जब आलू का अकाल पड़ने से 10 लाख लोगों की हुई थी मौत, 10 लाख ने छोड़ा था ये देश

जब आलू का अकाल पड़ने से 10 लाख लोगों की हुई थी मौत, 10 लाख ने छोड़ा था ये देश

भारत में सब्जियों का राजा कहा जाता है आलू।

उत्तर प्रदेश के आलू किसानों का हाल इस समय बेहाल है। माटीमोल आलू सड़कों पर मुफ्त फेंक दिया गया है। ये पहली बार नहीं है जब आलू की दुर्दशा हुई है। हमारे यहां आलू सब्जियों का राजा कहा जाता है, लेकिन राजा को उगाने वाले किसान दयनीय हालत में पहुंच गए हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज से 172 साल पहले एक देश में आलू का अकाल पड़ा था, जो इतिहास में आलू के महान अकाल के रूप में दर्ज़ है। वो देश था आयरलैंड।

आयरलैंड में 1845 से 1849 के बीच आलू की फसल पूरी की पूरी ख़राब हो गई। यहां की लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या अपनी भूख आलू से ही मिटाती थी। इस अकाल का ऐसा असर हुआ कि लगभग 10 लाख लोगों ने देश छोड़ दिया और 10 लाख लोगों की मौत हो गई। जिससे आयरलैंड की जनसंख्या उस वक्त अचानक 20 से 25 फीसदी कम हो गई।

क्यों पड़ा था अकाल

वेबसाइट ब्रिटेनिका के मुताबिक, उस वक्त आलू की फसल में लेट ब्लाइट (पछेती झुलसा) बीमारी लग गई थी। इस बीमारी में आलू के पत्ते और उसकी जड़ दोनों ही ख़राब हो जाते हैं। यह बीमारी फाइटोपथोरा नामक कवक के कारण फैलती है। लगभग पूरे यूरोप में आलू की फसल में इस रोग का प्रकोप था लेकिन सबसे ज़्यादा असर आयरलैंड पर ही पड़ा था।

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बदल गया था पूरा देश

यह अकाल आयरलैंड के इतिहास में एक जलजले की तरह दर्ज़ है, जो तब ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड के यूनाइटेड किंगडम का हिस्सा था। अकाल और इसके प्रभाव ने स्थायी रूप से वहां के जनसांख्यिकीय, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को बदल दिया। यह अकाल आयरिश राष्ट्रवादी आंदोलनों के लिए शक्ति जुटाने का एक बिंदु बन गया। कई आयरिश और ब्रिटिश क्राउन के बीच पहले से तनावपूर्ण रिश्ते थे जो आगे बढ़कर जातीय और सांप्रदायिक तनाव में बदल गए। आयरलैंड में आयरिश राष्ट्रवाद और गणतंत्रवाद को बढ़ावा मिला जिससे यहां से लोगों का पलायन शुरू हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य जगहों में आयरिश लोगों की जनसंख्या बढ़ने लगी।

क्या रहे थे कारण

जनवरी 1801 में संघ के अधिनियमों के बाद से, आयरलैंड यूनाइटेड किंगडम का हिस्सा रहा था। कार्यकारी शक्तियां आयरलैंड के लॉर्ड लेफ्टिनेंट और आयरलैंड के मुख्य सचिव के हाथों में थी, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने नियुक्त किया था। आयरलैंड ने संसद के 105 सदस्यों को यूनाइटेड किंगडम के हाउस ऑफ कॉमन्स को भेजा, और आयरिश प्रतिनिधि के साथियों ने हाउस ऑफ लॉर्ड में जीवन के लिए बैठने के लिए अपने स्वयं के 28 नंबर का चुनाव किया। 1832 और 1859 के बीच, आयरिश प्रतिनिधियों के 70% भूमि मालिक थे या ज़मीन मालिकों के पुत्र थे।

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19वीं शताब्दी की शुरुआत में, आयरलैंड के किराये के किसानों को विशेष रूप से आयरलैंड के पश्चिम में एक वर्ग के रूप में खुद को स्थापति करने और ब्रिटिश बाजार को अनाज फसलों की आपूर्ति करने के लिए संघर्ष करना पड़ा।

भूख से मर रहे आयरिश लोगों ने आलू की सरकारी दुकान पर हमला कर दिया था। चित्र - लंदन न्यूज़. जून, 1942

कई किसान लंबे समय से हाशिए पर थे। उनके लिए बहुत छोटे खेत आवंटित किए गए थे। आलू 18 वीं शताब्दी तक आयरलैंड में एक प्रमुख फसल बन गया था, क्योंकि इसमें पोषक तत्व व कैलोरी की मात्रा अच्छी होती है। आयरलैंड की मिट्टी इसकी फसल के लिए उपयुक्त भी थी। 1840 तक आयरलैंड की लगभग आधी आबादी, मुख्य रूप से गाँव के गरीब लोग, अपनी भूख मिटाने के लिए आलू पर निर्भर हो चुके थे। बाकी की आबादी भी इसे अधिक मात्रा में इस्तेमाल करती थी।

आलू के दाम अचानक से गिरने से आलू की अगैती फसल का किसानों को दाम नहीं मिल रहा है।

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किसान केवल एक या दो उच्च उपज देनी वाली आलू की किस्मों पर निर्भर हो गए, जिसने आनुवांशिक किस्मों को कम कर दिया है, जो आम तौर पर बीमारी से पूरी फसल का नाश होने से रोकती हैं। यहां के आलू में रोगों से लड़ने की क्षमता कम होती गई।

लिवरपूल, इंग्लैंड में पहुंचने वाले आयरिश आलू के अकाल के शिकार। चित्र- लंदन न्यूज़, जुलाई 6, 1850 में छपा।

1845 में, फाइटोपथोरा नामक कवक उत्तरी अमेरिका से यहां पहुंच गया इसी वर्ष आयरलैंड में असामान्य रूप से ठंडा और नम मौसम था। उस वर्ष की आलू की ज़्यादातर फसल खेतों में खड़ी थी। उस साल कुछ फसल पर लेट ब्लाइट रोग लग गया लेकिन 1846-49 में अधिक ये अधिक विनाशकारी साबित हुआ क्योंकि धीरे - धीरे इस रोग का प्रकोप फसल पर बढ़ता गया और लगभग सारी फसल बर्बाद हो गई।

एक विधवा महिला व भूख से मरता हुआ उसका बच्चा

भूख से मर रहे आयरिश किसानों के लिए खाना उपलब्ध कराने का वित्तीय बोझ आयरिश जमीन मालिकों पर और ब्रिटिश भूमि मालिकों पर आ गया। क्योंकि किसान अपने किराए का भुगतान करने में असमर्थ थे, हालांकि, जमींदारों ने जल्द ही उन्हें धन का समर्थन दिया जिससे उनके पास भी रुपये खत्म हो गाए, और नतीजा यह हुआ कि संकट के वर्षों में सैकड़ों आयरिश किरायेदार किसानों और मजदूरों को बेदखल कर दिया गया।

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1834 का ब्रिटिश ‘गरीब कानून’, जो आयरलैंड में 1838 में अधिनियमित किया गया था, की शर्तों के तहत, जो शरीर से ठीक ठाक लोग थे उन्हें अकाल से राहत देने के बजाय काम करने के लिए कारखानों में भेज दिया गया। ब्रिटिश सहायता बस कर्ज़ देने तक सीमित थी। ये सरकार सूप किचन को फंड करने में मदद करती थी व सड़क निर्माण और अन्य सार्वजनिक कार्यों पर रोजगार देती थी।

अकाल से पीड़ित लोग 1890 में जहाज़ से उत्तरी अमेरिका जाते हुए

आयरलैंड के नागरिकों को मकई आयात करके उसका सूप उपलब्ध कराया गया जो वहां के लोगों को पसंद नहीं आया। सिर्फ इस पर ही निर्भर रहने से वहां के लोगों में पोषण संबंधी कमियां पैदा होती गईं। इन कमियों के बावजूद अगस्त 1847 तक 30 लाख लोगों को सूप किचन से राशन बांटा गया और ब्रिटिश सरकार ने लगभग 8 मिलियन यूरो उस वक्त इस राहत पर खर्च कर दिए लेकिन फिर भी वह सारी आयरिश जनता को आहार उपलब्ध नहीं करा पाई।

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जिसका असर ये हुआ कि 1844 में आयरलैंड की जो आबादी लगभग 80 लाख 40 हज़ार थी जो 1851 तक घटकर 60 लाख 60 हज़ार रह गई। लगभग दस लाख लोग भुखमरी या टाइफाइड से और अन्य अकाल से संबंधित बीमारियों से मर गए। यहां से पलायन करने और निम्न जन्म दर की वजह से आयरलैंड की जनसंख्या में भारी गिरावट आई। 1921 में जब आयरलैंड को आज़ादी मिली उस वक्त यहां की जनसंख्या 1840 के मुकाबले आधी रह गई थी।

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