इन होनहारों ने नासा में लहराया परचम, बनाया सैटेलाइट के लिए विश्व का पहला सोलर पॉवर बैकअप

इन होनहारों ने नासा में लहराया परचम, बनाया सैटेलाइट के लिए विश्व का पहला सोलर पॉवर बैकअपमिनी सैटेलाइट बनाया जिसे चलाने के लिए उन्होंने सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया।

लखनऊ। विज्ञान की दुनिया में हमारे युवा कितनी तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं हाल ही में लखनऊ के दो होनहारों ने ये साबित किया है। लखनऊ के प्रद्युम्न नारायण तिवारी और देवर्षि दीक्षित व उनकी टीम ने एक ऐसा मिनी सैटेलाइट बनाया जिसे चलाने के लिए उन्होंने सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया। जब प्रद्युम्न की 23 सदस्यों की टीम एस्ट्रॉल (देहरादून की यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज की टीम) ने नासा के वैज्ञानिकों के सामने सोलर एनर्जी से ये मिनी सैटेलाइट उड़ाकर दिखाया तो वे भी भारत के युवाओं की प्रतिभा का लोहा मान गए। इस प्रोजेक्ट की खास बात यह थी कि विश्व में पहली बार सैटेलाइट को चलाने में सोलर एनर्जी का इस्तेमाल किया गया था।

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गाँव कनेक्शन ने जब प्रद्युम्न से उनकी इस उपलब्धि के बारे में जानना चाहा तो प्रद्युम्न ने बताया कि आने वाले दिनों में हमारी इस टेक्नोलॉजी का बड़े स्तर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। प्रद्युम्न बताते हैं कि नासा पिछले 19 सालों से वैश्विक स्तर पर एक कॉम्पटीशन आयोजित कराता है जिसका नाम एनुअल कैन्सेट कॉम्पटीशन है।

ये था नासा का चैलेंज

प्रद्युम्न बताते हैं कि इस बार नासा का चैलेंज था एक सेंसर पेलोड डिजाइन करना जो एक ग्रहीय वातावरण (Planetary atmosphere) में हवा का दबाव, तापमान, गति व बाकी डाटा नीचे ट्रांसमिशन स्टेशन को भेजता है। साथ ही इसमें पॉवर सप्लाई के लिए सोलर पॉवर का इस्तेमाल करना था। इससे पहले पॉवर सप्लाई के लिए सिर्फ बैटरी का ही इस्तेमाल होता था।

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इस तरह बनाया प्रोजेक्ट

प्रद्युम्न बताते हैं कि हमारी टीम ने सैटेलाइट के ऊपरी हिस्से में सोलर पैनल लगाए। पॉवर सप्लाई में कोई रुकावट न आए इसके लिए हमने ग़ाज़ियाबाद की एक कंपनी से सुपर कैपेसेटर लिए और इन सुपर कैपेसेटर का इस्तेमाल इस मॉड्यूल में किया। यह कैपेसेटर सौर ऊर्जा से खुद को बहुत तेज चार्ज करता है और वह सभी सेंसर व उपकरणों को ज़रूरत के मुताबिक पावर सप्लाई भी करता रहता है। साथ ही यह आसमान में किसी भी वजह से सूरज की रोशनी कम होने पर पॉवर में रुकावट नहीं आने देता।

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इतनी टीमें हुईं शामिल

इस प्रतियोगिता के शुरुआती चरण में 93 देशों की टीम हिस्सा लेती हैं जिनका प्रोजेक्ट नासा टेलीकॉन्फ्रेंसिंग के जरिए देखता है। इसमें से 40 देशों की टीम को चुना जाता है। टेलीकॉन्फ्रेंसिंग के पहले चरण प्री डिजाइन रिव्यू में प्रद्युम्न की टीम एस्ट्रॉल को दूसरा स्थान प्राप्त हुआ और वह 40 देशों की लिस्ट में शामिल हो गई। इसके बाद के चरण में एस्ट्रॉल टीम को पहला स्थान मिला। इसके बाद इस टीम को अमेरिका के टेक्सास में लाइव डेमो के लिए बुलाया गया और इस आखिरी चरण में एस्ट्रॉल टीम ने बाज़ी मार ली। तीन दिवसीय प्रतियोगिता 9 जून को शुरू हुई। तीन चरण की परीक्षा में टीम एस्ट्राल को 100 प्रतिशत सफलता हासिल हुई। टीम की कामयाबी पर नासा ने 12 जून को सम्मानित किया।

एस्ट्रॉल टीम में ये थे शामिल

उनकी टीम में एरोस्पेस इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर साइंस इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रानिक्स इंजीनियरिंग, मैटेरियल साइंस इंजीनियरिंग, इंस्टुमेंटेशन व कंट्रोल इंजीनियरिंग तथा डिजाइन स्टडीज के 23 छात्र शामिल थे। ये छात्र देवऋर्षि दीक्षित, प्रद्युम्न नारायण तिवारी, मृदुल सेनगुप्ता, मोनिका शर्मा, अनमोल अग्रवाल,विपुल मणि, राघव गर्ग, अर्पित जैन, सुदर्शन पार्थसंथी, मीनाक्षी तलवार, राहुल राज, अक्षय वर्मा, आयुष अग्निहोत्री, कविता वेनुगोपालन, विभोर कर्नावत, पूजा, उत्सव नंगालिया, ताविशी गुप्ता, एन. अदिथियान, संदीप जंगिद, प्रितिश कुमार राज, अंशिका अबसोलोम, प्रतिभा मोवानी शामिल थे। इन्होंने की मदद टीम को संस्थान के संकाय सलाहकार डा. उगुर गुवेन, टीम मैनेजर जोजिमस डी. लाबाना, डा. पीयूष कुच्छल, सौम्यजित घोषाल, सावरकर ने मार्गदर्शन किया।

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