गांव को 'खुले में शौच मुक्त' करने के लिए इस युवा ने उठाया ये कदम

नौकरी छोड़ लड़ा प्रधान का चुनाव, प्रधान चुनकर गांव को किया खुले में शौच मुक्त, बदल रहा गांव की तस्वीर

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   13 Dec 2018 9:55 AM GMT

गांव को खुले में शौच मुक्त करने के लिए इस युवा ने उठाया ये कदम

जौनपुर। जहां सोच वहां शौचालय। इस बात को साबित किया है नेवादा काजी के युवा प्रधान ने। प्रधान के अथक प्रयास से पूरा गांव खुले में शौच मुक्त हो चुका है। गांव के विकास के लिए इस युवा प्रधान ने अपनी अच्छी खासी नौकरी भी छोड़ दी।

विकास खंड बक्सा के गांव नेवादा काजी के युवा प्रधान अमित सिंह ने बताया, " जब मैं प्रधान नहीं चुना गया था उस समय मेरे गांव की एक किशोरी खुले में शौच गई थी। वहां उसे सांप ने काट लिया जिससे उसकी मौत हो गई। इस बात ने मुझे काफी परेशान किया। मैंने सोचा कि अगर उस किशोरी के घर में शौचालय होता तो उसकी मौत शायद न होती। तभी मैंने निश्चय किया कि अपने गांव के हर घर में शौचालय बनवा कर रहूंगा। वर्ष 2015 में प्रधानी का चुनाव हो रहा था, कुछ लोगों के कहने पर मैं भी प्रधानी के लिए खड़ा हो गया और प्रधान चुन लिया गया। प्रधान चुनने से पहले मैं कई अच्छी कंपनियों में नौकरी कर चुका था। प्रधान चुनने के बाद मुझे नौकरी छोड़नी पड़ी। "

ये भी पढ़ें: दिव्यांग बेटी के लिए मां ने पाई-पाई जोड़ तीन साल में बनवाया शौचालय


10 या 15 घरों में शौचालय बना हुआ था

अमित ने आगे बताया, " 330 घरों वाले मेरे गांव में उस समय मुश्किल से 10 या 15 घरों में शौचालय बना हुआ था। गांव के सभी लोग खुले में शौच जाते थे। खुले में शौच जाने के दौरान अक्सर किसी को जहरीले कीड़े काटने और सांप काटने के मामले आते रहते थे। ग्रामीण इस बात को बहुत हल्के में लेते थे। लेकिन मैंने यह निश्चय कर लिया था कि अपने गांव को खुले में शौच मुक्त करा के रहूंगा। "

ये भी पढ़ें: खुले में शौच नहीं जाना चाहती थी चमेली, सरकारी मदद का इंतजार किए बिना बनाया कपड़े का शौचालय


अमित ने इसे मिशन के रूप में लिया। अमित ने गांव के लोगों के साथ बैठक की और अपने घरों में शौचालय बनाने की बात कही। अमित ने ग्रामीणों को खुले में शौच जाने के दौरान होने वाली परेशानियों और बीमारियों का हवाला दिया। लेकिन ज्यादातर ग्रामीणों ने रुपये का हवाला देकर शौचालय न बनाने की बात कही। इस पर अमित ने ग्रामीणों को खुद के पास से पैसे दिए शौचालय बनवाने के लिए। कुछ दिन के अंदर ही गांव के लोग आगे आए और 1 9 0 शौचालय बन गए। "


महिलाओं का मिला पूरा सहयोग

अमित ने बताया, " शुरुआत में ग्रामीणों को समझाने में बहुत दिक्कत हुई, लेकिन गांव की महिलाओं का मुझे काफी सहयोग मिला। खुले में शौच जाने की सबसे अधिक कीमत महिलाओं को ही चुकानी पड़ती थी, इसलिए महिलाओं ने आगे आकर मेरे मिशन में काफी मदद की। महिलाओं ने गांव में रैली निकाली, खुद गडढ़े खोदे। पंचायत को खुले में शौच मुक्त कराने के लिए पुष्पा और वंदना ने उनका साथ दिया। दोनों महिलाएं हर सुबह एक टोली में निकल कर गाँव के लोगों को खुले में शौच के खिलाफ जागरुक करतीं। अगर कहीं कोई जरूरत महसूस होती तो प्रधान जी से बोलकर उसे पूरा करने के लिए कहती हैं।"

ये भी पढ़ें: जहां नहीं पहुंची बिजली वहां पहुंचा शौचालय


गांव की पुष्पा देवी (45 वर्ष) ने बताया, " खुले में शौच करने में सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं को होती है। घर में शौचालय न हो तो उन्हें हर दिन सूर्योदय होने से पहले-पहले गांव से बाहर जाना होता है। दिन में जरूरत हो तो पेट पकड़ कर बैठे रहो और मनचलों की छेड़खानी अलग से सहो। यह सब बात मुझे काफी परेशान करती थी, लेकिन किसी का सहयोग नहीं मिलता था। लेकिन जबसे युवा प्रधान अमित आगे आए मुझे काफी अच्छा लगा। मैंने महिलाओं की एक टीम बना ली जो इस परेशानी से जूझ रही थीं। कई महिलाएं आगे आईं और हमारा सहयोग किया।"

ये भी पढ़ें:शौचालय न होने पर पत्नी के साथ ससुराल जाना छोड़ा


कम हो गई ग्रामीणों की बीमारी

अमित ने बताया, " जब तक लोगों के घरों में शैाचालय नहीं बना था, लोग काफी बीमार पड़ते थे। आए दिन लोग मेरे पास मेरी गाड़ी मांगने आते थे। पूछने पर पता चलता कि उनके घर का कोई बीमार है उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाना है, अपनी गाड़ी दे दीजिए। लेकिन जब से मेरा गांव खुले में शौच मुक्त हुआ है लोग बहुत कम बीमार पड़ते हैं। अब दो-तीन महीने में काई मुश्किल से गाड़ी मांगने आता है।"

ये भी पढ़ें: बेटी की शौचालय बनवाने की जिद पर पिता को गर्व


More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top