तमिलनाडु के मदुरै से यूपी के कन्नौज तक: चमेली की खेती पर मंडराता नया कीट संकट
भारत में चमेली की खेती पर एक नया संकट सामने आया है। ICAR-DFR, पुणे के वैज्ञानिकों ने Contarinia icardiflores नामक ब्लॉसम मिज की नई प्रजाति की पहचान की है, जो चमेली की कलियों को सड़ा देती है और भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा रही है।
भारत में चमेली (जैस्मीन) सिर्फ़ एक फूल नहीं है। यह इत्र उद्योग की आत्मा है, मंदिरों की पूजा का हिस्सा है, महिलाओं के गजरे की पहचान है और लाखों किसानों की आजीविका का आधार भी। लेकिन अब इसी चमेली की खुशबू पर एक अदृश्य खतरा मंडरा रहा है, एक बेहद सूक्ष्म लेकिन तेज़ी से फैलने वाला कीट, जिसे वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक नई प्रजाति के रूप में पहचाना है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के फ्लोरीकल्चर निदेशालय (ICAR-DFR), पुणे के वैज्ञानिकों की एक टीम ने चमेली की कलियों को नुकसान पहुँचाने वाले एक नए ब्लॉसम मिज (Blossom Midge) की पहचान की है, जिसे नाम दिया गया है - Contarinia icardiflores sp. nov. । यह नाम ICAR–Directorate of Floricultural Research (ICAR-DFR) के सम्मान में रखा गया है, जिसने भारत में फूलों से जुड़ी खेती और कीट विज्ञान में दशकों से अहम योगदान दिया है।
ICAR-DFR के वरिष्ठ वैज्ञानिक और इस अध्ययन के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. डी. एम. फिराके के अनुसार, "यह खोज भारत में फ्लोरीकल्चर के लिए एक अहम चेतावनी है। यह दिखाती है कि कैसे नई और उभरती कीट प्रजातियाँ जलवायु परिवर्तन, फसल विविधता और कृषि पद्धतियों के साथ सामने आ रही हैं।"
क्या है ब्लॉसम मिज और क्यों है यह खतरनाक?
ब्लॉसम मिज, Contarinia वंश के सूक्ष्म कीट होते हैं, जिनकी लंबाई महज़ 1.5 से 2 मिलीमीटर होती है। ये दिखने में भले ही मामूली लगें, लेकिन इनका असर बेहद गंभीर होता है।
नई पहचानी गई प्रजाति Contarinia icardiflores सीधे Jasminum sambac (अरबी चमेली) की फूल कलियों को निशाना बनाती है। इसके लार्वा (इल्ली अवस्था) कली के अंदर विकसित होते हैं, जिससे, कलियाँ असामान्य रूप से सूज जाती हैं, उनका रंग बदल जाता है, कली सड़ जाती है और खिलने से पहले ही गिर जाती है। इसका सीधा असर फूलों की पैदावार पर पड़ता है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है।
पहले से मौजूद कीट से अलग क्यों है यह नई प्रजाति?
अब तक भारत में चमेली पर हमला करने वाली सिर्फ़ एक ब्लॉसम मिज प्रजाति जानी जाती थी- Contarinia maculipennis Felt। जबकि नई खोजी गई C. icardiflores दिखने में इससे मिलती-जुलती ज़रूर है, लेकिन वैज्ञानिक परीक्षणों में यह आनुवंशिक रूप से पूरी तरह अलग पाई गई।
वैज्ञानिकों ने कैसे पहचाना अंतर?
ICAR-DFR की टीम ने इंटीग्रेटिव टैक्सोनॉमी (Integrative Taxonomy) अपनाई, जिसमें मॉर्फोलॉजिकल (आकृतिक) अध्ययन, मादा के सेर्सी (cerci) की बनावट, नर कीट के एडीएगस (aedeagus) की संरचना, मॉलिक्यूलर पहचान (DNA Barcoding) और माइटोकॉन्ड्रियल COI जीन (Cytochrome Oxidase Subunit I) का आंशिक अनुक्रमण की पहचान की गई है।
इससे यह स्पष्ट हुआ कि यह प्रजाति भारत में मौजूद अन्य ब्लॉसम मिज प्रजातियों से अलग है। यह पहली बार है जब चमेली पर हमला करने वाले कीट की पहचान इतनी सटीक जैविक और आनुवंशिक तकनीकों से की गई है।
तेज़ जीवन चक्र, तेज़ खतरा
इस नई ब्लॉसम मिज की सबसे चिंताजनक बात है इसका तेज़ जीवन चक्र, इसका पूरा जीवन चक्र सिर्फ़ 16 से 21 दिन का होता है। मतलब, अनुकूल परिस्थितियों में यह कीट बहुत तेज़ी से अपनी आबादी बढ़ा सकता है।एक ही सीज़न में कई पीढ़ियाँ तैयार हो सकती हैं। फूलों की खेती, खासकर चमेली जैसी नाज़ुक फसल के लिए यह एक गंभीर चेतावनी है।
किसानों और इत्र उद्योग पर क्या होगा असर?
चमेली भारत की प्रमुख वाणिज्यिक पुष्प फसलों में से एक है। इसकी खेती देश के कई राज्यों में होती है, जहाँ जलवायु अनुकूल है। लाखों छोटे किसान, विशेषकर महिलाएं, चमेली की खेती, तोड़ाई और माला निर्माण से जुड़ी हैं।
भारत में चमेली के प्रमुख उत्पादक राज्य
तमिलनाडु: भारत में चमेली उत्पादन में अग्रणी, यहाँ के मदुरै, डिंडीगुल, कोयंबटूर, विरुधुनगर, थेनी, सलेम, तिरुनेलवेली और त्रिची जैसे ज़िले प्रमुख हैं, यहाँ के ‘मदुरै मल्ली’ को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) भी मिल चुका है।
कर्नाटक: बेंगलुरु, मैसूर, बेल्लारी, कोलार और हुविना हडगली क्षेत्रों में व्यापक खेती होती है, यहाँ के ‘हडगली चमेली’ (Hadagali Mallige) को भी GI टैग मिल चुका है।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना: इन राज्यों में बड़े पैमाने पर फूलों की खेती होती है, जहाँ चमेली नकदी फसल के रूप में उगाई जाती है।
पश्चिम बंगाल: राणाघाट, कोलाघाट और पंसकुरा जैसे इलाकों में चमेली की खेती होती।
अन्य राज्य: महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश (कन्नौज, जौनपुर), गुजरात और असम के कुछ हिस्सों में भी चमेली उगाई जाती है।
यहाँ होता है चमेली का इस्तेमाल
भारत में चमेली की इस्तेमाल इत्र (Perfume) उद्योग में, अगरबत्ती और कॉस्मेटिक्स में और धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में होता है। अगर इस नई कीट प्रजाति पर समय रहते नियंत्रण नहीं हुआ, तो फूलों की गुणवत्ता और मात्रा दोनों घटेंगी, किसानों की आय प्रभावित होगी, इत्र उद्योग की आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ेगा
इस खोज का महत्व क्या है?
इस शोध का महत्व केवल एक नई कीट प्रजाति की पहचान तक सीमित नहीं है। इसके दूरगामी लाभ हैं; जैसे कि तेज़ और सटीक पहचान, COI जीन सीक्वेंसिंग की मदद से अब किसान और कृषि विभाग जल्दी पता लगा सकेंगे कि खेत में कौन-सी मिज प्रजाति मौजूद है। इससे लक्षित कीट प्रबंधन (Targeted Pest Management) किया जा सकता है।
गलत कीट पहचान की वजह से अक्सर बेवजह कीटनाशक छिड़काव होता है। अब पर्यावरण-अनुकूल और सटीक नियंत्रण रणनीति विकसित की जा सकेगी। यह खोज रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने और इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM) को बढ़ावा देने में मदद करेगी।
आगे की राह: नीति और शोध दोनों ज़रूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि फूलों की फसलों को भी राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली में शामिल किया जाना चाहिए, उभरते कीटों पर नियमित सर्वे और जीन-आधारित पहचान ज़रूरी है, किसानों को प्रशिक्षण और समय पर चेतावनी प्रणाली उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
Contarinia icardiflores sp. nov. की पहचान भारत के फ्लोरीकल्चर क्षेत्र के लिए एक बड़ा वैज्ञानिक कदम है। यह बताता है कि छोटे-से दिखने वाले कीट भी कैसे बड़ी आर्थिक और सांस्कृतिक विरासत को नुकसान पहुँचा सकते हैं। चमेली की खुशबू को बचाने के लिए अब ज़रूरत है, विज्ञान, नीति और किसान - तीनों के साथ मिलकर चलने की। अगर समय रहते सही कदम उठाए गए, तो यह नई खोज संकट नहीं, बल्कि सतत और सुरक्षित फूलों की खेती की दिशा में एक अवसर बन सकती है।