किसानों के लिए कैसा है Union Budget 2026 क्या कहते हैं कृषि विशेषज्ञ
केंद्रीय बजट 2026 को पेश करते हुए सरकार ने इसे "Aspiration to Achievement" और "Yuva Shakti driven Budget" बताया। सरकार का दावा है कि यह बजट भारत को विकास के अगले पायदान पर ले जाएगा। लेकिन कृषि और किसानों के नज़रिए से देखें तो तस्वीर उतनी उत्साहजनक नहीं है। गाँव कनेक्शन ने कृषि नीति विश्लेषक देविंदर शर्मा से बात की कि ये बजट किसानों के लिए कितना अलग है?
कृषि नीति विश्लेषक देविंदर शर्मा का मानना है कि यह बजट एक स्पष्ट संदेश देता है की कृषि, खाद्य और खाद्य सुरक्षा को देखने की सोच पूरी तरह बदल चुकी है। देविंदर शर्मा ने गाँव कनेक्शन से कहते हैं, "अब एग्रीकल्चर, फूड और फूड सिक्योरिटी की जो सोच है, वह शिफ्ट हो गई है। अब फोकस चला गया है वैल्यू एडिशन और कैश क्रॉप्स पर। खेती और फूड सिक्योरिटी पीछे छूट गई है।"
नीति में आया बुनियादी बदलाव
देविंदर शर्मा के अनुसार यह परिवर्तन अचानक नहीं, बल्कि लंबे समय से बनती नीति का नतीजा है। पहले सरकार की प्राथमिकता अनाज, दालें और खाद्य सुरक्षा हुआ करती थी, लेकिन अब ध्यान मूल्य संवर्धन, नकदी फसलों और नई तकनीक पर केंद्रित हो गया है। ऐसे समय में जब किसानों की हालत पहले से कमज़ोर है, कृषि को इस तरह पीछे धकेलना गंभीर चिंता का विषय है।देविंदर शर्मा ने अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा, "OECD की रिपोर्ट कहती है कि भारत में किसानों को सन 2000 से लेकर 2025 तक 111 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।" यह आंकड़ा कल्पना से परे है और इसका साफ मतलब है कि भारतीय किसान दशकों से घाटे की खेती करता रहा है।"
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गेहूं आयातक बनने की चेतावनी
इतना ही नहीं, FAO और OECD की संयुक्त रिपोर्ट 'फूड आउटलुक' का जिक्र करते हुए देविंदर शर्मा कहते हैं, "रिपोर्ट के अनुसार 2034 तक भारत गेहूं आयात करने वाला देश बन जाएगा।" उनके मुताबिक अगर ऐसा हुआ, तो देश फिर से उस "शिप टू माउथ" के दौर में पहुंच जाएगा, जब अनाज जहाजों से आता था और सीधे भूखे पेटों तक पहुंचता था। देविंदर शर्मा का कहना है कि जब दुनिया चेतावनी दे रही है, तो बजट में कृषि पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया? वे कहते हैं, "ऐसे संकट के समय मुझे लगता था कि बजट में कृषि पर कहीं ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए था।" उनका मानना है कि मैन्युफैक्चरिंग और आयुष जैसे क्षेत्रों को समर्थन देना गलत नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अनाज आधारित खेती को नजरअंदाज किया जाए।
पशुपालन और मत्स्य पालन से खाद्य सुरक्षा?
वे विशेष रूप से इस सोच पर सवाल उठाते हैं कि पशुपालन और मत्स्य पालन को बढ़ावा देकर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। देविंदर शर्मा साफ शब्दों में कहते हैं, "लाइवस्टॉक और फिशरीज देश को फीड नहीं कर सकते। पहले आपको अनाज ही चाहिए होगा।" उनके अनुसार ये क्षेत्र पोषण के लिहाज से पूरक हो सकते हैं, लेकिन अनाज का विकल्प बिलकुल नहीं नहीं।
तकनीक और AI: समाधान या समस्या?
नई तकनीक और AI को लेकर देविंदर शर्मा ने कहा कि तकनीक निजी कंपनियों के पास होती है और उसे बढ़ावा देने का अर्थ निजी कंपनियों को मजबूत करना है। वो कहतें हैं, "टेक्नोलॉजी प्राइवेट कंपनीज के पास है। जब हम टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देते हैं, तो हम प्राइवेट कंपनी को ही मजबूत करते हैं।" वे स्पष्ट करते हैं कि वे तकनीक के विरोधी नहीं, लेकिन इसे एकमात्र समाधान के रूप में पेश करना गलत है। AI आधारित खेती पर वे चेतावनी देते हैं कि इससे किसान-विहीन खेती की ओर बढ़ने का खतरा है।
देविंदर शर्मा कहते हैं, "दुनिया में जो बदलाव आ रहा है, उसमें खेती किसान-रहित होगी। हम उसी दिशा में बढ़ रहे हैं।" वे याद दिलाते हैं कि भारत की लगभग 46 प्रतिशत आबादी खेती से जुड़ी है और अगर तकनीक के नाम पर रोजगार खत्म हुआ, तो स्थिति भयावह होगी।
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तकनीक से किसानों की आय बढ़ने का भ्रम
किसानों की आय पर चर्चा करते हुए देविंदर शर्मा कहते हैं कि दुनिया में कोई भी बड़ी कृषि अर्थव्यवस्था ऐसी नहीं है, जहां तकनीक और उत्पादकता बढ़ने से किसानों की आय बढ़ी हो। "दुनिया में कोई ऐसी मेजर एग्रीकल्चर इकोनॉमी नहीं है जिसमें टेक्नोलॉजी आने से किसानों की आय बढ़ी हो।" यही वजह है कि अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में भी किसान सड़कों पर हैं और सुनिश्चित आय की मांग कर रहे हैं। देविंदर शर्मा के अनुसार भारत की स्थिति तो और भी गंभीर है वो कहतें हैं, "आज किसान परिवार की मासिक आय 10,218 रुपये है, यानी प्रतिदिन महज 27 रुपये।" यह आंकड़ा साफ बताता है कि कृषि को लगातार उपेक्षित किया गया है।
बजट की सबसे बड़ी ख़ामियाँ
बजट 2026 में जिन मुद्दों को देविंदर शर्मा सबसे बड़ी चूक मानते हैं, उनमें सबसे ऊपर है किसानों की आय और मूल्य सुरक्षा है। हर नीति यह दावा करती है कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। "अगर इन सब चीजों से आय बढ़ती, तो 80 साल में किसान की आय चांद को छू चुकी होती।" देविंदर शर्मा 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' की तर्ज़ पर 'ईज ऑफ डूइंग फार्मिंग' की मांग करते हैं। उनका सवाल है, "ईज ऑफ डूइंग फार्मिंग क्यों नहीं हो सकती?" जब देश की 50 प्रतिशत आबादी खेती से जुड़ी है, तो किसानों के लिए व्यवस्था आसान बनाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
आखिर में देविन्दर शर्मा कहते हैं कि अगर 25 साल में 111 लाख करोड़ रुपये का नुकसान उद्योग जगत को होता, तो पूरा देश हंगामा खड़ा कर देता लेकिन खेती में हमने इसकी सुध तक नहीं ली। उनके अनुसार बजट 2026 एक बार फिर साबित करता है कि नीति निर्धारण में किसान प्राथमिकता नहीं है। और यही सबसे बड़ी चिंता है एक ऐसे देश में जहां आधी आबादी खेती पर निर्भर है, वहां कृषि को हाशिये पर धकेला जा रहा है।