क्या किसान आक्रोश की गूंज 2019 लोकसभा चुनाव में सुनाई देगी ?

क्या किसान आक्रोश की गूंज 2019 लोकसभा चुनाव में सुनाई देगी ?आम चुनाव 2019 में किसान की नाराजगी का क्या फर्क पड़ेगा क्या ?

अब मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा समेत कई राज्यों के किसान 1 जून से 10 जून तक गांव बंद का ऐलान कर चुके हैं। किसान संगठनों ने ऐलान किया है कि वो इन 10 दिनों में अपनी सब्जियां, दूध दही, और अनाज शहरों को नहीं भेजेंगे।

2017 के बाद 2018 भी किसान आंदोलनों और प्रदर्शनों के नाम जा रहा है। फरवरी में दिल्ली, हरियाणा में प्रदर्शन और घेराव हुए तो मार्च में 40 हजार किसानों ने महाराष्ट्र में अपनी ताकत दिखाई। जबकि मार्च के दूसरे हफ्ते में हजारों किसानों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया। अब मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा समेत कई राज्यों के किसान 1 जून से 10 जून तक गांव बंद का ऐलान कर चुके हैं। किसान संगठनों ने ऐलान किया है कि वो इन 10 दिनों में अपनी सब्जियां, दूध दही, और अनाज शहरों को नहीं भेजेंगे।

प्रदर्शनों का सिलसिला आगे भी जारी रह सकता है, क्योंकि 2019 में आम चुनाव हैं। किसानों को ये ताकत गुजारत विधानसभा चुनाव में ग्रामीण इलाकों में वोट प्रतिशत के बाद मिली है। ग्रामीण इलाकों में जीत के लिए गुजरात बीजेपी को काफी मशक्कत करनी पड़ी। जबकि इसी साल राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव हैं।

मोदी सरकार ने 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बात की है। किसान और किसान संगठन, विपक्षी पार्टियां किसानों की दशा को लेकर सरकार पर हमले बोल रही हैं। 2017 में किसान आंदोलन की शुरुआत मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से हुई थी जब वहां फल और सब्जियों की किसानों की अच्छी कीमत नहीं मिल रही थी।

अपनी उपज को सड़कों पर फेंकने को मजबूर होने का दर्द नेता या अधिकारी नहीं, उसे उगाने वाला किसान ही समझ सकता है। इस बार भी कई इलाकों से टमाटर फेंकने की ख़बरें आई हैं। पंजाब खेती का खर्च बढ़ने से करीब 33 लाख किसान कर्ज में डूबे हैं तो सूखे की मार झेल रहे कर्ज़ में दबे तमिलनाडु के किसान दिल्ली तक धावा बोल चुके हैं।

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उत्तर प्रदेश का किसान भी कर्ज़ माफ़ी पर संशय की स्थिति में है। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 79 लाख से ज्यादा किसान परिवार कर्जे में दबे हैं। देश में सबसे ज्यादा कर्जदार यूपी से हैं। किसान की नाराजगी उसके बढ़ते खर्च, कर्ज और खेती से घाटे को लेकर है। खेत में पैदा हुए अनाज, फल और सब्जी की सही कीमत न मिलने से भड़के इन किसानों का आक्रोश 2019 के चुनावों में दिख सकता है।

पिछले दिनों मध्यप्रदेश में किसानों ने अपना प्याज पशुओं से चरवा दिया तो महाराष्ट्र में संतरा और सोयाबीन माटी मोल बिक गई। मध्य प्रदेश में एक जून से शुरू हुएआंदोलन के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आठ रुपए किलो पर प्याज खरीदने का ऐलान किया, इधर महाराष्ट्र सरकार भी किसान आंदोलन को शांत कराने केलिए कई मांगों पर विचार का वादा कर चुकी है।

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महाराष्ट्र में किसानों ने दूध सड‍़क पर बहा दिया।

2017 में आलू किसानों को भाव नहीं मिले, (हालांकि 2018 में हालात अपेक्षाकृ्त बेहतर हैं) । तब प्रचंड बहुतम ये यूपी की सत्ता में आई योगी सरकार ने आलू का समर्थन मूल्य तय करके किसानों को राहत देने की कोशिश की, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।

वहीं पंजाब में आत्महत्याओं का सिलसिला जारी है। किसानों के लिए कई बड़े वादे करके सत्ता में आए कैप्टन अमरिंदर सिंह के पंजाब में आत्महत्याओं का सिलसिला जारी है। केंद्र की नरेंद्र मोदीसरकार वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बात बार-बार दोहराती रही है, लेकिन किसानों का कहना है तो आमदनी बढ़ना तो दूर लागत नहीं निकल पा रही है, जिसके चलते वो कर्ज में दबते जा रहे हैं। किसान, किसान नेताओं और नीति विश्लेषकों का कहना है जब तक किसानों की उपज का मूल्य निर्धारित नहीं होगा,किसान की आमदनी नहीं बढ़ेगी।

मोदी सरकार ने बजट में जो न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की बात कही उस पर लगातार सरकार की आलोचना हुुई। किसान नेताओं ने वादाफरेबी का आरोप लगाया।

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ग्रामीण मामलों के प्रसिद्ध जानकार और मैग्सेसे अवॉर्ड विजेता पी. साईंनाथ मानते हैं कि ये आंदोलन अब रुकने वाला नहीं है। 2017 में गाँव कनेक्शन से फ़ोन साक्षात्कार में उन्होंने बताया, "पिछले दो दशकों में अकेले महाराष्ट में ही 65 हजार किसान जान दे चुके हैं। किसानों के लिए कर्ज ही नहीं, बल्कि उनकी उपज का उचित लाभ मिले, यह भी बड़ामुद्दा है। मगर केन्द्र से लेकर प्रदेश सरकारों का ध्यान किसानों को मुख्य मुद्दे पर नहीं है।"

महाराष्ट्र में आंदोलन में शामिल संगठन किसान हेल्प के राष्ट्रीय सचिव देवानंद निकाजू कहते हैं, "2017 महाराष्ट्र में संतरा सड़क पर फेंका गया था, कभी 4-5 रुपए पीस का दाम मिलता था इस बार 1 रुपया मुश्किल था। ऐसा ही हाल कपास और सोयाबीन का भी है। अगर यही हाल रहा तो 2019 के चुनाव में किसान इसका जवाब देंगे।"

विधानसभा चुनाव की बात करें तो राजस्थान और मध्य प्रदेश में किसान संगठन अपनी ताकत दिखा रहे हैं। शिवराज सरकार ने एक के बाद एक कई घोषणाएं की हैं लेकिन संपूर्ण कर्ज माफी समेत कई मुद्दों को लेकर किसान आवाज उठा रहे हैं। आम आदमी किसान यूिनियन से जुड़े कृषि विशेषज्ञ केदार सिरोही कहते हैं, "कृषि प्रदेश का विषय है तो सरकार कुछ भी कर सकती है। सरकारें कहती हैं,किसानों की आमदनी बढ़ाएंगे, लेकिन कैसे? शहर में दूध 60-70 रुपए बिकता है, जबकि गाँव में वही 20 में खरीदा जाता है। कमाई बिचौलिए कर रहे हैं, इन्हें हटाए बिनाकुछ नहीं होगा। सरकार को कर्ज़माफी, स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू ही करनी ही होगी।"

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2017 में किसानों ने अपनी फसलें सड़कों पर फेंक दी।

हेल्प संगठन के राष्टीय अध्यक्ष डॉ. आरके सिंह कहते हैं, "किसानों की यह दुर्दशा कोई दो वर्ष, पांच वर्ष में बनी नीतियों की बात नहीं, कृषि क्षेत्र में अनुभवहीन नीतिनिर्धारकों द्वारा 6-7 दशकों में लिये गये गलत निर्णयों का आत्मघाती परिणाम है और सभी राजनीतिक दल अपने गलत निर्णयों के लिए अनुपातिक रूप से जिम्मेदार हैं।"

वर्ष 2008 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अन्तर्गत किसानों की दशा के मूल्यांकन के लिए एक सर्वेक्षण 'द सिचुएशन एसेसमेंट सर्वे ऑव फारमरस्‌' नाम से किया गया। इसअध्ययन के अनुसार, घाटे का सौदा मानकर लगभग 27 फीसदी किसान खेती करना नापसंद करते हैं। 40 प्रतिशत किसानों का कहना है कि विकल्प होने की स्थिति में वेकोई और काम करना पसंद करेंगे।"

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देश में किसानों की हालत किस कदर बदतर होती जा रही है, उससे कृषि प्रधान देश में किसानों की घटती जनसंख्या से आसानी से समझा जा सकता है। किसान हेल्प के डॉ. आरके सिंह बताते हैं, "देश का आबादी जिस रफ्तार से बढ़ी है उससे किसान बढ़ने चाहिए थे, लेकिन जनगणना, 2001 के अनुसार जहां वे 127 लाख थे, वहीं जनगणना2011 में ये घट कर 118.7 लाख रह गये हैं। इसकी मुख्य वजह खेती का फायदे का न होना और जमीनों का खत्म होना है।"

  • 33 लाख किसान पंजाब में कर्ज में डूबे
  • 79 लाख से ज्यादा किसान परिवार उत्तर प्रदेश में कर्जे में दबे
  • 65 हजार किसान पिछले दो दशकों में अकेले महाराष्ट में ही दे चुके हैं जान
  • 60 हजार करोड़ से ज्यादा कर्ज मध्य प्रदेश के 50 लाख किसानों पर
  • नोट- ये खबर मूलरुप से 2017 में गांव कनेक्शन में प्रकाशित की गई थी।

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