देश का हर दूसरा किसान कृषि कानूनों के विरोध में, 59 फीसदी किसान चाहते हैं एमएसपी पर बने कानून: गांव कनेक्शन सर्वे

देश में हाल ही में लागू हुए तीनों कृषि कानूनों को केंद्र सरकार किसानों और कृषि की किस्मत बदलने वाला बता रही है लेकिन किसान संगठन और विपक्ष इसे किसानों का डेथ वारंट बता रहे। देश के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन ने कई राज्यों में किसानों के बीच सर्वे कराया। द इंडियन फार्मर परसेप्शन ऑफ न्यू एग्री बिल्स की रिपोर्ट, बता रही है देश के आम किसानों की राय।

Arvind ShuklaArvind Shukla   19 Oct 2020 8:30 AM GMT

देश का हर दूसरा किसान कृषि कानूनों के विरोध में,  59 फीसदी किसान चाहते हैं एमएसपी पर बने कानून: गांव कनेक्शन सर्वेदेश के कई राज्यों में कृषि कानूनों पर मचे हंगामे के बीच कराए गए किसानों के सर्वे में 52 फीसदी किसानों ने खेती से जुड़े तीनों कानूनों का विरोध किया है।

52 फीसदी किसान देश, यानि हर दूसरा किसान हाल ही लागू हुए तीनों कृषि कानूनों के विरोध में हैं, जबकि 35 फीसदी किसान नए कानूनों के समर्थन में हैं। 46% किसानों को लगता है नए कृषि कानूनों से किसानों का शोषण करने वाली कंपनियां और कॉपरोरेट को बढ़ावा मिलेगा बावजूद इसके 44 फीसदी किसान मानते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार किसानों की समर्थक है। वहीं 59% किसान चाहते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को देश में कानून बना दिया जाए। ये बातें गांव कनेक्शन के राष्ट्रीय सर्वे में निकल कर आई हैं। हालांकि विरोध करने वाले (52%) किसानों में से 36% को कृषि कानूनों की जानकारी नहीं थी, जबकि समर्थन करने वाले (18%) भी इन कानूनों से जागरूक नहीं थे।

कृषि प्रधान देश में 27 सितंबर 2020 की तारीख इतिहास में दर्ज हो गई है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर के बाद तीनों नए कृषि बिल देश में कानून बनकर लागू हो गए हैं। कृषि सुधार के लिए लागू इन कानूनों का कई राज्यों में विरोध जारी है, जबकि नरेंद्र मोदी सरकार किसानों को ये समझाने कि कोशिश में है कि बिल उनके हित में हैं और इससे कृषि का भविष्य बदल जाएगा।

16 राज्यों में कराए गए सर्वे में 52% किसानों ने तीनों नए कृषि कानूनों का विरोध किया.. क्योंकि विरोध करने वालों में से 57% को डर है कि नए कानूनों के बाद उन्हें अपनी फसल कम कीमत पर खुले मार्केट में बेचनी पड़ेगी

कृषि कानूनों को लेकर किसान संगठनों के विरोध और सरकार की दलीलों के बीच देश के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन के रूरल इनसाइट विंग ने देश के 16 राज्यों के 53 जिलों में 5022 किसानों के बीच रैपिड सर्वे कराया। रैपिड सर्वे में मार्जिंन ऑफ एरर 5 फीसदी है। तीन अक्टूबर से 9 अक्टूबर 2020 के बीच हुए इस फेस टू फेस सर्वे में किसानों से कृषि कानूनों, मंडी, न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि अध्यादेशों के प्रभाव, किसानों आशंकाओं, उनके पास जोत, फसल उगाने से लेकर केंद्र सरकार और राज्यों सरकार के फैसलों से लेकर कृषि से आमदनी और भविष्य के फैसलों आदि को लेकर सवाल किए गए।

सर्वे में शामिल किसानों से सवाल किया गया कि क्या आप कृषि कानूनों (farm laws ) का समर्थन करते हैं? जिसके जवाब में 52 फीसदी किसानों ने कहा 'नहीं', 35 फीसदी किसानों ने कहा 'हां' जबकि 13 फीसदी किसान न पक्ष में थे न विपक्ष में। विरोध करने वाले (52%) किसानों में से 36% को कृषि कानूनों की जानकारी नहीं थी। जबकि समर्थन करने वाले (35%) में 18% भी इन कानूनों से जागरुक नहीं थे।

Read in English- Highest opposition to the new agri laws among northwest region farmers; greatest support in the west region: Gaon Connection Rural Survey

देश के 16 राज्यों में कराए गए सर्वे में 35 फीसदी किसानों ने कृषि कानूनों का समर्थन किया है। समर्थन की वजह नीचे ग्राफ में विस्तार से पढ़िए

विरोध करने वालों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था और मंडी (एपीएसपी) के खत्म होने, कॉरपोरेट के हावी होने का डर है तो समर्थकों को खुले बाजार में अपना सामान बेचने, कांट्रैक्ट फार्मिंग की छूट और आय बढ़ने की उम्मीद है।

केंद्र की एनडीए सरकार कोरोना के चलते लॉकडाउन लगने के बाद तीन कृषि कानूनों को अध्यादेश (agriculture act) के रुप में लाई, जिन्हें 14 सितंबर से शुरु हुए संसद के मानसून सत्र में भारी हंगामे के बीच पास कराया गया। किसान संगठन मानसून सत्र के पहले दिन से विरोध कर रहे हैं, जबकि विपक्ष ने सदन में बिना चर्चा पर्याप्त चर्चा न कराए जाने, संसद की सेलेक्ट कमेटी (सुधार के लिए) को बिल न भेजे जाने को सरकार की तानाशाही और अलोकत्रांतिक बताया। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाया ही कई राज्यों में किसान आज भी प्रदर्शन कर रहे हैं वो बिल को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

गांव कनेक्शन के सर्वे में शामिल दो तिहाई (67 फीसदी) किसान तीनों नए कृषि कानूनों, (1) कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल ( Farmers' Produce Trade & Commerce (Promotion & Facilitation) Bill 2020, (2) कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020 Farmers (Empowerment & Protection) Agreement on Price Assurance & Farm Services Bill 2020 और (3) आवश्यक वस्तु अधिनियम 2020 (The Essential Commodities (Amendment) Bill) 2020 के बारे में जानकारी रखते हैं, इन्हें किसानों के प्रदर्शन के बारे में जानकारी थी।

सबसे ज्यादा जागरुकता (91 फीसदी) उत्तर पश्चिमी क्षेत्र (पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) में देखी गई, देश में कृषि कानूनों का सबसे ज्यादा विरोध भी पंजाब हरियाणा में हो रहा है। जबकि पूर्वी क्षेत्र (पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में सबसे कम 46 फीसदी लोग ही इन कानूनों को लेकर जागरुक मिले। सर्वे के दौरान सबसे ज्यादा जागरुकता बड़ी और मध्यम जोत (5 एकड़ से ज्यादा) के किसानों (76 फीसदी) देखने को मिली जबकि लघु और सीमांत किसान (5 एकड़ तक वाले) 64 फीसदी जागरुकता देखने को मिली। सर्वे से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट The Rural Report-2: THE INDIAN FARMER'S PERCEPTION OF THE NEW AGRI LAWS गांव कनेक्शन की इनसाइव वेबसाइट www.ruraldata.in पर पढ़ सकेंगे।

गांव कनेक्शन के सर्वे में यह भी निकलकर आया है जो किसान (77 फीसदी) पहले से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपनी उपज बेच रहे थे, वे एमएसपी पर न बेचने वाले किसानों (51फीसदी) से ज्यादा अच्छे तरीके से कानूनों से वाकिफ थे। सर्वे में शामिल किसानों से जब पूछा गया कि उनकी राय में किसान कृषि बिलों का विरोध क्यों कर रहे हैं इसके जवाब में 49 फीसदी ने कहा क्योंकि उन्हें लगता है कि कृषि कानून किसान विरोधी है जबकि 49 फीसदी ने ही माना कि बेहतर फसल मूल्य के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं।

भारत में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 84 फीसदी किसान लघु और सीमांत (small and marginal farmers ) हैं। गांव कनेक्शन ने सर्वे के दौरान छोटे और बड़े सभी तरह के किसानों को शामिल किया। सर्वे में तीन चौथाई यानि ( 72 फीसदी) किसानों के पास 5 एकड़ से कम जमीन थी, जबकि 28 फीसदी के पास पांच एकड़ से ज्यादा जमीन (medium and large scale farmers) थी। सर्वे में शामिल ज्यादातर किसान चावल (66 फीसदी) की खेती करते हैं जबकि उसके बाद गेहूं (46 फीसदी), ज्वार-बाजरा (23 फीसदी) 17 फीसदी दालें, 11 फीसदी सब्जियां, बाकी कपास, गन्ना,तिलहन, सब्जियां, जूट आदि उगाने वाले किसान थे।

कृषि कानूनों के समर्थन या विरोध में हैं किसान?

सर्वे में शामिल किसानों की आर्थिक स्थिति की बात करें तो 47 फीसदी किसान बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) वाले जबकि 42 फीसदी एपीएल (गरीबी रेखा से ऊपर) से संबंध रखते थे। सर्वे में शामिल 85 फीसदी किसानों ने कहा कि कृषि उनकी आय का प्रमुख जरिया है।

सर्वे में शामिल 63 फीसदी किसानों ने कहा कि वो अपनी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचते हैं। एमएसपी पर उपज बेचने वाले किसानों की अगर जोत (जमीन) देखें तो लघु-सीमांत (58 फीसदी) जबकि मध्यम-बड़े किसान (75फीसदी) शामिल हैं यानि छोटे किसानों की अपेक्षा मध्यम और बडे किसान एमएसपी पर ज्यादा निर्भर हैं।

एमएसपी को लेकर क्षेत्रवार बात करें तो दक्षिणी क्षेत्र (केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश) में सबसे ज्यादा किसान 78 फीसदी किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलें बेचते हैं, जिसके बाद उत्तर पश्चिम क्षेत्र (पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश) में 75 फीसदी,पश्चिमी क्षेत्र (गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश) में (71%) पूर्व और उत्तर पूर्व क्षेत्र (66फीसदी), पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जबकि सबसे कम किसान मात्र 26 फीसदी उत्तर क्षेत्र (उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड) में एमएसपी (minimum support price) पर अपनी ऊपज बेंच पाते हैं।

सर्वे (GC Rural Survey) में गांव कनेक्शन से ये भी जानने कि कोशिश की किसान अपनी फसल कहां बेचते हैं, तो सबसे ज्यादा 36 फीसदी किसानों ने एपीएमसी (सरकारी मंडी APMC) बताया, इनमें पंजाब हरियाणा (78 फीसदी) के किसान सबसे आगे हैं, जबकि विकल्प किसानों ने निजी व्यापारियों (26 फीसदी) को चुना, निजी व्यापारियों को अपनी फसल बेचने वालों में उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड के किसान शामिल हैं।

किसानों के फसल बेचने का पसंदीदा माध्यम


बिहार में साल 2006 एपीएमसी (मंडी व्यवस्था) खत्म कर दी गई थी। न्यूनतम समर्थन मूल्य पाने वाले किसान कृषि कानूनों का विरोध करने में आगे हैं।

सर्वे में शामिल किसानों से सवाल किया गया कि अगर वो तीनों कृषि कानूनों के विरोध में हैं तो क्यों? इसके जवाब में बिल का विरोध करने वाले 52 फीसदी किसानों में से 57% फीसदी ने कहा कि क्योंकि इससे किसानों को खुले बाजार में कम कीमत पर अपनी उपज बेचनी पड़ेगी।

जबकि 38 फीसदी ने विरोध की वजह बताई कि कृषि बिलों से किसानों की निजी कंपनियों पर निर्भरता बढ़ जाएगी। 36 फीसदी को डर है कि इससे खुले बाजार की वजह से सरकार एमएसपी पर कम खरीद करेगी जबकि 33 फीसदी किसानों को डर है कि नए कानूनों से एमएसपी व्यवस्था ही खत्म हो जाएगी। वहीं 32 फीसदी उत्तरदाताओं ने बिल का विरोध इसलिए किया उन्हें डर है कि कांट्रैक्ट फार्मिंग जैसे कानून से किसान अपने ही खेत में बंधुआ मजदूर बनकर रह जाएगा। 20 फीसदी किसान मानते हैं नए कानून से जमाखोरी और कालाबाजारी बढ़ेगी जबकि 15% किसानों ने ऊपर के सभी कारणों को विरोध की वजह बताई। वहीं 3 फीसदी को पता नहीं विरोध क्य़ों कर रहे, वहीं 01 फीसदी ने कारण (can't say) नहीं बताया।

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वहीं जब गांव कनेक्शन के सर्वेयर ने कृषि कानूनों का समर्थन करने वाले 35 फीसदी किसानों से नए कानूनों का समर्थन करने की वजह पूछी तो इनमें से 47 फीसदी ने कहा कि उन्हें कहीं भी फसल बेचने की आजादी मिलेगी, 35 फीसदी ने कहा कि बिचौलियों से आजादी मिलेगी, 22 फीसदी लोग इसलिए खुश हैं क्योंकि उनका मानना है इससे किसानों की आय बढ़ेगी जबकि 16 फीसदी लोग कांन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग कानून से खुश हैं। 23 फीसदी लोगों ने बिल को समर्थन की वजह ऊपर की सभी वजहें गिनाईं जबकि 9 फीसदी को समर्थन की वजह ठीक से पता नहीं वहीं 04 फीसदी ने समर्थन का कारण नहीं बताया। (संबंधित चार्ट नीचे देंखे)


गांव कनेक्शन के सर्वे में कृषि कानूनों के समर्थन और विरोध करने वाले सभी किसानों से जब ये पूछा गया कि क्या एमएसपी को कानून बनाया जाना चाहिए तो 59 फीसदी किसानों ने कहा 'हां', 16 फीसदी ने कहा 'नहीं', जबकि 25 फीसदी किसानों ने कहा कि वो 'कुछ कह नहीं सकते' हैं।

सर्वे के दौरान गांव कनेक्शन तीनों कृषि कानूनों को लेकर किसानों के मन में बैठे डर और संशय को भी समझने की कोशिश की है। सर्वे में शामिल लगभग आधे किसानों (49 फीसदी) को लगता है कि नए कानूनों से मंडी-एपीएमपी व्यवस्था खत्म हो जाएगी तो 39 फीसदी किसानों को डर है कि भविष्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी भी बंद हो जाएगी। हालांकि मंडी व्यवस्था को लेकर डर उन किसानों (50 फीसदी) में ज्यादा है जो एमएसपी पर उपज बेचते हैं जबकि सरकारी रेट पर न बेचने वाले किसानों का प्रतिशत महज 20 है। यानि जो जिन्हें आज एमएसपी नहीं मिल रही वो एपीएमसी को लेकर कम चिंतिंत हैं।


गांव कनेक्शन के सर्वे में तीनों कृषि कानूनों को लेकर किसानों से अलग-अलग सवाल किए गए। किसानों से जब उपज बेचने की खुली छूट देने वाले कानून (खुला बाजार) की बात की गई तो 35 फीसदी किसानों ने कहा ये कानून किसानों के पक्ष में जबकि 31 फीसदी किसानों ने इसे किसानों के विरोध में बताया। 19 फीसदी लोग कुछ कह नहीं सके तो 15 फीसदी ने कहा अभी इस पर जवाब देना जल्दबाजी होगी।

इसी तरह किसानों से जब पूछ गया कि क्या वो कांट्रैक्ट फार्मिंग कानून के बारे में जानते हैं, जिसके जवाब में 49 फीसदी ने हां में जवाब दिया, लेकिन जब हां में जवाब देने वालों (5022 में से 2460 किसान) से पूछा गया कि क्या आपको लगता है कानून किसानों के पक्ष में है तो 46 फीसदी ने कहा कानून किसानों के पक्ष में जबकि 40 फीसदी ने कहा नहीं, 11 फीसदी लोगों ने कहा अभी कोई राय बनाना जल्दबाजी होगी। हालांकि यहां पर छोटी जोत वाले किसानों का आंकड़ा निकालें समर्थकों में उनकी संख्या ज्यादा है (51) फीसदी जबकि मध्यम और बड़े किसान (51फीसदी) इसके विरोध में दिखे। संबंधित खबर यहां पढ़ें-

सर्व में शामिल सभी 5022 किसानों से जब पूछा गया कि कृषि बिलों को देखते हुए उन्हें क्या लगता है कि नरेंद्र मोदी सरकार किसानों की विरोधी है? समर्थक है या फिर उदासीन है? इसके जवाब में 44 फीसदी ने कहा समर्थक है, 28 फीसदी ने विरोधी तो 20 फीसदी ने कहा उन्हें पता नहीं। हालांकि 48 फीसदी किसान ये मानते हैं नए कृषि कानूनों से किसानों का शोषण करने वाली कंपनियों और कॉरपोरेट को बढ़ावा मिलेगा।

सर्व में शामिल सभी 5022 किसानों से जब पूछा गया कि कृषि बिलों को देखते हुए उन्हें क्या लगता है कि नरेंद्र मोदी सरकार किसानों की विरोधी है? समर्थक है या फिर उदासीन है?

लेकिन जब किसानों से ये पूछा गया कि आपको क्या लगता है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार किसानों, किसानों और व्यापारियों, कॉरपोरेट, आढ़ती-बिचौलिए, प्राइवेट कंपनियों, मल्टीनेशनल में किसका समर्थन करती है तो 35 फीसदी ने कहा किसानों का, जबकि 44 फीसदी ने कहा कि प्राइवेट कंपनी, मिडिल मैन और मल्टीनेशल का समर्थन करती है।

नरेंद्र मोदी सरकार का पूरा जोर किसान उत्पादन समूहों (एफपीओ) पर रहा है लेकिन गांव कनेक्शन के सर्व में निकलकर आया है कि 49 फीसदी किसानों को एफपीओ के बारे में कोई जानकारी ही नहीं, जबकि 58 फीसदी किसान किसी ऐसे व्यक्ति किसान तक को नहीं जानते जो किसी एफपीओ या कलस्टर का हिस्सा हो। किसानों से जब पूछा गया कि मोदी सरकार की सबसे बड़ी किसान हितौषी योजनाएं/कदम कौन से हैं तो महज 2 फीसदी ने एफपीओ को वोट दिया। सरकार की योजना 2024 तक 10 लाख एफपीओ बनाने की है, जिनके तहत छोटे किसानों की मदद की जाएगी। लेकिन ये एफपीओ कहां बने हैं और कौन इसका सदस्य इसे लेकर किसान संगठन और विपक्ष सवाल उठाते रहे हैं।


सर्वे में शामिल किसानों (32 फीसदी) ने प्रधानमंत्री किसान निधि योजना को मोदी सरकार की सबसे बड़ी किसान हितौषी योजना बताया है जबकि 25-25 फीसदी किसान पूरे देश में किसानों का कर्ज़ माफ न किए जाने और नए कृषि कानूनों को सबसे बड़ा किसान विरोधी कदम बताया है। 36 फीसदी किसान मानते हैं कि नए कृषि कानूनों से देश की कृषि व्यवस्था में सुधार आएगा तो सिर्फ 29 फीसदी को लगता है नए कानूनों के सहारे 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी हो पाएगी।

गांव कनेक्शन के सर्वे में शामिल 51 फीसदी किसानों ने खेती को फायदेमंद बताया है लेकिन जब उनसे ये पूछा गया कि क्या वो अपने बच्चों को किसान बनाएंगे तो सिर्फ 66 फीसदी किसानों ने कहा कि वो अपने बच्चों को किसान बनाना नहीं चाहते।

सर्वे के मुख्य तथ्य

  • 52% किसानों ने कहा कि वो कृषि कानूनों का विरोध करते हैं, लेकिन विरोध करने वाले किसानों में 36 %किसानों को कृषि बिलों की जानकारी नहीं थी
  • 35% किसानों ने नए कृषि बिलों का समर्थन किया, लेकिन इनमें से 18% नए बिलों को लेकर जागरुक नहीं थे।
  • 66% किसान नहीं चाहते कि उनका बच्चा भी किसान बने।
  • 49% किसानों को एफपीओ (किसान उत्पादक संगठन) के बारे में कोई जानकारी नहीं।
  • 51% किसानों ने कहा खेती फायदेमंद है।
  • 25% किसानों ने कहा- तीनों कृषि कानून मोदी सरकार का सबसे बड़ा किसान विरोधी कदम।
  • 25% किसानों ने कहा- देश में कर्ज़माफी न करना मोदी सरकार का सबसे बड़ा किसान विरोधी कदम।
  • 32% किसानों की राय पीएम किसान निधि (साल के 6000 रुपए) को मोदी सरकार का सबसे बड़ा किसान हितैषी फैसला।्र
  • 44% किसानों ने कृषि कानूनों के लागू करने के फैसले पर कहा कि मोदी सरकार किसान हितैषी है।
  • 35% किसानों ने कृषि कानूनों को देखते हुए मोदी सरकार को किसान समर्थक बताया।
  • 44% किसानों ने कहा मोदी सरकार बड़ी कंपनियों, एमएनसी, निजी व्यापारियों और व्यापारियों की समर्थक है।
  • 46% किसानों ने कहा, कृषि बिलों से किसानों का शोषण करने वाली कंपनियों/निजी कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा।

गांव कनेक्शन सर्वे: जानिए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कानून के पक्ष के पक्ष या विपक्ष में हैं आम किसान?


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