Apple Crisis: मौसम का खतरनाक पैटर्न! हिमाचल में तीसरे साल भी सेब की फसल पर संकट; बर्फबारी से बागानों को भारी नुकसान
हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादक क्षेत्रों में अप्रैल महीने में हुई बर्फबारी, ओलावृष्टि और लगातार बारिश ने बागवानों की चिंता कई गुना बढ़ा दी है। शिमला जिले के बागी, रत्नारी, बालसां और चोपल जैसे प्रमुख सेब बेल्ट में इस बार पीक ब्लूम (फूल आने के समय) के दौरान मौसम की मार ने फसल पर बड़ा खतरा खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति बेहद नुकसानदेह है और लगातार तीसरे साल इस तरह का मौसम एक खतरनाक ट्रेंड बनता जा रहा है।
पीक ब्लूम के समय बर्फबारी से बढ़ा खतरा
अप्रैल का महीना सेब के पेड़ों में फूल और गुलाबी कलियों के विकसित होने का अहम समय होता है। ऐसे में बर्फबारी और अचानक तापमान गिरने से फूल झड़ने और फल बनने की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है। इसके साथ ही परागण (पॉलिनेशन) की प्रक्रिया भी बाधित हो सकती है, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट संभव है।
ओलावृष्टि और बर्फ से बागों को भारी नुकसान
हाल के दिनों में लगातार ओलावृष्टि और बारिश के बाद अब बर्फबारी ने बागानों को दोहरी मार दी है। सेब के पेड़ों की सुरक्षा के लिए लगाए गए एंटी-हेल नेट (ओलावृष्टि से बचाव के जाल) बर्फ के वजन से दबकर टूट गए हैं, जिससे बागवानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है।
इस तरह की परिस्थितियों में किसान जहां साफ धूप और अनुकूल तापमान की उम्मीद करते हैं, वहीं लगातार खराब मौसम ने पूरे सीजन को प्रभावित कर दिया है।
तापमान गिरने से पाला पड़ने का खतरा
अचानक तापमान में गिरावट के कारण पाला पड़ने का खतरा भी बढ़ गया है। पाला पड़ने से सेब के पेड़ों की कलियां और फूल गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं, जिससे आने वाली फसल पर सीधा असर पड़ेगा। विशेषज्ञों के अनुसार यदि तापमान लंबे समय तक कम बना रहता है, तो नुकसान और बढ़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन का असर, बन रहा नया पैटर्न
वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों से हिमाचल के सेब बेल्ट में इस तरह के मौसम बदलाव बार-बार देखने को मिल रहे हैं। इसे अब एक ‘पैटर्न’ के रूप में देखा जा रहा है, जो राज्य की बागवानी अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था में सेब उत्पादन की बड़ी भूमिका है और इस तरह की प्राकृतिक आपदाएं इस सेक्टर की स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।