Jharkhand: औषधीय खेती और वनोपज से महिलाओं को मिल रहा अच्छा बाजार

वर्षों से बंजर पड़ी जमीन में ग्रामीण महिलाएं औषधीय खेती करके किसानों का भरोसा वापस ला रही हैं।

Neetu SinghNeetu Singh   15 Oct 2019 6:05 AM GMT

गुमला (झारखंड)। वर्षों से खाली पड़ी जिस बंजर जमीन से किसानों का भरोसा उठ गया था आज उसी जमीन पर यहाँ की महिला किसान औषधीय खेती कर रही हैं। औषधीय खेती और वनोपज से निकलने वाले उत्पादों को ये ग्रामीण सेवा केंद्र पर बेचकर अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं।

अपने लेमन ग्रास के खेत में खड़ी दूर तक हरे-भरे खेत की तरफ इशारा करते हुए विमला उराँव (43 वर्ष) बताती हैं, "ये दूर तक जिस खेत में आज घास लगी है ये खेत कल तक खाली पड़े रहते थे। उत्पादक समूह से जुड़ने के बाद 15 महिलाओं के एक समूह ने मिलकर पहली बार खाली पड़ी जमीन में 15 एकड़ जमीन में लेमन ग्रास लगाई है। ये पहला साल था अभी दो बार ही कटिंग हुई है। इस बार 15000 रुपए का मुनाफा हुआ है।"

वो आगे बताती हैं, "आज इस बंजर जमीन में लेमन ग्रास को हरा-भरा देखकर आसपास के लोग बहुत खुश हैं। इसे देखकर उनमें ये भरोसा हो गया है कि दूसरी खाली पड़ी जमीन में भी इसे लगाया जा सकता है।"

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विमला गुमला जिला मुख्यालय से लगभग 65 किलोमीटर दूर विशुनपुर प्रखंड के बेती गाँव की रहने वाली हैं। वर्ष 2017 में ये चमेली आजीविका सखी मंडल की सदस्य बनीं। महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना के अंतर्गत बनने वाले उत्पादक समूह में इस गाँव की सखी मंडल की महिलाएं वर्ष 2018 में जुड़ीं। उत्पादक समूह से जुड़ने के बाद विमला समेत 15 महिलाओं ने सामूहिक रूप से मिलकर जमीन के कुछ हिस्से में लेमन ग्रास लगाई। धीरे-धीरे इसे बढ़ाकर 15 एकड़ बंजर जमीन में कर लिया है। इस लेमन ग्रास को बेहतर बाजार भाव मिल सके इसके लिए परियोजना के अंतर्गत विशुनपुर प्रखंड में ग्रामीण सेवा केंद्र बनाया गया है। जहाँ पर 18 उत्पादक समूह की लगभग 1300 महिलाएं औषधीय खेती और वनोपज से निकलने वाले उत्पाद यहाँ आकर बेचती हैं।


इस ग्रामीण सेवा केंद्र को चलाने वाली उत्पादक समूह की 12 महिलाएं ही हैं जो विभिन्न पदों की जिम्मेदारी सम्भालते हुए इस केंद को बेहतर तरीके से संचालित कर रही हैं। ग्रामीण सेवा केंद्र की अध्यक्ष सुमित्रा देवी (28 वर्ष) बताती हैं, "हर उत्पादक समूह में 50-55 सदस्य हैं। सभी महिलाएं पशुपालन, औषधीय खेती और वनोपज से निकलने वाले सभी उत्पाद यहाँ बेचती हैं। यहाँ आये उत्पादों का हम 12 दीदी मिलकर लेमन ग्रास प्रोसेसिंग यूनिट मशीन से तेल निकालते हैं इसके बाद सीधे बाजार पहुंचाते हैं।"

वो आगे बताती हैं, "इस क्षेत्र में पानी की बहुत समस्या है। यहाँ सैकड़ों एकड़ खाली पड़ी बंजर जमीन में अब यहाँ की महिलाएं तुलसी और लेमनग्रास की खेती करने लगी हैं। ये लेमनग्रास और तुलसी यहाँ बेचती हैं जिसका तेल निकालकर हम बाजार में या सरस मेला में बेचते हैं। उसी तरह जंगलों से निकलने वाले जिन उत्पादों को कल तक कोई पूंछता नहीं था आज उसे भी ग्रामीण सेवा केंद्र में लाकर महिलाओं को अच्छा भाव दिया जा रहा है।" इन महिलाओं का कहना है अभी बहुत ज्यादा हानि-मुनाफा नहीं बताया जा सकता लेकिन इतना जरुर कहा जा सकता है कि अब खाली पड़ी बंजर जमीन में खेती होने लगी है और वनोपज उत्पादों का सही दाम मिलने लगा है।

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देशभर में महिला किसानों के लिए चल रही महत्वाकांक्षी योजना महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना के अंतर्गत औषधीय खेती और वनोपज पर खास जोर दिया जा रहा है। राज्य में मुनगा, लाह, इमली, हर्र, बहेरा, चिरौंजी, करंज, कुसुम जैसे वनोपज की भरमार है। इन उत्पादों को महिलाएं सामूहिक एकत्रीकरण करें और उसका प्रोसेसिंग हो जिससे बाजार में अच्छा भाव मिल सके ये परियोजना इस पर ध्यान दे रही है।

कृषि विज्ञान केंद्र विकास भारती विशुनपुर गुमला के वरीय वैज्ञानिक एवं प्रधान डॉ संजय कुमार बताते हैं, "कृषि विज्ञान केंद्र जेएसएलपीएस के साझा प्रयास से सखी मंडल की महिलाओं को सशक्त करने की कोशिश है। जो जमीन खेती योग्य नहीं थी उसे खेती योग्य बनाकर उसमें खेती करवाई जा रही है। जंगलों से निकलने वाले जिन उत्पादों को कल तक कोई नहीं पूंछता था उन उत्पादों को अब अच्छा बाजार दिया जा रहा है।"

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लेमनग्रास ऐसी औषधीय है जिसे एक बार खेत में लगा दिया जाए तो छह साल तक साल में दो से तीन बार घास की कटिंग कर सकते हैं। ये घास बंजर जमीन में हो सकती है। ये बरसाती पानी और जमीन की नमीं से हो जाती है इसमें अतिरिक्त पानी की जरूरत नहीं पड़ती। लेमन ग्रास की खेती में किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक की जरूरत नहीं पड़ती। लेमन ग्रास का दो बूँद तेल गुनगुने पानी में मिलाकर पीने से सर्दी, बुखार और खांसी होने पर आराम मिल जाता है। पोछा लगाने पर इस तेल को डालने से अच्छी सुगंध आती है।


500 किलो लेमन ग्रास में 12-13 लीटर तेल निकलता है। एक लीटर तेल का दाम 1200-1600 रुपए है। इस फसल को जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते। बरसात का के आलावा अगर बीच में एक पानी और मिल जाए तो चार बार घास की कटिंग हो सकती हैं। वैसे सामान्यतया दो से तीन बार हो जाती है। ठीक इसी प्रकार तुलसी भी साल में तीन से चार बार लगा सकते हैं। वनोपज और इन फसलों में किसानों की लागत मामूली होती है। किसान को सिर्फ इसमें मेहनत करना पड़ता है।

सरस्वती आजीविका महिला समूह नवागढ़ की अध्यक्ष कलावती देवी (30 वर्ष) बताती हैं, "गाँव में हम लोगों को पहले ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाती थी इसलिए कभी कुछ करने के बारे में सोचा नहीं। उत्पादक समूह बनने के बाद जब महिलाओं को सामूहिक खेती के बारे में जानकारी मिले वनोपज से निकलने वाले उत्पादों की विशेषता बताई गयी तब महिलाएं आज इसका सही उपयोग कर पा रही हैं।" वो बताती हैं, "पिछली बार तुलसी का तेल नहीं निकाल पाए थे तो 600 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बीज ही बेच दिया था। हर्र का त्रिफला बनाकर बेचते हैं। पहले चिरौंजी खाकर उसका बीजा फेक देते थे अब उसको सुखाकर बीजा निकालते हैं।"

ग्रामीण सेवा केंद्र के पास में ही लगे मेडिशनल हर्बल बगीचा के बारे में गुमला कृषि विज्ञान केंद्र के उद्यान वैज्ञानिक डॉ सुनील कुमार ने बताया, "इस बगीचे में 101 तरह की जड़ी बूटियाँ लगी हैं। यहाँ किसानों को लाकर प्रशिक्षण दिया जाता है जिससे ये यहाँ से सीखकर अपने आसपास खेती करें। इन जड़ी-बूटियों का बीमारी से लेकर कास्मेटिक और खाने के उत्पाद में भी उपयोग किया जाता है। जैसे यहाँ सतावर का जैम बनता है।"

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ग्रामीण सेवा केंद्र पर लगी लेमन ग्रास की प्रोसेसिंग यूनिट से तेल निकालने का काम भी महिलाएं ही करती हैं। उत्पादक समूहों की ये खास विशेषता है कि यहाँ खेत में उत्पादन से लेकर बाजार पहुँचाने तक का पूरा काम महिलाएं ही करती हैं। चमेली आजीविका सखी मंडल की अध्यक्ष रुक्मती देवी (32 वर्ष) बताती हैं, "हम दीदी लोग लखनऊ सीमैप से सीखकर आये हैं। अब आग झोकने से लेकर तेल पैकेजिंग तक का काम खुद ही कर लेते हैं। समूह की 12 दीदी रोज काम करने आती हैं बाकी दीदी खेती पशुपालन और जंगल से औषधियां लाकर यहाँ जमा करती हैं। अब उन्हें बाजार के लिए भटकना नहीं पड़ता है।"

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कृषि विज्ञान केंद्र गुमला के मृदा वैज्ञानिक नीरज कुमार वैश्य ने बताया, "यहाँ की महिलाएं बदलाव का दूसरा नाम हैं। ताड़ जमीन यहाँ हमेशा से खाली रहती थी। अब ये महिलाएं लेमन ग्रास और तुलसी लगाने लगी हैं। अब इन्हें बाजार के लिए इन्हें सोचना नहीं पड़ता है। ग्रामीण सेवा केंद्र पर खरीद और बिक्री करने वाली महिलाएं ही हैं।" झारखंड का ये पहला ग्रामीण सेवा केंद्र नहीं है। जहाँ ये परियोजना चल रही है वहां सैकड़ों की संख्या में ये ग्रामीण सेवा केंद्र चल रहे हैं। जहाँ उत्पादक समूह की कुछ महिलाओं को न केवल हर दिन काम मिलता है बल्कि उत्पादक समूह से जुड़ी सैकड़ों महिलाओं को उनके उत्पादों का वाजिब दाम भी मिलता है।

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