बुंदेलखंड: ठंड में ही गर्मियों जैसी पानी की किल्लत, टीकमगढ़ में सूखे कुएं और हैंडपंप

मानसून के सीजन में देश के कई इलाकों में बाढ़ आ गई थी तो कई इस बार भी सूखे रह गए। बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में बारिश अच्छी हुई थी, लेकिन समस्या उससे कहीं बड़ी है। टीकमगढ़ में पहले जो कुएं और नल मार्च-मई में सूखते थे वो अक्टूबर-नवंबर में ही सूख गए हैं। गांव कनेक्शन की विशेष सीरीज का पहला भाग

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   28 Dec 2018 5:35 AM GMT

बुंदेलखंड: ठंड में ही गर्मियों जैसी पानी की किल्लत, टीकमगढ़ में सूखे कुएं और हैंडपंप

हाईलाइट

  • बुंदेलखंड में सर्दियों में पानी की किल्लत, नवंबर-दिसंबर में सूखने लगे हैंडपंप
  • पानी की समस्या ने बढ़ाया पलायन, गांवों के युवा कमाने जा रहे शहर
  • कौड़िया गांव की 2 हजार आबादी पर 4 हैंडपंप, जिसमें 1 में पानी नहीं

टीकमगढ़। बुंदेलखंड में वैसे तो पानी की समस्या मार्च से शुरू होती थी, लेकिन इस साल हालात कुछ बदले-बदले से हैं। अभी तो जाड़े की शुरुआत ही है, लेकिन गांवों के हैडपंप जवाब देने लग गये हैं, कुएं सूखने लगे हैं, तालाबों में अब मुश्किल सेे एक महीने का ही पानी बचा है।

दिल्ली से करीब 600 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश का टीकमगढ़ जिला बुंदेलखंड इलाके का सबसे प्रभावित जिला माना जाता है। टीकमगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलीमीटर दूर, पोस्ट जतारा के कौड़िया के आदिवासी मोहल्ले की रहने वाली फूलन देवी अपनी दो साल की बेटी को सूखी रोटी खिलते हुए गाँव कनेक्शन से कहती हैं ''खाने में सूखी रोटी के अलावा कुछ है ही नहीं। पति बाहर कमाने चले गये हैं। हर साल तो मई में जाते थे, लेकिन इस बार पानी की दिक्कत अभी से शुरू है, इसलिए पहले चले गये। खेत में पानी कुएं से आता था, लेकिन अब उसमे पानी ही नहीं है।"

ये भी पढ़ें: बुंदेलखंड के इस ज़िले में बैलगाड़ियों पर लादकर कई किमी. दूर से लाना पड़ता है पानी


इसी गाँव के रहने वाले 70 वर्षीय गोरिया की कहानी कुछ अलग है। गोरिया कहते हैं ''मेरा बेटा कल अपनी बीवी को लेकर जिले से बाहर जा रहा है। घर में बस बूढ़े ही बचेंगे। मैं तो इस अवस्था में अब बाहर भी नहीं जा सकता। दो किलोमीटर से पानी लाना पड़ रहा है। पहले मई जून में ऐसी दिक्कत होती थी, लेकिन इस बार तो लग रहा है कि स्थिति ज्यादा ख़राब होने वाली है।''

कौड़िया की कुल आबादी दो हजार से ज्यादा है और गाँव में चार हैंडपंप भी हैं, लेकिन इनमें से बस एक ही में पानी आ रहा है, वो एक बाल्टी भरने में कम से कम एक घंटा लग जाता है।

ये भी पढ़ें: महाराष्ट्र और राजस्थान में सामान्य से कम बारिश, सूखे की आशंका से किसान परेशान


बुंदेलखंड क्षेत्र में कुल 13 जिले हैं। इसमें मध्य प्रदेश के छह जिले छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, दामोह, सागर और दतिया जबकि उत्तर प्रदेश के सात जिले झाँसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बाँदा, महोबा, कर्वी (चित्रकूट) शामिल हैं। इन जिलों में से टीकमगढ़ में सूखे की समस्या सबसे विकराल रूप लेती है।

बुंदेलखंड में पानी पर काम करने वाली संस्था परमार्थ के लिए काम करने वाले उत्तर प्रदेश झाँसी के पर्यावरण प्रेमी पंकज नौतानी कहते हैं ''पानी की समस्या अगर अभी से हो रही है तो इसका सबसे बड़ा कारण है बारिश चक्र का बिगड़ना। आप बुंदेलखंड के किसी भी गाँव में पता कर लीजिये, हर गाँव के बाहर जंगल होता था, ढेर सारे पेड़ होते थे, लेकिन लालच ने इन्हें ख़त्म कर दिया। ऐसे में पानी का स्तर गिरता जा रहा है।''

ये भी पढ़ें: वाटर स्कूल में सिखाया जाएगा किसान कैसे करें कम पानी में खेती


पंकज आगे बताते हैं कि झाँसी में भी यही हाल है। यहाँ के बबीना ब्लॉक में पानी की दिक्कत अभी से शुरू हो गयी है। लोगों ने अभी से नहाना बंद कर दिया है। अभी की स्थिति को देखते हुए तो लग रहा है कि इस बार पानी की दिक्कत और ज्यादा होने वाली है।

पिछले पांच वर्षों में चार बार सूखे की मार झेल चुके बुंदेलखंड के लिए 2018 में भी कुछ नया नहीं होने वाला। इस साल मई में कई जिलों का तापमान तो 46 डिग्री तक पहुंच गया था। इस साल मानसूनी बारिश की बात करें तो बुंदेलखंड के कुल 13 जिलों में 785.4 मिलीमीटर बारिश हुई जो सामान्य 863 मिलीमीटर से लगभग नौ फीसदी ही कम है, इस अंतर को बहुत ज्यादा नहीं कहा जा सकता।


बुंदेलखंड में हुई बारिश को अगर जिलेवार देखेंगे तो इस साल सबसे अच्छी बारिश टीकमगढ़ में ही हुई, बावजूद इसके यहाँ अभी से पानी की कमी बड़ी त्रासदी की ओर इशारा कर रही है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार टीकमगढ़ में मानसूनी सीजन 2018 में 51 फीसदी बारिश हुई, जिसे औसत से काफी बेहतर कहा जा सकता है, जबकि पिछले साल औसत के हिसाब से बारिश 21 फीसदी कम हुई थी।

ये भी पढ़ें: जल संकट की दस्तक, संभल जाएं

अपना तालाब अभियान के पुष्पेन्द्र भाई कहते हैं ''अच्छी बारिश होने के बावजूद बुंदेलखंड में इस बार भी पानी की दिक्कत और भयावह होने वाली है। अभी की स्थिति को देखते हुए तो यही कहा जसा सकता। ऐसा क्यों हो रहा है, इसके लिए भी हम ही जिम्मेदार हैं। अंधाधुंध पेड़ों की कटाई और और वाटर हार्वेस्टिंग के प्रति लापरवाह रवैया हमारे सामने कई तरह की मुश्किलें पैदा कर रहा है।''


वर्ष 2017 की केन्द्रीय ग्राउंड वाटर बोर्ड की रिपोर्ट पिछले दस वर्षों में मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड में भू-गर्भ जल का स्तर लगातार तेजी से गिर रहा है। जमीन के भीतर पानी इकट्ठा होने की प्रक्रिया बहुत कम और धीमी हो गयी है। मध्य प्रदेश का महाकौशल का इलाका भी इससे बहुत ज्यादा प्रभावित है।

उत्तर प्रदेश के जिला हमीरपुर के सुमेरपुर के रहने वाले संतोष प्रजापति कहते हैं ''हमारे यहाँ तो पिछले साल की अपेक्षा ठीक बारिश हुई थी, फिर भी पानी की दिक्कत इस साल अभी से शुरू हो गयी है। मेरे गाँव में 3000 की आबादी पर दो हैंडपंपों से ही पानी आ रहा है। मुश्किल से पीने का पानी मिल पा रहा है।''

ये भी पढ़ें: 'जल बिन मछली' बनेगा इंसान एक दिन


एक नॉन गवर्नमेंट आर्गेनाइजेशन में काम करने वाले झाँसी के मनीष बताते हैं कि झाँसी के बबीना ब्लॉक के कई ऐसे गाँव हैं जहाँ के कुएं पूरी तरह से सूख गये हैं। इससे सब परेशान हैं। गाँव वालों को अभी ठंडी के मौसम में ही दो से तीन किलोमीटर से पानी लाना पड़ रहा है।

2002 से लेकर 2016 के बीच बुंदेलखंड को आठ बार सूखा घोषित किया जा चुका है। इसके कारण क्षेत्र में कृषि पर बहुत बुरा असर पड़ा है। बुंदेलखंड क्षेत्र में 75 ब्लॉक हैं जिनमें से 65 ब्लॉक में पीने की पानी की बेहद कमी रहती है।

बुंदेलखंड में 13 जिले हैं, जिनमें 7 जिले यूपी के ( बांदा, ललितपुर, चित्रकूट, हमीरपुर,महोबा, झांसी, जालौन) जबकि मध्य प्रदेश में छतरपुर, दतिया, टिकमगढ़, दमोह, सागर, पन्ना शामिल हैं। जबकि भिंड का भी कुछ हिस्सा इस सूखे इलाके में आता है।

ये भी पढ़ें: बुंदेलखण्ड का जल संकट दूर करेगा जल मंच

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top