ये पढ़कर आप समझ जाएंगे सोशल मीडिया में क्यों ट्रेंड किया #KisanKiLoot

Arvind ShuklaArvind Shukla   15 Nov 2017 7:42 PM GMT

ये पढ़कर आप समझ जाएंगे सोशल मीडिया में क्यों ट्रेंड किया #KisanKiLootमंगलवार और बुधवार को ट्विटर और फेसबुक पर ट्रेंड करता रहा #KisankiLoot

किसान की समस्याओं और मांगों को लेकर अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने हुंकार भरी है। समिति से जुड़े और स्वराज अभियान के संयोजक योगेंद्र यादव की अगुवाई में ये अभियान शुरू किया गया और #KisanKiLoot चला, लेकिन ये ख़बर पढ़कर आप समझ जाएंगे, आखिर देश का किसान गुस्से में क्यों है।

नई दिल्ली। देश में जब उदारवादी प्रधानमंत्री कहे जाने वाले पंडित जवाहर लाल नेहरू को याद किया जा रहा था, सोशल मीडिया पर अचानक ट्विटर पर और एक नया हैशटैग ट्रेंड किया।

देखते ही देखते #KisanKiLoot ट्विटर के पहले पायदान पर पहुंच गया और फेसबुक पर भी किसान संगठन और जागरुक किसान आवाज़ उठाने लगे। ये हैशटैग देश में किसानों के गुस्से और उनके साथ हो रही उदासीनता को दिखाने के लिए था, लोगों ने जमकर सरकारों के खिलाफ अपनी भड़ास निकाली। 20 नवंबर को दिल्ली में किसान संसद का आयोजन किया जाना है, जिसका मुख्य मुद्दा किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाना है। इस प्रदर्शन में देश की 185 किसान संगठनों के लोग हिस्सा लेंगे। लेकिन हम आप को बताने की कोशिश कर रहे हैं, किसान इतना गुस्से में क्यों हैं। नीचे तीन उदाहरण हैं, खेती की बढ़ती लागत, हर साल होते घाटे को बताने के उदाहरण हैं।

किसानों की मुख्य समस्या उनकी उपज का सही मूल्य न मिलना है। मध्य प्रदेश में एक किसान मंडी में इसलिए अपनी फसल फूंक दी क्योंकि सौदा होने के बाद व्यापारियों ने कम रेट कर दिए थे, नाराज किसान ने अपनी तुसली की फसल फूंक दी। उत्तर प्रदेश के सैकड़ों कोल्ड स्टोरेज में आज भी किसानों का आलू रखा है लेकिन किसान उठाने नहीं जा रहे। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में प्याज उगाने वाले किसान खून के आंसू रो चुके हैं। पंजाब से रोजाना किसानों की आत्महत्या की ख़बरें आ रही हैं।

अब बात उन तीन उदाहरणों की। गुजरात, मध्यप्रदेश, यूपी और राजस्थान में भारी मात्रा में मूंगफली होती हैं। सरकार ने 4450 रुपए प्रति कुंटल का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी तय किया है लेकिन किसान इसे काफी घाटा उठाकर बेचने को मजबूर हैं। किसानों की मानें तो एक कुंटल मूंगफली की कीमत 6000-7000 प्रति कुंटल मिले तो मुनाफा होगा।

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लेकिन राजस्थान के बीकानेर में रहने वाले आसूराम गोदारा ने पिछले दिनों अपनी मूंगफली 3500 रुपए प्रति कुंटल में बेची, वो भी इस शर्त के साथ कि एक किसान ने सरकारी खरीद समिति सिर्फ 25 कुंटल मूंगफली लेगी। गोदारा के पास करीब 200 कुंटल मूंगफली होगी। वो खुद ट्विटर पर #किसानकीलूट के साथ अपनी कहानी बता रहे थे, जिसमें उन्हें प्रति एकड़ मूंगफली की जुताई-बिजाई की लागत से लेकर कटाई और मंडी में बेचने की ब्यौरा लिखा है। गोदारा के मुताबिक हर एकड़ पर खर्च करीब 89240 रुपए आया है जबकि उन्होंने 42000 में बेची है।

मूंगफली बोने वाले गुजरात में भावनगर जिले के ऊंचड़ी गांव के किसान लवजीभाई नाकराणी (58 वर्ष) के पास भी कई एकड़ मूंगफली थी उन्होंने 4 हजार प्रति क्विंटल में बेचा। वो कहते हैं, "जब किसी फैक्ट्री में कोई स्क्रू बनता है, उसका मालिक तय करता है कि उस पर मुनाफा क्या होगा, उसकी एमएसपी तय करता है। लेकिन किसान के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं। वो ये भी नहीं जानता उसके खेत में जो पैदा हुआ है वो बिकेगा या नहीं।” लवजी भाई के मुताबिक सरकार की नीतियां ठीक नहीं इसलिए कारोबारी सिंडीकेट चला रहे हैं और किसान मरने को मजबूर है।

आसूराम गोदारा के एक हेक्टेयर फसल का गणित

3200 रुपए खेत जोताई

1200 रुपए- बराबर (हेरा)

2600 रुपए- डीएपी (उर्वरक)

1200 रुपये- खेत लेवलिंग (समतलीकरण)

1500 रुपये खरपतवारनाशक

500 रुपए खरपतवारनाशक छिड़कने के लिए मजदूरी

26400 रुपए (240 किलो बीज लगा, 110 रुपए में खरीद था)

1200 रुपए- फफूंदनाशक से बीज उपचार किया

3000 रुपए- गोजा कीटनाशक बीज उपचार (वाइट ग्रेव) बीज ट्रीटमेंट- करीब 14000 रुपए लीटर आती है)

1600 रुपए- मूंगफली बीज बीजाई खर्च

1200 रुपए- यूरिया दो बार

2240 रुपए सल्फर- 16 किलो

1600 रुपए माइक्रोन्यूट्रन 20 किलो

3600 रुपए निराई-गुड़ाई खर्च

6000 रुपए ऊपर से गोजा के लिए कीटनाशक- पौधे बचाने के लिए

1600 रुपए टीकारोग के लिए स्प्रे दवा

800 रुपए ग्रोथ प्रमोटर स्प्रे

500 रुपए स्प्रे ट्रैक्टर खर्च

6000 रुपए मूंगफली कटाई व चुगाई-बीनने में

4800 रुपए नेणा कराने की मजदूरी 16 आदमी (बंडल बनाने के)

3000 रुपए कटी फसल को इकट्ठा करने की मजदूरी 10 आदमी

3600 थ्रेसर खर्चा

3000 रुपए थ्रेसर पर मजदूर

1200 रुपए मंडी पहुंच भाड़ा

1350 रुपए मंडी में तुलवाई खर्च

6350 रुपए बिजली बिल

कुल खर्चा - 89240

तो भी किसान को घाटा होगा समर्थन मूल्य और बाजार भाव में 950 रूपए का फर्क है जो एक हेक्टेयर पर 11400 रुपए का फर्क पड़ेगा और 4 हेक्टेयर पर 45600 रूपए का। पूरी ख़बर विस्तार से यहां पढ़ें

बिहार में पूर्णिया के किसान के धान का गणित

पूरे देश में धान कट गए हैं। ज्यादातर किसान उन्हें बेच चुके हैं या बेचने की जुगत में हैं। बिहार जिले में पूर्णिया जिले के चनका गांव में रहने वाले पेशे से पत्रकार रहे और अब जागरुक किसान गिरींद्र नाथ झा ने अपने खेतों में जो धान लगाए थे, उनकी लागत और बेचने के बाद हुई आय का पूरा ब्यौरा रखा है। उन्होंने कुछ दिनों पहले फेसबुक पर लिखा था।

फसल की लागत

खेत की जुताई में ख़र्च- 1500 रुपए

खाद - 3400 रुपए

बीज - 2000 (8 KG) रुपए

रोपाई - 1000 ( दस मजदूर) रुपए

सिंचाई- 2400 रुपए

(चार पटवन. पहली बार छह घंटा, दूसरी बार पाँच और तीसरी दफे भी पाँच घंटा। पटवन का ख़र्च 150 रुपए प्रति घंटा है)

फ़सल कटाई - 800 रुपए

फ़सल की बँधाई- 600 रुपए

फ़सल को घर तक पहुँचाने में ख़र्च-1000 रुपए

फ़सल की तैयारी में ख़र्च - 1200 रुपए

कुल ख़र्च- 13,900 रुपए

एक बीघा का ख़र्च आपने जान लिया। अब यह समझा जाए कि एक बीघा में धान की उपज कितनी होगी। एक बीघा में 16 से 18 क्विंटल धान की उपज होगी यदि मौसम साथ दे। और वैसे तो धान की प्रति क्विंटल सरकारी क़ीमत 1400-1500 रुपए कहने को होती है लेकिन गाँव में किसान 1000 से 1100 रुपए के बीच ही बेचता है। तो ऐसे में आप लागत और आमदनी का हिसाब ख़ुद जोड़ लीजिए।

आप गाँव-घर घूमिए और किसान से खेती में लागत के बारे में पूछिएगा तो यही सुनने को मिलेगा कि "हम कभी हिसाब नहीं लगाये कि कितना खर्च होता है और कितना आमदनी...नुक़सान को नजरअन्दाज़ कर देते हैं..."

लखनऊ के एक किसान ने गेहूं का बहीखाता कुछ ऐसे बताया था

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अकड़रिया कला गांव में रहने वाले किसान कन्हैया ने दो वर्ष पहले अपनी गेहूं की फसल का बही खाता कुछ यूं तैयार किया था।

कन्हैया के मुताबिक “एक एकड़ में जुताई, बीज, सिंचाई व कटाई तक करीब 12 हजार रुपये खर्च हुए। गेहूं का सरकारी मूल्य 1450 रुपये (दो साल पहले) , जबकि बाजार में 1300-1400 में बिक रहा है। अगर सरकारी रेट की भी बात करें तो 14,500 रुपये ही मिलेंगे। बचा क्या, वो आप खुद जोड़ लो।”

कन्हैया, उनकी पत्नी और एक बच्चे ने खेत में कई महीने मेहनत की थी। अब कन्हैया की कमाई का अंदाजा लगाया जा सकता है।

खेती-किसानी में देश के इन तीन राज्यों से इन किसानों की कहानी भारत में न सिर्फ किसानों से हो रही लूट की सच्चाई बयां कर रही हैं, बल्कि आज के किसानों की इस स्थिति को समझने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर कैसे किसानों की आमदनी दोगुनी हो सकेगी? गाँव कनेक्शन लगातार किसानों के हक की आवाज उठा रहा है। पढ़िए खेती किसानों से जुड़ी अन्य खबरें:

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