शहर वाली बीमारियों की चपेट में आखिर क्यों आ रहे ग्रामीण ? 

शहर वाली बीमारियों की चपेट में आखिर क्यों आ रहे ग्रामीण ? गाँव में पहुंची शहर की बीमारियाँ                                                                      फोटो: इंटरनेट           

भारत को एक स्वस्थ देश बनना होगा क्योंकि कोई भी बीमार देश सुपरपॉवर नहीं बन सकता। भारत की ज़्यादातर आबादी आज भी ग्रामीण इलाकों में रहती है और स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के हिसाब से ग्रामीण भारत की सेहत तेज़ी से ख़राब हो रही हैं। भारत के गांवों रहने वाले लोग लाइफ स्टाइल से जुड़ी बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।

लाइफ़ स्टाइल से होने वाली बीमारियों में मुख्य रूप से डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, सांस की बीमारियां और दिल की बीमारियां आती हैं। लोग कहते थे कि ये सब बीमारियाँ बड़े लोगों कि और केवल शहरों में ही होती हैं लेकिन ऐसा नहीं हैं।

लखनऊ के लोहिया अस्पताल में अपने शुगर का इलाज करवा रहे बाराबंकी निवासी राज कुमार गौतम (55 वर्ष) बताते हैं “पहले ये सब बीमारियाँ बड़े लोगों को होती थी। शहरी लोगों को होती थी। लेकिन अब गाँव में पहुँच गई है। उन्होंने बताया कि पहले गाँव में लगभग सारे काम खुद से किये जाते थे। अब लोग आराम ज्यादा करते हैं। मैंने खुद जबसे काम काज बंद कर दिया है तबसे बीमार होने लगा हूँ।”

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इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के वर्ष 1990 से 2016 के दौरान ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की सेहत पर एक रिसर्च किया हैं इसके हिसाब से ग्रामीण आबादी में डायबिटीज के मरीजों की संख्या 4 गुना, दिल की बीमारियों के मरीजों की संख्या 9 गुना, ब्रेन स्ट्रोक के मरीज़ 6 गुना और सांस की बीमारियों के मरीज़ 4 गुना बढ़ोत्तरी हुई है।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बीमारियों की वजह से होने वाली मौत की सबसे बड़ी वजह दिल की बीमारियां है। दिल की बीमारियां होने का सबसे बड़ा कारण ब्लड प्रेशर को माना जाता है। वर्ष 1990 में ग्रामीण इलाकों में ब्लड प्रेशर के मरीज़ों की संख्या 30 प्रतिशत थी लेकिन जीवन शैली में बदलाव की वजह से ये आंकड़ा 2016 में 55 प्रतिशत पहुंच गया।

किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के हृदय विभाग के अध्यक्ष डॉ. वीएस नारायण ने बताया, “गाँव के लोगों को सेहत का ध्यान रखने के लिए बहुत सारी सुविधाएँ हैं। खुला वातावरण होता है उस खुले वातावरण में रोजाना सुबह 30-40 मिनट तक टहलें, योगा करें ध्यान करें। पहले लोग कई तरह के काम करते थे जिससे उन्हें किसी बीमारी का सामना ज्ल्ल्दी नहीं करना पड़ता था लेकिन जबसे सुविधाएं आ गई हैं तो ग्रामीण क्षेत्रों में बीमारियाँ बढ़ने लगी हैं।”

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इस हिसाब से भारत के गांवों में रहने वाले लोगों की सेहत चिंताजनक है। ग्रामीण इलाकों में देश का हेल्थ सिस्टम बहुत बीमार है। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं में भारी कमी की वजह बीमारियों के आंकड़े बहुत तेज़ी से बढ़े हैं। इस साल बजट के दौरान केंद्र सरकार ने नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन सस्कीम की घोषणा की है इस योजना में गरीब व्यक्ति को 5 लाख रुपए के स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिल सकेगा लेकिन सवाल यह है कि स्कीम काम कर पायेगी या नहीं?

पहले जो भी काम ग्रामीण करते थे उनसे उनकी सेहत काफी सही रहती थी। खेतों में 30 मिनट तक फावड़ा चलाने से 150 से 200 कैलोरी खत्म होती है। 30 मिनट तक कुएं से पानी खींचते हैं तो इससे 200 से 250 कैलोरी खर्च होती हैं। इसके अलावा पशु का चारा काटने वाली मशीन पर 30 मिनट बिताने पर 180 से 200 कैलोरी खर्च होती हैं। घर की साफ़-सफाइ से जुड़े काम करने पर 150 से 200 कैलोरी खर्च होती है।

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स्वास्थ्य मंत्रालय की 31 मार्च 2017 के आंकड़ों के हिसाब से 1,56,231 उपकेंद्रों में सिर्फ 17,204 मतलब की 11 प्रतिशत स्वास्थ्य मानकों पर खरे उतरे हैं। 20% उपकेंद्रों पर पानी की आपूर्ति है, 23% उपकेंद्रों पर बिजली की व्यवस्था नहीं है, 6000 से ज्यादा उपकेंद्रों के पास एएनएम/हेल्थ वर्कर (महिला) नहीं हैं, एक लाख केन्द्रों के पास हेल्थ वर्कर(पुरुष) नहीं हैं और 4,324 केन्द्रों दोनों के बिना ही चल रहे हैं।

किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के श्वसन विभाग के अध्यक्ष डॉ सूर्यकांत बताते हैं, “ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति पहले अपने हाथों से सभी काम करते थे, जिससे उन्हें बीमारियां कम होती थी। जब खेत में गेहूं या धान की सफाई करनी होती थी तो बैलों का प्रयोग करते थे लेकिन अब कई तरह की मशीन का प्रयोग करते हैं। गेहूं साफ़ करने वाली मशीन (थ्रेसर) जब गेहूं की सफाई करता है तो बहुत दूर तक उसके भूसे की छोटे-छोटे टुकड़ों को फेकता है, जिससे वहां आस-पास रहने वाले व्यक्ति को तो सांस संबंधी बीमारियाँ होतीही हैं इसके साथ अन्य भी कई लोग चपेट में आ जाते हैं।”

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केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक यूपी और बिहार में स्थिति राष्ट्रीय औसत से भी खराब है। देश के सक्रिय 5,510 स्वास्थ्य केंद्रों में 22,496 विशेषज्ञ डॉक्टरों की जरूरत है। जबकि 4,156 विशेषज्ञ ही इन केंद्रों पर सेवाएं दे रहे हैं।

आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य यूपी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 3,288 विशेषज्ञों की जरूरत है, लेकिन वहां मात्र 484 विशेषज्ञ कार्यरत हैं। ये राज्य की जरूरत का महज 15 फीसदी हैं। बिहार के सीएचसी में 600 विशेषज्ञों की आवश्यकता है, जबकि यहां मात्र 82 विशेषज्ञ ही सेवाएं दे रहे हैं।

देश में एमबीबीएस डॉक्टरों के जरूरत से ज्यादा पद स्वीकृत हैं। कम भर्तियां होने के बावजूद जरूरत से अधिक एमबीबीएस सीएचसी में सेवाएं दे रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, सीएचसी में 25,650 एमबीबीएस डॉक्टरों की जरूरत है। जबकि स्वीकृत पदों की संख्या 33,968 है। इनमें से 27,142 पदों पर एमबीबीएस डॉक्टर तैनात हैं।

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