क्या आपको भी याद है अपने गाँव का रॉक बैंड, जिसमें ढ़ोल-मजीरे के थाप पर गाए जाते थे लोकगीत

क्या आप पुराने जमाने के रॉक बैंड के बारे में जानते हैं, इनके गीत सुनेंगे तो वाह लखनऊ कहे बिना नहीं रह पाएंगे।

Ashwani DwivediAshwani Dwivedi   30 May 2019 8:58 AM GMT

क्या आपको भी याद है अपने गाँव का रॉक बैंड, जिसमें ढ़ोल-मजीरे के थाप पर गाए जाते थे लोकगीत

कभी देश के ग्रामीण क्षेत्र लोकगीत, संगीत और अलग अलग तरीके के मनोरंजक खेलों के लिए जाने जाते थे, क्षेत्रीय बोलियों में किस्से, कहानियां, भजन ,त्योहारों के गीत साठ -सत्तर के दशक में रेडियो पर धूम मचाते थे, उन दिनों टीवी का इतना चलन में नहीं था, उस दौर में रमई काका, झपेटे भैया, बैजू भैया उत्तर प्रदेश में स्टार माने जाते थे।

लखनऊ। आप ने शहरी रॉक बैंड तो बहुत देंखे और सुने होंगे पर क्या कभी गाँव के पुराने जमाने के रॉक बैंड देंखे या सुने हैं आपको थोड़ा ताज्जुब जरुर होगा कि पहले लगभग हर गाँव में गाँव वालों का अपना रॉक बैंड हुआ करता था, अलग-अलग तरीके के वाद्य यंत्रों को बजाने की कला में माहिर होने के साथ साथ इन बैंड में नाचने, गाने वाले मेम्बर भी हुआ करते थे, लेकिन जैसे जैसे लोग अपने पारम्परिक संगीत और मनोरजन के साधनों से दूर होते गये वैसे-वैसे ये देशी रॉक बैंड खत्म होते चले गए।

ऐसी ही कुछ पुराने ज़माने के रॉक बैंड और विलुप्त होते लोकगीतों और उन्हें गाने वाले कलाकारों की खोज में जब गाँव कनेक्शन की टीम उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के रामपुर देवरइ गाँव पहुची तो रामपुर की ममता सिंह से मामपुर बाना गाँव के सबसे बुजुर्ग लोकगीत की मण्डली के मुखिया कालिका सिंह चौहान के बारे में जानकारी मिली फिर क्या गाँव कनेक्शन टीम का अगला पड़ाव लखनऊ के गाँव मामपुर बाना में था।


खैर, कलिका सिंह चौहान को ढूढ़ने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी जब गाँव कनेक्शन टीम कालिका सिंह के घर पहुची तो दोपहर में घर से तेज आवाज में समाचार सुनाई पड़ रहे थे ,अंदर जाने पर 88 साल के कालिका सिंह चौहान जो रेडियो पर समाचार सुन रहें थे, से मुलाकात हुई उन्होंने हाथ से बैठने का इशारा करते हुए समाचार खत्म होने तक चुप रहने का इशारा किया।

साठ-सत्तर के दशक के बारे में ऐसे बताते हैं जैसे कल की बात हो

मण्डली के बारे में बात करने पर कालिका सिंह चौहान खुश हो जाते हैं और साठ-सत्तर के दशक के लम्हों को याद करते हुए बताया, "वो दिन हमारी संस्कृति के सुनहरे दिन थे, कई बार उस समय के मशहूर कवि रमई काका, झपेटे भैया, बैजू भैया के साथ रेडियो पर प्रोग्राम करने का मौका मिला इस कार्यक्रम के रेडियो वाले पैसे भी देते थे, जब से टीवी चलन में आया रेडियो का महत्व कम हो गया, लेकिन मैं आज भी टीवी नहीं देखता रेडियो पर आज भी सारे समाचार लोकगीत, सदाबहार गीत आते हैं।
अपने रूटीन के बारे में बताते हैं कि सुबह 6 से 2.30 बजे तक लखनऊ चैनल, फिर विविध भारती पर सदाबहार गीत 5.30 पर लखनऊ चैनल और 7.30 पर बीबीसी लन्दन सुनते है, ये बताते हुए कुछ याद करके बताते है की इंदिरा गांधी की मौत की खबर सबसे पहले बीबीसी लन्दन पर ही आई थी।

छह दशक पुरानी मामपुर बाना की मण्डली

मण्डली के बारे में याद करते हुए कालिका सिंह चौहान बताते है, "उन दिनों तीज, त्यौहार गाना, बजाना जीवन का एक हिस्सा हुआ करती थी,12 गाँवो में हमारे टिकैत (परिवार) थे, पिताजी जमींदार थे। उनके साथ ही पर्व, त्यौहार जैसे होली दीवाली, दशहरा और अखंड कीर्तन, रामायण, भजन में जाया करता था पिताजी नहीं रहे तो उनकी परम्परा को कायम रखने के लिए आज तक इसे जारी रखा है और जब तक जिन्दा रहूंगा मामपुर बाना की ये कलां और प्रथा जारी रहेगी।"
नहीं बचाएंगे तो ख़त्म हो जाएगी पुरखों की विरासत
1960 में पहली बार मामपुर बाना के प्रधान बने कालिका सिंह ने न केवल पुरानी विरासत को बचाया, बल्कि नई परम्परा 1966 में बीकेटी का दशहरा मेला भी शुरू कराया जो आज बड़ा रूप ले चुका है, कालिका सिंह चौहान कहते हैं कि सिर्फ जमीन जायदाद ही पुरखो की अमानत नहीं होती, उनके विचार, परम्परा और कलाए भी विरासत है और उन्हें बचाए रखना हमारी जिम्मेदारी है।


तब मण्डली पैसे कमाने के लिए नहीं परम्पराओं को जिन्दा रखने के लिए होती थी
कालिका सिंह चौहान की मण्डली के भजन गायक राजकुमार शर्मा कहते हैं कि अखंड रामायण और भजन गाने वाली मण्डली अभी भी हैं, लेकिन अब ये व्यवसाय बन गया है भजन, कीर्तन या रामायण का पाठ अब ये मण्डली पैसे लेकर करते हैं, हमारे समय में ऐसा नहीं था, आज भी अपनी मण्डली में आज भी 20-22 लोग हैं और ज्यादातर लोग हमउम्र या कुछ 5-10 वर्ष छोटे हैं।
कालिका सिंह मण्डली के सदस्यों से परिचय कराते हुए कहते हैं, "मण्डली में ढोलक के साथी मूलचंद गौतम और उनका भाई है हारमोनियम के साथी हरदत्त सिंह हैं मंजीरा शिवसागर सिंह बजाते हैं झीका पर भोलू साथ देते हैं, मण्डली के राजकुमार शर्मा भजन के उस्ताद हैं, लालता सिंह भजन और आल्हा दोनों गाते हैं, अखंड रामायण और कीर्तन में सारी मण्डली साथ देती है होली के त्यौहार के समय हम लोग दो दिन होली गाते हैं और होली गीत में लालता सिंह और अन्य साथी बैकग्राउंड में मेरा साथ देते हैं।"

सही नहीं है 'होली खेले रघुबीरा अवध में' वाला फ़िल्मी गाना

कालिका सिंह चौहान कहते हैं कि आज कल लोकगीत, स्थानीय बोलियों के गीतों की बालीवुड वाले खाल उधेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहें, क्योंकि इनके पास मंच बड़ा है तो ये जो बना देते हैं वही सही हो जाता है और इस तरह लोकगीत, होली, भजन का मूल रूप खत्म हो गया अब अमिताभ बच्चन को ही ले लो जो गाना 'होली खेले रघुबीर अवध मा' बच्चन जी ने गाया ऐसे अवध में होली नहीं गाई जाती लेकिन इस गाने के आने के बाद बच्चन वाला गीत ओरिजिनल हो गया और ओरिजिनल कापी खत्म हो गयी।
आगे बताते हैं, "वो बड़े नायक हैं आज वो गाना पूरा हिन्दुस्तान देख रहा है, लोकगीतों का कोई मंच होता तो होली का यह गीत आज मूलरूप में आपके सामने होता और फिर अपनी मण्डली के लोगो को बुलाकर भजन, आल्हा और होली का गीत "होली खेले रघुबीर अवध मा ,होली खेलें रघुबीरा, राम के हाथ में ढोलक सोहे ,लक्ष्मण हाथ मंजीरा अवध मा होली खेले रघुबीरा सुनाते है।

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