Image credit : Gaon Connection Network
आज खेती केवल मेहनत नहीं बल्कि विज्ञान, अनुशासन और समझदारी का काम बन चुकी है। अगर किसान खेत की लेवलिंग, मिट्टी की सेहत और फ़सल चक्र पर ध्यान दें, तो खेती न सिर्फ़ टिकाऊ बल्कि ज़्यादा लाभदायक हो सकती है। बहराइच के किसान जय सिंह इसी सोच के प्रतीक हैं।
इनकी कहानी उस सोच को चुनौती देती है, जिसमें खेती को घाटे का सौदा माना जाता है। विज्ञान की पढ़ाई करने के बाद खेती को अपनाने वाले जय सिंह ने यह साबित किया है कि यदि खेती वैज्ञानिक सोच, अनुशासन और सही प्रबंधन के साथ की जाए, तो यह न केवल एक सम्मानजनक पेशा बन सकती है, बल्कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक बच्चों को शिक्षा दिलाने का सपना भी पूरा किया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले के मिर्जापुर तिलक गाँव के रहने वाले वाले जय सिंह ने एमएससी (बायोकेमिस्ट्री) की पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी करने के बाद परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि उन्हें खेती की ओर लौटना पड़ा। शुरुआत हुई पारंपरिक खेती से, जो आसपास के किसान करते थे। गन्ना, धान और दूसरे कई फ़सलें उगाईं। लेकिन जय सिंह मानते हैं कि खेती में बदलाव एक झटके में नहीं आता। इसके लिए समय, धैर्य और सीखने की इच्छा जरूरी होती है। वे कहते हैं कि किसी भी नए प्रयोग को पहले छोटे स्तर पर करना चाहिए, ताकि नुकसान की आशंका कम रहे और अनुभव बढ़ता जाए।
जय सिंह की खेती तीन बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित है। पहला सिद्धांत है खेत की सही लेवलिंग, यानी ज़मीन का पूरी तरह समतल होना। उनका कहना है कि यदि खेत ठीक से समतल हो जाए, तो सिंचाई और पोषक तत्वों का वितरण अपने आप बेहतर हो जाता है। दूसरा सिद्धांत है मिट्टी की सेहत। वे मिट्टी में जैविक पदार्थ, यानी ह्यूमस, को खेती की आत्मा मानते हैं। अपने गुरु के शब्दों को दोहराते हुए वे कहते हैं,
जय सिंह कहते हैं, "जैविक तत्वों के बिना खेती लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती। तीसरा सिद्धांत है फ़सल चक्र, यानी हर साल एक ही फसल न उगाकर फ़सलों को बदलते रहना। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और रोगों का खतरा कम होता है।"
इस समय जय सिंह करीब 55 एकड़ ज़मीन पर खेती कर रहे हैं। उनकी मुख्य फ़सलें आलू और केला हैं। वे रोटेशन के आधार पर खेती करते हैं, एक साल आलू, अगले साल केला। जय सिंह बताते हैं, "कम कीमत वाली फ़सल से थोड़ा मुनाफ़ा कमाने के बजाय ऐसी फ़सल चुननी चाहिए, जो कम क्षेत्र में भी अधिक मूल्य दे सके। इसी सोच के चलते उन्होंने आलू और केले की खेती को अपनाया।"
केले की खेती में जय सिंह का अनुशासन और योजना ख़ास तौर पर चर्चा में रहती है। वे हर पौधे की ऊँचाई, उसकी बढ़त और समय-सीमा का पूरा रिकॉर्ड रखते हैं। इसके लिए उनके पास चार्ट और ग्राफ़ होते हैं, जिनसे वे यह देखते हैं कि पौधे सही दिशा में बढ़ रहे हैं या नहीं। उनका लक्ष्य खेत में समानता बनाए रखना है, ताकि सभी पौधे एक जैसी स्थिति में रहें। इससे उत्पादन बेहतर होता है और कीट एवं रोगों का प्रकोप भी कम होता है। ख़ास बात यह है कि उनकी केले की खेती लगभग उर्वरक-मुक्त है और पूरी तरह नियंत्रित प्रबंधन पर आधारित है।
आलू की खेती में भी जय सिंह बाज़ार को ध्यान में रखकर फ़ैसले लेते हैं। वो कहते हैं, "किसान के लिए सबसे ज़रूरी है अपनी लागत निकालना। मार्च में जब आलू तैयार होता है, तो वे फ़सल का बड़ा हिस्सा तुरंत बेच देता हूँ, ताकि उनकी पूँजी सुरक्षित हो जाए। इसके बाद बची हुई फ़सल को वे बाज़ार की स्थिति देखकर स्टोर करता हूँ या धीरे-धीरे बेचता हैू।" जय सिंह का मानना है कि आलू जैसी फ़सलें जोखिम से भरी होती हैं, इसलिए समय पर सही निर्णय लेना बेहद ज़रूरी है।
जय सिंह अपने खेत में काम करने वाले लोगों को केवल मज़दूर नहीं मानते, बल्कि अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं। वे कहते हैं कि बिना श्रमिकों के किसान कुछ नहीं कर सकता। अपने गुरु की सीख “मज़दूर को बिना पानी पिलाए खुद पानी मत पीना।” को वे आज भी निभाते हैं।
इसी सोच के कारण उनके साथ काम करने वाले लोग लंबे समय तक जुड़े रहते हैं और काम का माहौल सकारात्मक बना रहता है।
खेती से हुई आमदनी का सबसे बड़ा उदाहरण उनके बच्चों की शिक्षा है। उनका बेटा कई साल तक अमेरिका में काम कर चुका है, जबकि उनकी बेटी इंग्लैंड के प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं। जय सिंह कहते हैं, "माता-पिता का सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी बच्चों को अच्छी शिक्षा देना है, ताकि वे अपने जीवन के फ़ैसले खुद ले सकें और आत्मनिर्भर बनें।"
सरकार और बाज़ार को लेकर जय सिंह की राय संतुलित है। वे मानते हैं कि बाज़ार मांग और आपूर्ति से चलता है और सरकार की भी अपनी सीमाएँ होती हैं। हालांकि, वे यह भी कहते हैं कि बीते कुछ वर्षों में खेती की लागत जिस तेज़ी से बढ़ी है, उस अनुपात में किसानों को अपनी उपज का सही दाम नहीं मिला है। इसी कारण आज किसान दबाव में है।
यह भी पढ़ें:-रबी की बुवाई में रिकॉर्ड बढ़ोतरी: 2025–26 में 8 लाख हेक्टेयर से ज़्यादा इज़ाफा
नए किसानों को सलाह देते हुए जय सिंह कहते हैं, "यदि किसी के पास पर्याप्त ज़मीन और संसाधन हैं, तो उसे पूरे आत्मविश्वास के साथ खेती में आना चाहिए। छोटे किसानों के लिए वे बागवानी फ़सलों को बेहतर विकल्प मानते हैं, क्योंकि कम ज़मीन में भी इनसे अच्छी आमदनी संभव है।"
जय सिंह की कहानी यह संदेश देती है कि यदि खेती को वैज्ञानिक सोच, अनुशासन, मेहनत और इंसानियत के साथ किया जाए, तो यह न केवल लाभकारी बन सकती है, बल्कि समाज में किसान की छवि भी बदल सकती है।
उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले के मिर्जापुर तिलक गाँव के रहने वाले वाले जय सिंह ने एमएससी (बायोकेमिस्ट्री) की पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी करने के बाद परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि उन्हें खेती की ओर लौटना पड़ा। शुरुआत हुई पारंपरिक खेती से, जो आसपास के किसान करते थे। गन्ना, धान और दूसरे कई फ़सलें उगाईं। लेकिन जय सिंह मानते हैं कि खेती में बदलाव एक झटके में नहीं आता। इसके लिए समय, धैर्य और सीखने की इच्छा जरूरी होती है। वे कहते हैं कि किसी भी नए प्रयोग को पहले छोटे स्तर पर करना चाहिए, ताकि नुकसान की आशंका कम रहे और अनुभव बढ़ता जाए।
जय सिंह की खेती तीन बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित है। पहला सिद्धांत है खेत की सही लेवलिंग, यानी ज़मीन का पूरी तरह समतल होना। उनका कहना है कि यदि खेत ठीक से समतल हो जाए, तो सिंचाई और पोषक तत्वों का वितरण अपने आप बेहतर हो जाता है। दूसरा सिद्धांत है मिट्टी की सेहत। वे मिट्टी में जैविक पदार्थ, यानी ह्यूमस, को खेती की आत्मा मानते हैं। अपने गुरु के शब्दों को दोहराते हुए वे कहते हैं,
बिना गोबर के सब गोबर है
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इस समय जय सिंह करीब 55 एकड़ ज़मीन पर खेती कर रहे हैं। उनकी मुख्य फ़सलें आलू और केला हैं। वे रोटेशन के आधार पर खेती करते हैं, एक साल आलू, अगले साल केला। जय सिंह बताते हैं, "कम कीमत वाली फ़सल से थोड़ा मुनाफ़ा कमाने के बजाय ऐसी फ़सल चुननी चाहिए, जो कम क्षेत्र में भी अधिक मूल्य दे सके। इसी सोच के चलते उन्होंने आलू और केले की खेती को अपनाया।"
केले की खेती में जय सिंह का अनुशासन और योजना ख़ास तौर पर चर्चा में रहती है। वे हर पौधे की ऊँचाई, उसकी बढ़त और समय-सीमा का पूरा रिकॉर्ड रखते हैं। इसके लिए उनके पास चार्ट और ग्राफ़ होते हैं, जिनसे वे यह देखते हैं कि पौधे सही दिशा में बढ़ रहे हैं या नहीं। उनका लक्ष्य खेत में समानता बनाए रखना है, ताकि सभी पौधे एक जैसी स्थिति में रहें। इससे उत्पादन बेहतर होता है और कीट एवं रोगों का प्रकोप भी कम होता है। ख़ास बात यह है कि उनकी केले की खेती लगभग उर्वरक-मुक्त है और पूरी तरह नियंत्रित प्रबंधन पर आधारित है।
आलू की खेती में भी जय सिंह बाज़ार को ध्यान में रखकर फ़ैसले लेते हैं। वो कहते हैं, "किसान के लिए सबसे ज़रूरी है अपनी लागत निकालना। मार्च में जब आलू तैयार होता है, तो वे फ़सल का बड़ा हिस्सा तुरंत बेच देता हूँ, ताकि उनकी पूँजी सुरक्षित हो जाए। इसके बाद बची हुई फ़सल को वे बाज़ार की स्थिति देखकर स्टोर करता हूँ या धीरे-धीरे बेचता हैू।" जय सिंह का मानना है कि आलू जैसी फ़सलें जोखिम से भरी होती हैं, इसलिए समय पर सही निर्णय लेना बेहद ज़रूरी है।
मज़दूरों का ध्यान रखेंगे, तभी मिलेगा अच्छा उत्पादन
Image credit : Gaon Connection Network
इसी सोच के कारण उनके साथ काम करने वाले लोग लंबे समय तक जुड़े रहते हैं और काम का माहौल सकारात्मक बना रहता है।
खेती से हुई आमदनी का सबसे बड़ा उदाहरण उनके बच्चों की शिक्षा है। उनका बेटा कई साल तक अमेरिका में काम कर चुका है, जबकि उनकी बेटी इंग्लैंड के प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं। जय सिंह कहते हैं, "माता-पिता का सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी बच्चों को अच्छी शिक्षा देना है, ताकि वे अपने जीवन के फ़ैसले खुद ले सकें और आत्मनिर्भर बनें।"
सरकार और बाज़ार को लेकर जय सिंह की राय संतुलित है। वे मानते हैं कि बाज़ार मांग और आपूर्ति से चलता है और सरकार की भी अपनी सीमाएँ होती हैं। हालांकि, वे यह भी कहते हैं कि बीते कुछ वर्षों में खेती की लागत जिस तेज़ी से बढ़ी है, उस अनुपात में किसानों को अपनी उपज का सही दाम नहीं मिला है। इसी कारण आज किसान दबाव में है।
यह भी पढ़ें:-रबी की बुवाई में रिकॉर्ड बढ़ोतरी: 2025–26 में 8 लाख हेक्टेयर से ज़्यादा इज़ाफा
नए किसानों को सलाह देते हुए जय सिंह कहते हैं, "यदि किसी के पास पर्याप्त ज़मीन और संसाधन हैं, तो उसे पूरे आत्मविश्वास के साथ खेती में आना चाहिए। छोटे किसानों के लिए वे बागवानी फ़सलों को बेहतर विकल्प मानते हैं, क्योंकि कम ज़मीन में भी इनसे अच्छी आमदनी संभव है।"
जय सिंह की कहानी यह संदेश देती है कि यदि खेती को वैज्ञानिक सोच, अनुशासन, मेहनत और इंसानियत के साथ किया जाए, तो यह न केवल लाभकारी बन सकती है, बल्कि समाज में किसान की छवि भी बदल सकती है।