मल्टीनेशनल कंपनी को छोड़ चुनी किसानी, करते हैं अमरूद और हल्दी की स्मार्ट खेती

Gaon Connection | Jan 03, 2026, 16:04 IST
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जहाँ आमतौर पर किसान शब्द सुनते ही हमारे दिमाग़ में जो छवि बनती है वो धोती-कुर्ता पहने एक बुजुर्ग व्यक्ति की होती है, जिसके हाथ में हल हो और वो मटीले हाल में खेतों में काम कर रहा हो । लेकिन अब हमारे बीच एक ऐसा किसान आ गया है जो सूट-बूट पहनता है । मिलिए मनीष महेश्वरी से , जिन्होंने मल्टीनेशनल कंपनियों में CFO की नौकरी छोड़ लखनऊ के पास अमरूद और हल्दी की ऑर्गेनिक खेती शुरू की।

<p>अमरूद और हल्दी की स्मार्ट खेती​</p>
आजकल जहाँ ज़्यादातर लोग खेती से दूर होते जा रहे हैं, वहीं कुछ पढ़े-लिखे लोग इसे एक नया मौका मान रहे हैं। ‘मनीष महेश्वरी’ उन्हीं लोगों में से एक हैं। उन्होंने बड़ी-बड़ी कंपनियों में ‘सीएफ़ओ’ (चीफ़ फ़ाइनेंशियल ऑफ़िसर) के तौर पर काम किया, लेकिन फिर कॉर्पोरेट की दौड़-भाग भरी ज़िंदगी छोड़कर खेती करने का फैसला लिया।

मनीष गाँव कनेक्शन से कहते हैं, “खेती ऐसा काम है जिसमें इंसान रिटायरमेंट नहीं होता। जब तक शरीर में ताकत है, तब तक कोई भी किसान अपने खेत में काम कर सकता है।" उनके लिए खेती सिर्फ़ रोज़गार नहीं, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य और मानसिक सुकून का साधन बन गई है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास उनका ‘14 एकड़ का फ़ार्म’ है, जो उन्होंने लीज़ पर लिया है। वहाँ उन्होंने ‘थाई अमरूद’ के लगभग 12,000 पेड़ लगाए हैं। उन्होंने अपने खेत को इस तरह बनाया है कि एक ही ज़मीन पर ‘अमरूद के साथ हल्दी’ भी उगाई जा सके, ताकि आमदनी के और रास्ते बनें।

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शुरुआत में मनीष ने रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल किया, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि इससे खर्च भी बढ़ता जा रहा था और साथ ही मिट्टी की सेहत भी बिगड़ रही थी।तब उन्होंने ‘ऑर्गेनिक खेती’ शुरू की। अब वे गोबर, नीम, सरसों की खली, गोमूत्र और गुड़ से बनी प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल करते हैं। इससे खेती सस्ती भी हो गई और मिट्टी पहले से ज़्यादा उपजाऊ बन गई।

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फलों को कीड़ों से बचाने के लिए वे ‘बैगिंग तकनीक’ अपनाते हैं, यानी हर अमरूद को एक पेपर बैग से ढँक दिया जाता है। इससे फल साफ़, चमकीले और बिना दवा के तैयार होते हैं। यह अमरूद अंदर से ‘हल्का गुलाबी’ होता है और लोग इसे बहुत पसंद करते हैं। मनीष के मुताबिक़, अमरूद की खेती से साल में ‘तीन बार फल’ मिल सकते हैं, लेकिन वे सर्दी और ठंड के बाद वाली फसल को ज़्यादा तरजीह देते हैं क्योंकि बरसात में नुकसान ज़्यादा होता है।

एक एकड़ में वे करीब ‘4 से 5 लाख रुपए तक कमा लेते हैं’, हालांकि इसमें 2–3 लाख रुपए का खर्च भी होता है। उनकी कहानी हमें यही सिखाती है, कि अगर हम दिल से चाह लें, तो मिट्टी से भी सोना उगाया जा सकता है।
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