन, जीवन के लिए नदियां' नाम की मुहिम वर्ष 2012 में वर्ल्ड वाइल्ड फॉउडेशन (डब्लूडब्लूएफ) के द्वारा गंगा और रामगंगा नदी के किनारे लगे हुए जिले छह जिलों के 40 गांव में शुरू की गयी थी, जो अभी भी चल रही है। इस अभियान में चार हजार से ज्यादा ग्रामीण गंगा आैर राम गंगा मित्र बनकर इस अभियान को सफल बना रहे हैं। ये गंगा मित्र जैविक खेती, रिचार्ज बोर, फ़िल्टर चैंबर, जैव विविधता जैसे कई उपायों से गंगा को दूषित होने से बचाने के लिए प्रयासरत हैं।

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इस ग्राउंड वाटर रिचार्ज बोर के द्वारा बरसात का पानी फ़िल्टर होकर जमीन के नीचे जाता है

कानपुर जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर शिवराजपुर ब्लॉक के मुंहपोछा ग्राम पंचायत का तुलापुरवा गांव गंगा के किनारे है। इस गांव में रहने वाले गंगा मित्र सत्यपाल यादव (35) ने रिचार्ज बोर के पास चल रहे ट्यूबवेल की तरफ इशारा करते हुए बताया, "रिचार्ज बोर बनने के बाद सिर्फ यही ट्यूबवेल पानी दे रहा है। आसपास के जो भी पांच-छह ट्यूबवेल थे, सभी से पानी आना बंद हो गया। पहले इसी बोर से पानी बहुत कम निकलता था, रिचार्ज बोर बनने के बाद आसपास 30-40 बीघा खेती का पानी इस रिचार्ज बोर में गिरता है। इससे यहां के ट्यूबवेल में पहले से ज्यादा पानी निकलने लगा है।" सत्यपाल यादव की तरह चार हजार से ज्यादा गंगा मित्र पानी का संरक्षण वालेंटियर कर रहे हैं।

गंगा नदी पांच राज्यों से होकर गुजरती है, जिसमें प्रतिदिन उत्तराखंड में लगभग 44 करोड़ लीटर उत्तर प्रदेश में 327 करोड़ लीटर, बिहार में 40 करोड़ लीटर और पश्चिम बंगाल में 178 करोड़ लीटर सीवेज और फैकि्ट्रयों का प्रदूषित पानी गिरता है। इसके साथ ही भारी मात्रा में खेतों में प्रयुक्त रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों वाला पानी भी गंगा में जाता है, जिससे जलीव- जीवों को नुकसान पहुंचता है। सरकार की योजना नमामि-गंगे के अलावा कुछ अन्तर्राष्ट्रीय गैरसरकारी संस्थाएं किसानों के साथ मिलकर गंगा को स्वच्छ करने का अभियान चला रही हैं, जिसमें डब्लूडब्लूएफ एक है।

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एक ग्राउंड वाटर रिचार्ज बोर को बनाने में तीस से चालीस हजार रुपए होते हैं खर्च

गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकारी कोशिशों के साथ-साथ ग्रामीणों ने अपने स्तर पर नई पहल शुरू की है। डब्लूडब्लूएफ ने पहले चरण में 2007 से 2012 में हरदोई और कानपुर जिले में जीवन अभियान की शुरुआत की थी, इसके बाद 2012 में 'नदियों के लिए जीवन, जीवन के लिए नदियां' नाम की मुहिम शुरू की।

जिसमें उत्तर प्रदेश के छह जिले बिजनौर, मुरादाबाद, बरेली, शाहजहांपुर, कानपुर और फतेहपुर शामिल हैं। इन जिलों में पानी को संरक्षित करने के लिए डब्लूडब्लूएफ के सहयोग से किसानों ने 55 रिचार्ज बोर बनाये हैं। जिससे लगभग दो हजार बीघा खेतों का पानी करोड़ों लीटर इस रिचार्ज बोर में संरक्षित होता है।

डब्लूडब्लूएफ प्रोजेक्ट से राजेश वाजपेयी बताते हैं, "इन रिचार्ज बोर बनाने का उद्देश्य यह है कि गाँव का पानी गाँव में ही रहे, बरसात का पानी इस रिचार्ज बोर से फिल्टर होकर जमीन के नीचे जाए जिससे वाटर लेवल ऊंचा बना रहे। एक रिचार्ज बोर के 500 रेडियस तक जितने भी खेत हैं सभी का पानी इसमें गिरता है। इससे किसानों को सिंचाई करने में असुविधा नहीं होती है।"

वो आगे बताते हैं, "गंगा नदी के किनारे कम से कम 29 बड़े शहर, 70 कस्बे और हजारों गाँव स्थित हैं, अगर सभी लोग मिलकर गंगा को निर्मल बनाने के अभियान में शामिल होंगे तभी हम इन गंगा के प्रदूषित आंकड़ों को कम कर सकते हैं। गंगा और रामगंगा नदी के किनारे के छह जिलों में स्थानीय लोगों के साथ मीटिंग करके उनसे वालेंटियर गंगा मित्र बनने का निवेदन किया। जिसमें चार हजार लोग जुड़े जो अपने-अपने स्तर पर इस अभियान को गति दे रहे हैं।"

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गांव में बैठक करके बनाए जाते हैं गंगा मित्र

किसानों ने कम किया रसायनों का इस्तेमाल

सीताराम मानाताला गाँव गंगा के किनारे बसा है। इस गाँव में रहने वाले विपिन तिवारी (37 वर्ष) बताते हैं, "गंगा के करीब खेतों और गाँव का सारा गंदा पानी सीधे नदी में जाता है। इस प्रदूषित पानी को सीधे गंगा नदी में जाने से रोकने के लिए हम लोगों ने गंगा किनारे के खेतों में रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग करना बहुत कम कर दिया। जो रासायनिक खेती कर भी रहे हैं उनका पानी सीधे गंगा में न गिरे इसके लिए रिचार्ज बोर बनाया है।"

वो आगे बताते हैं, "घर की मूर्तियाँ गंगा में न फेककर गड्ढा खोदकर उनका विसर्जन करते हैं जिससे गंगा में हम लोगों की वजह से कम से कम गंदगी गिरे। इससे बहुत बड़ा परिवर्तन तो नहीं हो सकता पर ये परिवर्तन की एक छोटी सी शुरुवात है।"

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ग्रामीणों के वालेंटियर सहयोग से बनाया जाता है यह ग्राउंड वाटर रिचार्ज बोर

तीस से चालीस हजार रुपए में ऐसे बनता है रिचार्ज बोर

एक रिचार्ज बोर 30 से 40 हजार रुपए की लागत में बन जाता है। जहां पर खेतों का ढलान होता है वहां एक गढ्ढा खोदा जाता है। जो दो मीटर लम्बा, दो मीटर गहरा, एक मीटर चौड़ा होता है। इसको चारो तरफ पक्का करके बीचो बीच एक दीवार बना दी जाती है। एक आठ से दस फीट लम्बा पाइप जिसकी मोटाई चार इंच की हो। एक गड्ढे में एक से दो इंच का पाइप दबा देते हैं।

एक गड्ढे में पानी संरक्षित होता है, दूसरे गड्ढे में अमरुद के आकार में करीब 70 प्रतिशत रोड़ी डाल दी जाती है। 20 फीसदी आरसीसी गिट्टी, 10 प्रतिशत मौरंग डालते हैं। इसमें एक फ़िल्टर मीडियम लगाया जाता है। रिचार्ज बोर से पांच से सात फीट की दूरी पर 200 मीटर की बोरिंग कराई जाती है। चार से पांच इंच पाइप की मदद से इसे उस रिचार्ज बोर से जोड़ दिया जाता है। इन दोनों गड्ढों को सीमेंटेड ढक्कन से ढक दिया जाता है।

एक गड्ढे में खेतों का पानी सीधे गिरता है दूसरे में फ़िल्टर होकर जमीन के नीचे जाता है, बरसात का पानी बर्वाद नहीं होता है, जिससे जमीन का जलस्तर बेहतर होता है और इससे किसानों को सिंचाई करने में कोई असुविधा नहीं होती है।

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