संवाद

‘जल बिन मछली’ बनेगा इंसान एक दिन  

कृषि प्रधान भारत की अर्थव्यवस्था को पानी का भगवान यानी इन्द्र देवता चलाते हैं। हमारे वैज्ञानिक भी इन्द्रदेव के अतिवृष्टि-अनावृष्टि के चक्रव्यूह को तोड़ नहीं पाए हैं। पिछले कुछ वर्षों से सारी दुनिया में पानी के अभाव की अधिक चिन्ता होने लगी है। इसका सर्वाधिक असर किसानों पर पड़ा है। आजादी के समय गाँवों की 80 प्रतिशत आबादी अब घट कर 70 प्रतिशत रह गई है। इसका प्रमुख कारण है जल की अनिश्चित उपलब्धता। मौसम का नियंत्रण प्रकृति या इन्द्र जो भी कहें अपने ढंग से करते हैं।

गर्मी में समुद्र की सतह से भाप बनकर पानी आसमान में जाता है, जहां पर ठंडा होकर द्रव बनकर वर्षा ऋतु में धरती पर गिरता है। इस वर्षाजल का कुछ भाग पहाड़ों पर रह जाता है, कुछ धरती के अन्दर भूजल के रूप में चला जाता है और बाकी सब वापस समुद्र में जाता है। इसे जलचक्र कहते हैं, जो हमेशा चलता रहता है। इस चक्र में यदि मानवजनित व्यवधान आया तो कभी अतिवृष्टि और कभी अनावृष्टि होती है। वैज्ञानिक लोग समय-समय पर ग्रीनहाउस प्रभाव, ओज़ोन परत में छेद, निर्वनीकरण जैसी बातों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते रहते हैं। एक मोटा सिद्धान्त है कि यदि हम प्रकृति को चैन से नहीं रहने देंगे तो प्रकृति भी हमें चैन से नहीं रहने देगी।

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किसान की खेती के लिए औसत वर्षा का महत्व नहीं है और ना ही इस बात का कि कुल कितने सेन्टीमीटर पानी बरसा, बल्कि महत्व इस बात का है कि कितने-कितने अन्तराल पर पानी बरसा। साल की पूरी बरसात में पानी न बरसे और अन्त में घनघोर पानी बरस जाए और औसत पूरा हो जाय तो इससे किसान की फसल का भला नहीं होगा।

मौसम विज्ञानी के निरंजन और उनके साथी शोधकर्ताओं ने अपनी रिसर्च का परिणाम 2013 में छापा और इन्टरनेट पर उपलब्ध कराया। इसमें कहा गया है कि 1901 से 2010 के बीच देश में 21 बार सूखा पड़ा है। समय के साथ हालात बिगड ही रहे हैं। जनवरी महीने में ग्रामीण इलाकों से गुजरते हुए देखा कि एक के बाद एक तालाब सूखे पड़े हैं। ये वही तालाब हैं जिन्हें पिछले साल सरकार ने मनरेगा के अन्तर्गत जल संचय के लिए बनवाया था। इस साल अनावृष्टि का बहाना भी नहीं चलेगा। ग्राम प्रधानों की जिम्मेदारी निश्चित की जानी चाहिए नहीं तो तालाब खुदते रहेंगे और नहरों की सफाई भी नाम के लिए होती रहेगी, किसान असहाय बना रहेगा। भूमिगत पानी की हालत और भी खराब है।

जब देश आजाद हुआ तो उत्तर भारत के अनेक भागों में कुएं से पानी निकालने में करीब 7 फीट की रस्सी लगती थी, बरसात में तो रस्सी की जरूरत हीं नहीं पड़ती थी। अब कुएं बहुत कम बचे हैं और जो बचे हैं उनसे पानी निकालने में करीब 20 फीट की रस्सी लगती है। जलस्तर इतनी तेजी से नीचे गिर रहा है कि रस्सी की लम्बाई हर साल बढ़ती जा रही है। हमारी सरकारें विदेशी मुद्रा भंडार और खाद्य भंडार की चिन्ता तो करती हैं, उन्हें बढ़ाने की कोशिश भी करती हैं, लेकिन इनसे कहीं अधिक जरूरी है जल भंडार, जो प्रकृति ने हमारे जीवन के लिए जमीन के अन्दर संचित किया है, उसे बढ़ा न सकें तो कम नहीं करना था।

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भूजल संरक्षण के लिए रिपोर्टें तो खूब बनीं, गोष्ठियां और चर्चाएं होती हैं, लेकिन राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी के प्रयास इसके आगे नहीं बढ़ते। देश के उत्तरी बलुअर क्षेत्रों में तो पर्याप्त भूजल मौजूद है, लेकिन दक्षिण भारत के चट्टानी इलाकों में जमीन के नीचे जल संचय नहीं हो पाता। चीन जैसे देशों में भी भूजल की कमी है, लेकिन उन्होंने धरती की सतह पर जल संचय करके इसकी पूर्ति की है। भूजल की मात्रा के साथ ही सबसे महत्वपूर्ण है इसे प्रदूषण से बचाना क्योंकि एक बार प्रदूषित हो जाने के बाद इसे शुद्ध करना सम्भव नहीं।

कुछ लोग तो यहां तक मानते हैं कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। वैज्ञानिकों ने समय-समय पर सरकार और समाज को आगाह किया है कि भूमिगत जल का स्तर तेजी से नीचे जा रहा है, कहीं-कहीं तो एक मीटर प्रतिवर्ष तक। जरूरत है पारम्परिक वाटर हार्वेस्टिंग और प्राकृतिक रीचार्ज की, जिसके लिए आवश्यक तैयारी नहीं हुई है। गांवों के तालाबों के या तो खेत बन गए हैं या फिर वे जलकुम्भी, काई और घास से पट रहे हैं। झील और जलाशयों में सिल्टिंग के कारण जलधारक क्षमता घट रही है। पानी के भंडारण को बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि पृथ्वी को वनस्पति से आच्छादित किया जाए। सड़कों, गलियारों, नहरों के किनारे पेड़ लगाए जाएं, तालाबों का समतलीकरण रोका जाए और धरती पर उपलब्ध जल का सदुपयोग किया जाए।

भूतल पर जल संग्रह की क्षमता जानने के लिए सघन सर्वेक्षण के द्वारा पंचायत स्तर पर आंकड़े तैयार किए जाने चाहिए। जिस प्रकार नदियों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है साल भर बहने वाली पेरीनियल नदियां और केवल बरसात मे प्रवाहमान सीजनल नदियां, उसी प्रकार पंचायत स्तर पर तालाबों के आंकड़े तैयार किए जा सकते हैं, साल भर जल से भरे रहने वाले और मौसमी तालाब। मौसमी तालाबों को वर्षभर जल से भरे रहने वाले तालाबों में परिवर्तित करके उन्हें उपयोगी बनाने का प्रयास होना चाहिए। आने वाले संकट से उबरना कठिन तो है असम्भ्व नहीं।

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जल उपयोग उतना ही महत्वपूर्ण है जितना जल संचय। यदि समझदारी से जल का उपयोग किया जाए तो मानव जाति के लिए हमेशा ही जल उपलब्ध रहेगा, लेकिन दुरुपयोग करने से बूंद-बूंद पानी के लिए मनुष्य तरस जाएगा। वास्तव में वर्तमान जल संकट विभिन्न सरकारों के लोक लुभावन प्रयासों का दुष्परिणाम है। इन सरकारों ने वैज्ञानिकों के सचेत करने पर भी ध्यान नहीं दिया। ऐसे स्थानों पर भी अनगिनत सरकारी ट्यूबवेल बनाए गए और मुफ्त बोरिंग का मौका दिया गया, जहां भूमिगत जल दस से बारह मीटर की गहराई पर है। भूवैज्ञानिकों की सलाह है कि जहां छह मीटर से अधिक गहराई पर जल स्तर पहुंच गया हो वहां सिंचाई के लिए भूमिगत जल का उपयोग नहीं करना चाहिए। इससे कम गहराई पर वाटर टेबल हो तो ही करना चाहिए।

सरकारें तालाब खोदकर मछली पालन को प्रोत्साहित करती है और उन तालाबों में पानी की कमी को भूमिगत जल से पूरा किया जाता है। मुफ्त बिजली पाकर यह काम और भी आसान हो जाता है। इसी तरह मेंथा की खेती में भूमिगत जल का बहुत दुरुपयोग होता है, जबकि चीन जैसे देशों ने मेंथा की खेती पर रोक लगाई है। यह फसल दाल और सब्जियों के बदले उगाई जाती है इसलिए और भी समस्याएं पैदा होती हैं। पानी की अधिक खपत वाली फसलों को उन क्षेत्रों में उगाया जाना चाहिए, जहां जल संकट नहीं है।

जल की कमी की पूर्ति के लिए दो उपाय सरकार ने सोचे हैं, एक तो सतह पर वर्षा जल का संचय और दूसरे भूमिगत जल को रीचार्ज करके भूजल में इजाफा। दोनों ही विधियां दूरगामी परिणाम ला सकती हैं। असली संकट इसलिए नहीं है कि पानी नहीं बरसता, बल्कि इसलिए हैं कि हम पानी की फसल को संभालते ही नहीं। उत्तर प्रदेश के लगभग 98 हजार गांवों में जलसंग्रह के लिए तालाबों की कमी नहीं है, परन्तु उनका रखरखाव नहीं होता और वे अनुपयोगी हो रहे हैं।

शायद ही किसी पंचायत के पास आंकडे़ होंगे कि मनरेगा में तालाबों की खुदाई आरम्भ होने के पहले तालाबों में कितने पानी का संचय हो सकता था और उनकी सफाई खुदाई करने के बाद जलधारक क्षमता में कितनी वृद्धि हुई। यदि तालाबों की क्षमता बढ़ेगी और वनस्पति खूब होगी तो धरती पर वर्षा जल का प्रवाह धीमा होगा और भंडारण के लिए प्रकृति को समय मिलेगा, जल भंडारण अधिक होगा।

शहरी पानी की हार्वेस्टिंग और भूजल के कृत्रिम रीचार्ज पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। कठिनाई तब हो सकती है जब वर्षाजल में वायु प्रदूषण के कारण एसिड रेन यानी अम्लीय वर्षा होती है। शहरी इलाकों में प्रदूषण अधिक है इसलिए वर्षा जल भी अधिक प्रदूषित होता है, जो पीने योग्य नहीं रहता। जमीन के अन्दर टैंक बनाकर वाटर हार्वेस्टिंग करने से वर्षा जल के स्वाभाविक भूमि प्रवेश जैसी शुद्धता नहीं रहेगी। अतः शहरी वाटर हार्वेस्टिंग और कृत्रिम रीचार्ज से जलाभाव का एक छोटा अंश ही पूरा होगा।

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भूजल का प्राकृतिक रीचार्ज होना चाहिए जिसके लिए वनस्पति आच्छादित भूमि पर वर्षाजल धीरे-धीरे बहे और उसे जमीन के अन्दर जाने का समय मिले। इस तरह वर्षा जल का कुछ भाग जमीन के अन्दर जाकर पहाड़ी और मैदानी इलाकों में संचित हो सकेगा और उसी प्रकार उपलब्ध रहेगा जैसे किसान अपने लिए बक्खारी में फसल के बाद अनाज बचाकर रखता है। यह पानी शुद्ध होता है क्योंकि जमीन के अन्दर जाते हुए छन-छन कर जाता है। इस प्रकार मनुष्य के पीने के लिए पानी का यह एकमात्र श्रोत है क्योंकि समुद्र का पानी खारा है जिसका खारापन दूर करना वर्तमान में महंगा है और सतह पर पानी प्रदूषित हो रहा है।

उत्तर भारत के अनेक भागों में जल रीचार्ज में बाधक है कंकड़ की वह परत जो जमीन के नीचे तीन चार फीट की गहराई पर चादर की तरह मौजूद है। यह परत वर्षा जल को जमीन के अन्दर घुसने नहीं देती और गर्मी के दिनों में अन्दर का पानी ऊपर आने नहीं देती। यदि इसे पंक्चर न किया गया तो बरसात में पानी नीचे नहीं घुसेगा और गर्मियों में नीचे से पौधों की जड़ों तक ऊपर नहीं पाता। जलभराव और सूखा की जड़ में यही कंकड़ की परत है।

देश के पारम्परिक पेड़ जैसे आम, जामुन, महुआ, पीपल, पकरिया, गूलर और अर्जुन की जगह अब इउक्लिप्टिस और पाप्लर के तेज बढ़ने वाले विदेशी पेड़ लगाए जाते हैं जिनकी जड़ें जमीन को उतना पंक्चर नहीं करतीं कि जमीन पानी को अन्दर जाने दे और गर्मियों में पेड़ पौधों के लिए पानी उपलब्ध रहे। यदि वर्षा जल द्वारा प्राकृतिक रीचार्ज हो सके और तालाबों, झीलों आदि में वाटर हार्वेस्टिंग हो सके तो समस्या का समाधान सम्भव है।

हमारे ध्यान में नहीं रहता कि पृथ्वी पर जल की मात्रा निश्चित है जिसे जल बजट कहते हैं। यह जल ठोस, द्रव तथा भाप तीनों अवस्थाओं में पाया जाता है। पहाड़ों पर ठोस अर्थात बर्फ की अवस्था में मौजूद है तो मैदानों में द्रव रूप में नदियों के माध्यम से समुद्र तक पहुंचता है। समुद्र की सतह से भाप बनकर पानी आसमान में जाता है, जहां पर ठंडा होकर फिर द्रव बनकर धरती पर गिरता है। यदि मनुष्य प्राकृतिक ढंग से चल रहे जल चक्र में व्यवधान न डाले तो यह चलता रहता है और जल की मात्रा निश्चित रहेगी, उसके रूप बदलते रहेंगे, जल प्रबंधन पर ध्यान देने की आवश्यकता है विशेषकर जब, कुछ भागों में खूब वर्षा होती है और वर्षा जल का बड़ा भाग नदियों के माध्यम से वापस समुद्र में चला जाता है और दूसरे भागों में कम पानी बरसता है और सूखा पड़ते हैं।

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प्रवाहमान जल यानी नदियों के किनारे नदी घाटी सम्यता के समय से ही शहर बसते गए जहां उद्योग धंधे लगाए जाते रहे जिससे औद्योगिक कचरा और मानव जनित प्रदूषक पदार्थ सब नदियों में ही जाते हैं। गंगा और यमुना के प्रदूषण पर भले ही आन्दोलन हो रहे हैं परन्तु सभी सहायक नदियों, झीलों, तालाबों और जलाशयों का पानी प्रदूषित हैं। तालाबों का जो पानी सिंचाई के काम आता था, पशु पक्षियों के पीने के और ग्रामवासियों के नहाने और कपडे़ धोने के भी काम आता था, अब पशुओं तक के पीने के काम का नहीं रहा। मछलियां और दूसरे जलजीव जो पानी की शुद्धता बनाए रखते थे प्रदूषण के कारण मर रहे हैं।

हम भूमिगत जल का बेहिसाब दोहन कर रहे हैं। खैरात की बिजली का लाभ लेकर बोर वेल और ट्यूब वेल बन रहे हैं, भूजल से मनरेगा के तालाब भरे जा रहे हैं, मछली पालन हो रहा है, उद्योग धंधों में धरती के अन्दर सुरक्षित शुद्ध पानी का प्रयोग हो रहा है और जलस्तर गिरता जा रहा है। लगातार खतरे की घंटी बज रही है। पुराने लोगों को याद होगा प्रकृति द्वारा संचित इसी भूजल ने 1967-68 में अकाल से बिहार को बचाया था। विदर्भ को नहीं बचा पा रहा हैं क्योंकि वहां संचित भूजल की कमीं है।

भूजल बचाने और भूतल पर उपलब्ध पानी का सबके लिए अधिकाधिक उपयोग के उद्देश्य से सत्तर के दशक में केएल राव ने भारत की नदियों को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव दिया था जिस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की जनता पार्टी की सरकार ने 1977 में कार्यवाही भी आरम्भ की थी। जब कांग्रेस पार्टी को 1980 में सत्ता फिर से मिली तो उसने इस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया। एक बार फिर 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने योजना को पुनर्जीवित करना चाहा और प्रयास किया, लेकिन 2004 में उनकी सरकार जाने के साथ ही नदियों को परस्पर जोड़ने की योजना भी चली गई। एक जीवन रक्षक योजना राजनीति का फुटबाल बनकर रह गई है।

यदि पर्यावरण और इकाॅलोजी के नाम पर योजनाओं का विरोध करने वाले लोग आने वाली सन्तानों को भूखे प्यासे नहीं मरने देना चाहते तो जल उपलब्धता की विसंगति से निपटने और भूजल बचाने के लिए नदियों का जाल बिछाना एक अपरिहार्य विकल्प है। बेहतर होगा कि टीवी चैनल इस प्रकार के विषयों के विशेषज्ञों की खुली बहस कराएं, न कि राजनेताओं की चोंचों में समय बिताएं। हमें यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि पानी असीमित है अथाह है और जितना चाहेंगे जमीन से लेते रहेंगे। ऐसा तभी सम्भव है जब सतह पर और जमीन के अन्दर अधिकाधिक मात्रा में जल का संचय हो और उसका विवेकपूर्ण उपयोग हो।

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भारत की धरती पर लगभग 4000 घन किलोमीटर वर्षाजल प्रतिवर्ष गिरता है जिससे विशाल बफर स्टाक बनाया जा सकता है फिर भी यह विडम्बना है कि देश पर जल संकट की काली छाया मंडरा रही है। अगले कुछ वर्ष हमें जलप्रबन्धन पर केन्द्रित करने होंगे। उत्तर भारत की बलुअर मिट्टी में वर्षाजल आसानी से धरती के अन्दर जा सकता है परन्तु चट्टानी जमीन में भूमिगत जल भंडारण कठिनाई से होता है। परेशानी भी उन्हीं इलाकों में अधिक हो रही है जहां भूमिगत पानी कम है।

देश में जल संकट इसलिए नहीं है कि पानी नहीं बरसता बल्कि इसलिए हैं कि हम पानी की बेकदरी करते है, उसे सॅभालते ही नहीं। गांवों में जलसंग्रह के लिए तालाबों की कमी नहीं है परन्तु उनमें काई, कुम्भी, घास और मिट्टी भर गई है, मनरेगा भी इन्हें पूनर्जीवित नहीं कर सका। दक्षिण भारत में मजबूरी है कि सतह के पानी से अधिक से अधिक काम चलाना है। वहां जमीन के अन्दर पानी बहुत कम है। वहां पानी पंचायत की परम्परा है जो जल प्रबंधन का ध्यान रखती है।

उत्तर भारत में कई बार किसान खेतों में नहर का पानी खोल कर घर में सो जाता है और खेत भर जाते है। इससे पानी तो बर्बाद होता ही है, मिट्टी में क्षारीयता बढ़ती है। पानी का किफायत के साथ प्रभावी ढंग से उपयोग ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर विधि द्वारा किया जाय तो पानी का कम खर्चा होगा और खेतों की मिट्टी में क्षारीयता़ भी नहीं बढ़ेगी।

नहरों की अपेक्षा तालाबों में संचित पानी किसान के लिए अधिक उपयोगी हो सकता है क्योंकि यह स्थायी रूप से उपलब्ध रह सकता है और इसमें जैविक खाद भी होती है। साठ के दशक तक तालाबों से बेड़ी द्वारा पानी निकाल कर किसान अपने खेतों की सिंचाई करते थे। उसके बाद किसान पम्पसेट द्वारा तालाबों का पानी निकालने लगे। लेकिन अब तालाबों पर भूमाफियाओं का कब्जा है, या खेत बन गए हैं या फिर उनमें पानी ही नहीं बचा। झील और जलाशयों में सिल्टिंग के कारण जलधारक क्षमता घट रही है।

ग्रामीण क्षेत्रों मे जल संचय का काम थोड़ा वैज्ञानिक ढंग से करना चाहिए। शायद ही किसी पंचायत के पास आंकडे़ होंगे कि मनरेगा में तालाबों की खुदाई आरम्भ होने के पहले तालाबों की जलधारक क्षमता कितनी थी और मनरेगा के अन्तर्गत उनकी सफाई करने के बाद जलधारक क्षमता में कितनी वृद्धि हुई। यदि तालाबों की जलग्राही क्षमता बढ़ेगी और धरती पर वनस्पति खूब होगी तो धरती पर वर्षा भी अधिक होगी और जल का प्रवाह धीमी गति से होगा जिससे जल भंडारण के लिए प्रकृति को समय मिलेगा भूजल भंडारण के लिए। पंचायत स्तर पर पानी के भंडारण को बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि सड़को, गलियारों, नहरों के किनारे पेड़ लगाए जाॅय, तालाबों का समतलीकरण रोका जाय और धरती पर उपलब्ध जल का अधिकाधिक सदुपयोग किया जाय। सघन सर्वेक्षण के द्वारा पंचायत स्तर पर ऐसे आॅकड़े और मानचित्र तैयार किए जाॅय जिससे पता लगे कि प्रत्येक पंचायत में भूतल पर जल संग्रह की कितनी क्षमता है।

जल संकट के लिए गुनहगारों में हरित क्रान्ति लाने वाली धान और गेहूं की बौनी प्रजातियां भी हैं। इन प्रजातियों ने पैदावार तो खूब बढ़ाई लेकिन पानी और खाद की खपत भी बढ़ा दी। खेती अब केवल जीवन यापन का जरिया न होकर व्यवसाय बन गई। सत्तर के दशक में किसानों को लगा हम जितना यूरिया डालते जाएॅगे पैदावार बढ़ती जाएगी लेकिन यह ज्यादा समय नहीं चला। यूरिया तो पौधे को केवल नाइट्रोजन देती है, उसे फास्फोरस और पोटाश तथा अनेक सूक्ष्म तत्व भी चाहिए। किसानों ने एनपीके अर्थात नाइट्रोजन-फास्फोरस-पोटाश बढ़ाई तब भी कुछ समय बाद प्रति एकड़ पैदावार बढ़नी बन्द हो गई क्योंकि जमीन में जस्ता, तांबा, मैंगनीज, बोरान, कैल्शियम, सल्फर जैसे सूक्ष्म तत्वों के साथ ही खाद पानी की खपत भी बढ़ती गई जिनकी पूर्ति नहीं हुई और परिणाम उल्टे मिले। पंजाब, हरियाना और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां पैदावार बढ़ी वहीं मिट्टी का स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया और जलस्तर नीचे गिरता गया।

देसी प्रजातियां पैदावार कम देती थी लेकिन रोग अवरोधी हुआ करती थीं। नई प्रजातियों में बीमारियाॅ भी बढ़ीं जिनसे छुटकारा पाने के लिए कीट-नाशक, फफूॅदनाशक और ना जाने कितने प्रकार के इन्सेक्टीसाइड और पेस्टीसाइड प्रयोग होने लगे। पानी की माॅग बढ़ रही थी, जलस्तर गिरता गया और उससे भी अधिक गम्भीर परिणाम हुए जब दवाइयाॅं छिड़कते रहने से वायु और जल का प्रदूषण बढ़ा। दवाइयों के अधिक प्रयोग से जीव जन्तुओं में वनस्पति के माध्यम से विष फैल रहा है, रसायनिक विकिरण से हवा जहरीली हो रही है यहां तक कि मनुष्यों में कैंसर की बीमारी फैल रही है। बैक्टीरिया, फफूॅद और वाइरस, यहाॅ तक कि कीड़े मकोडां़े पर दवाइयों का पहले जैसा असर नहीं होता, वे इम्यून हो रहे हैं।

कहना कठिन है कि धरती को धीरे धीरे बाॅझ और पर्यावरण को विशैला बनाने में हरित क्रान्ति को दोशी माना जाय या फिर लालची किसान को। जो भी हो, मिट्टी का स्वास्थ्य सुधारने के लिए हमें फिर गोबर, हरी खाद, खेत को आराम देना, धरती मित्र केचुआ फसल मित्र मधुमक्खी आदि की मदद लेते रहना होगा। हवा और मिट्टी के प्रदूषण के साथ ही पीने के पानी का भी संकट गहरा रहा है।

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धरती पर निर्वनीकरण से वनस्पति की चादर आधी रह गई है तथा सड़कें और मकान बनने से मिट्टी की रन्ध्रता और पारगम्यता भी घट गई है। वर्षा जल को पृथ्वी के अन्दर प्रवेश में कठिनाई है। बढ़ती हुई आबादी, शहरीकरण और औद्योगीकरण, खेतों में पानी की बढ़ी खपत ने भूमिगत पानी पर सर्वाधिक दबाव डाला़ है। आवश्यकता है पानी के भंडार को बर्बाद होने और प्रदूषण से बचाने की।

अनेक प्रदेशों में परस्पर विरोधी परिस्थितियाॅ हैं, कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा, बुन्देलखंड जैसे क्षेत्रों में भूमिगत पानी बहुत नीचे चला गया है जबकि तराई में यह बहुत ऊपर है। अतः तराई में तो भूमिगत पानी का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाना उचित है परन्तु बुंदेलखंड में नहीं होना चाहिए। कई बार अज्ञानतावश भूमिगत पानी से मनरेगा द्वारा बने मछली पालन के तालाब भरे जाते हैं जहाॅ से पानी का वाष्पीकरण होकर धरती के अन्दर का बहुमूल्य पानी नष्ट होता है। ऐसे उपाय खोजने की आवश्यकता हैं जिससे खर्च किए गए भूमिगत पानीे की भरपाई (रीचार्ज) होती रहे।

पानी के खर्चे में किफ़ायत, जलप्रबंधन का अभिन्न अंग है। किसानों और जनसाधारण को इस बात की जानकारी दी जानी चाहिए कि पत्तियां पौधे की रसोई हैं जहां वे अपना भोजन बनाते हैं अतः जड़ में बार बार पानी भरने के बजाय पत्तियों पर पानी छिड़कने (स्प्रिंकलर द्वारा) से कम पानी लगेगा और अधिक लाभ मिलेगा। वर्तमान में सिंचाई के पानी से पौधों के उपयोग में केवल 30 प्रतिशत पानी आता है। अतः केवल सिंचाई में पानी की किफायत करके बिना पैदावार घटाए ही पानी की बहुत बचत सम्भव है। इसके साथ ही चीनी और कागज उद्योगो तथा सीवर लाइनों का कचरा पानी को प्रदूषित कर रहा है, भूमिगत पानी भी प्रदूषित हो रहा है।

जल उपयोग के लिए जलनीति बनाने की आवश्यकता है। अमेरिका जैसे देशों में जल संसाधन नियंत्रण बोर्ड (वाटर रिसोर्स कन्ट्रोल बोर्ड) और जल अधिकार विभाग (वाटर राइट्स डिवीजन) बने हैं जिन मे जिला परिषद, कृषक मंडल, उद्योगपति और स्वयंसेवी संस्थाओं का प्रतिनिधित्व रहता है।

यदि ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध पेय जल की उचित व्यवस्था की जाय तो गांव का इलाका उसी तरह शहरों को पेय जल दे सकता है जैसे अनाज, फल और सब्जियां देता है । यदि गांवों के तालाबों की रक्षा हो सके और उन्हें भूमाफियाओं से बचाया जा सके तो सिंचाई के लिए पानी कम नहीं पड़ेगा । गांवों में यदि उद्योग लगाए जायं तो उनके लिए भी यह पानी उपलब्ध रहेगा । आजकल भूतल पर मौजूद पानी से पहले की अपेक्षा एक चैथाई क्षेत्र में ही सिंचाई हो रही है । यदि सिंचाई का काम भूतल पर मौजूद जल से हो सके तो भूजल बचाया जा सकता है और शहरों को भेंजा जा सकता है ।

मौसम ने अपना धर्म बदल दिया है तो हमें भी अपनी रणनीति बदलनी होगी । हमें अध्ययन करना चाहिए कि इजराएल ने कम पानी होते हुए रेगिस्तानी इलाके में किस तरह फसलों और सिंचाई का तालमेल बिठाया और किस तरह अच्छी पैदावार ली। इसी तरह दुनिया में अतिवृष्टि के इलाके भी कम नहीं हैं उनका अनुभव हमारे काम आ सकता है । हमारे यहां इस पर पर्याप्त रिसर्च नहीं हुई है कि किसान को प्रभावी सिंचाई के लिए सस्ते दामों पर उपकरण कैसे मिलें।

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