Budget 2026: Agriculture से Agripreneurship की राह, तकनीक, रोजगार और उद्योग से जुड़ेगी खेती

Gaon Connection | Feb 01, 2026, 16:50 IST
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Budget 2026 Updates: इस बजट में सरकार की सोच थोड़ी बदलती हुई दिखाई देती है। इस बार कृषि को सीधे पैसे और सब्सिडी के ज़रिए नहीं, बल्कि तकनीक, उद्योग और रोजगार से जोड़कर आगे बढ़ाने की बात है। सरकार कृषि को अलग सेक्टर नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक बदलाव का हिस्सा मान रही।

India Union Budget 2026: केंद्रीय बजट 2026 को पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे “Aspiration to Achievement” और “Yuva Shakti driven Budget” बताया। सरकार का दावा है कि यह बजट भारत को अगले विकास स्तर पर ले जाएगा। लेकिन खेती, किसानी और किसानों के नजरिए से देखें तो तस्वीर थोड़ी अलग दिखती है।



कृषि विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद कुमार जोशी मानते हैं कि यह बजट सीधे तौर पर किसान-केंद्रित कम और अर्थव्यवस्था के ढांचे को बदलने वाला बजट ज्यादा है। उन्होंने गाँव कनेक्शन से बातचीत में कहा, “इस बार सरकार का फोकस खेती से ज़्यादा मैन्युफैक्चरिंग और MSMEs को मजबूत करने पर है।” उनके मुताबिक बजट की दिशा यह संकेत देती है कि सरकार कृषि को अब अलग सेक्टर नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक बदलाव का हिस्सा मान रही है।



अगर बजट 2025 को याद करें, तो उस समय कृषि पूरी तरह केंद्र में थी। दालों के लिए पल्स मिशन, तिलहन के लिए ऑयल सीड मिशन, धन-धान्य योजना, प्राकृतिक खेती और मोटे अनाज जैसे कई बड़े ऐलान उसी बजट में हुए थे। सरकार का मकसद साफ था, खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना और किसानों की आय बढ़ाना। डॉ. प्रमोद कुमार बताते हैं, “पिछले साल का बजट खेती के लिए था। उसमें सरकार ने साफ तौर पर कहा था कि हमें उत्पादन बढ़ाना है और आयात पर निर्भरता घटानी है।” उनके अनुसार, 2025 के बजट में सरकार ने सीधे किसानों की समस्याओं को संबोधित किया था, जबकि इस बार रणनीति बदली हुई नजर आती है।



बजट 2026 में सरकार की सोच थोड़ी बदलती हुई दिखाई देती है। इस बार कृषि को सीधे पैसे और सब्सिडी के जरिए नहीं, बल्कि तकनीक, उद्योग और रोजगार से जोड़कर आगे बढ़ाने की बात है। डॉ. प्रमोद गांव कनेक्शन से बताते हैं, “सरकार अब खेती को एग्रीकल्चर से एग्री-एंटरप्रेन्योरशिप में बदलना चाहती है। MSMEs का बड़ा हिस्सा खेती से जुड़ा है, अगर वहां वैल्यू एडिशन होगा तो रोजगार भी बढ़ेगा और किसानों की आमदनी भी।” उनका मानना है कि सरकार चाहती है कि खेती सिर्फ आजीविका न रहे, बल्कि उससे जुड़े छोटे उद्योग, प्रोसेसिंग यूनिट और सर्विस सेक्टर मजबूत हों।



इस बजट में कृषि से जुड़ा पहला बड़ा कदम ‘भारत विस्तार’ के रूप में सामने आया है। यह एक मल्टीलिंगुअल, AI आधारित एग्री टूल है जिसे ICAR हर क्षेत्र के हिसाब से तैयार करेगा। इसके जरिए किसानों को फसल की योजना, मौसम की चेतावनी, कीट और बीमारी से बचाव, मिट्टी की जानकारी और बाजार भाव जैसी जानकारियां मिलेंगी। डॉ. प्रमोद कुमार कहते हैं, “यह रिसर्च को सीधे किसान तक ले जाने की कोशिश है। इससे किसान बेहतर फैसला ले पाएगा और उसका रिस्क कम होगा चाहे बीमारी का हो, मौसम का हो या दाम गिरने का।” वे मानते हैं कि यह पहल सही दिशा में है क्योंकि इससे वैज्ञानिक जानकारी खेत तक पहुंचेगी।



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बजट 2026 (India Budget 2026) का दूसरा बड़ा फोकस उच्च मूल्य वाली फसलों के विविधीकरण पर है। नारियल, चंदन और काजू जैसी फसलों को तटीय इलाकों में तथा बादाम जैसी फसलों को पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ावा देने की बात कही गई है। इस पर डॉ. प्रमोद कुमार कहते हैं, “हाई वैल्यू एग्रीकल्चर की दिशा सही है, लेकिन इसका दायरा अभी सीमित है। इसे और बड़े स्तर पर ले जाने की जरूरत है।” उनके अनुसार, अगर सरकार वास्तव में किसानों की आय बढ़ाना चाहती है, तो इस तरह की फसलों को बड़े पैमाने पर बाजार और निर्यात से जोड़ना होगा।



तीसरा क्षेत्र पशुधन और ग्रामीण आजीविका से जुड़ा है। छोटे किसान और भूमिहीन मजदूर जो गाय, भैंस, बकरी या मुर्गी पालन करते हैं, उनके लिए FPO और वैल्यू चेन विकास पर जोर दिया गया है। डॉ. जोशी का मानना है कि “लाइवस्टॉक सेक्टर गरीब और छोटे किसानों के लिए सबसे बड़ा सहारा है, इसे मजबूत करना सही कदम है।” वे कहते हैं कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन की भूमिका को अक्सर कम आंका जाता है, जबकि यही सेक्टर संकट के समय किसानों को संभालता है।



हालांकि, डॉ. प्रमोद कुमार जोशी इस बजट में कुछ बड़ी चूकों की ओर भी इशारा करते हैं। वे साफ कहते हैं, “सबसे बड़ी मिस्ड अपॉर्चुनिटी सब्सिडी सुधार की है।” उनका कहना है कि फर्टिलाइजर सब्सिडी पर भारी खर्च हो रहा है, जिससे न सिर्फ बजट पर दबाव बढ़ता है बल्कि मिट्टी और पानी भी खराब हो रहे हैं। “अगर हम प्रिसीजन और सस्टेनेबल एग्रीकल्चर को इंसेंटिव देते, तो किसान खुद कम फर्टिलाइजर की ओर जाते और सब्सिडी अपने आप घट जाती, ”वे जोड़ते हैं। उनके मुताबिक यह मुद्दा इकोनॉमिक सर्वे में भी सामने आया था, लेकिन बजट में इस पर ठोस कदम नहीं दिखे।



फल उत्पादन और प्रोसेसिंग को लेकर भी वे निराशा जताते हैं। डॉ. प्रमोद कहते हैं, “अगर हम फलों की वैल्यू चेन और प्रोसेसिंग पर ध्यान देते, तो यूरोप, यूके और आसियान देशों में बड़े पैमाने पर निर्यात हो सकता था। सिर्फ प्रोडक्शन नहीं, प्रोसेसिंग भी उतनी ही जरूरी है।” उनका मानना है कि फल उत्पादन भारत के लिए एक बड़ा अवसर है, जिसे इस बजट में पूरी तरह नहीं पकड़ा गया।



इसके अलावा, प्राइस इंश्योरेंस और कोऑपरेटिव मार्केटिंग पर भी उन्हें कमी महसूस होती है। उनके अनुसार, “हम प्रोडक्शन तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन जैसे ही पैदावार बढ़ती है, दाम गिर जाते हैं। प्राइस इंश्योरेंस किसान के लिए सुरक्षा कवच हो सकता था।” वहीं कोऑपरेटिव मार्केटिंग पर वे कहते हैं, “अगर किसान मिलकर मार्केटिंग करें तो उन्हें बेहतर दाम मिल सकते हैं, लेकिन इस बजट में उस पर जोर नहीं दिखा।”



आखिर में डॉ. प्रमोद जोशी कहते हैं, “यह बजट खेती के लिए पिछले साल जितना मजबूत नहीं है, लेकिन सरकार की रणनीति यह है कि लोगों को धीरे-धीरे खेती से निकालकर मैन्युफैक्चरिंग और MSMEs में लाया जाए। अगर यह सही तरीके से हुआ, तो इसका अप्रत्यक्ष फायदा खेती को मिलेगा।” उनके मुताबिक, भारत को अगर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कृषि बनाना है, तो आने वाले बजटों में सस्टेनेबिलिटी, मूल्य सुरक्षा और प्रोसेसिंग को केंद्र में रखना ही होगा।

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