हर नक्शा एक कहानी कहता है

हर नक्शा एक कहानी कहता हैप्रतीकात्मक तस्वीर

नक्शा बनाने के कई उद्देश्य होते हैं। कुछ नक्शे सैनिक उद्देश्यों के लिए तो कुछ यात्रा-पर्यटन की सुविधा के लिए बनाए जाते हैं। शहर का नक्शा तैयार करने वाले वास्तुकार, शहर के नियोजित विकास के लिए आवासीय जमीनों और दूसरे उपयोग की जमीनों के सीमांकन और रिकॉर्ड के लिए नक्शे तैयार करते हैं।

इस संदर्भ में दिल्ली को समझने के लिए “मैप्स ऑफ दिल्ली” पुस्तक बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें भिन्न उद्देश्यों से अलग-अलग समय में बनाए गए नक्शे एक साथ संकलित हैं और बहुमूल्य ऐतिहासिक जानकारी का स्रोत हैं। इनकी मदद से दिल्ली के शहरी स्वरूप के विकास की यात्रा के साथ बीते दौर में शहर की बसावट के स्वरूप में आए विशिष्ट बदलावों को भी समझा जा सकता है।

दिल्ली और उसका इतिहास इतनी परतों में सिमटा हुआ है कि किसी एक पहलू पर नज़र डालना नाक़ाफी होता है। पूरी दिल्ली में पसरे हुए स्मारकों में हर किसी की अपनी अलग मगर दिलचस्प कहानी है। अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर के अनेक अभिलेखागारों में दिल्ली के विभिन्न मानचित्र संग्रहित हैं। इनमें सबसे पुराने नक्शे को खोजकर निकालना, रूई के ढेर में से एक सुई को खोजने के समान है।

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ऐसे समय में इतालवी लेखिका पिलर मारिया ग्युरेरिइरी ने अपनी पुस्तक “मैप्स ऑफ दिल्ली” (रोली बुक्स से प्रकाशित) में 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध से लेकर 2021 के मास्टर प्लान तक के नक्शों को अपने अध्ययन का आधार बनाते हुए न केवल राजधानी के पुराने गुम हो चुके रास्तों को खोजा है, बल्कि इतिहास को देखने का एक दृष्टिकोण भी दिया है।

मारिया ने इन नक्शों का केवल दिखावटी इस्तेमाल न करते हुए उनके माध्यम से शहर के विकास का विश्लेषण किया है। उन्होंने ठीक एक इतिहासकार, जो कि ऐतिहासिक घटनाओं की व्याख्या को समझने के लिए लिखित अभिलेखीय रिकॉर्ड का प्रयोग करता है, की तरह नक्शों का इस्तेमाल करते हुए शहर के विकास को समझने की कोशिश की है। उदाहरण के लिए वे अपने विश्लेषण के आधार पर मजबूती से इस बात को दर्शाती हैं कि दिल्ली अनेक एकल इकाइयों वाला एक संपूर्ण शहर है। कई जटिल संरचनाओं वाली ये इकाइयां एक बड़ी सामूहिक पहचान का निर्माण करती है और वह है शहरों का शहर दिल्ली।

दिल्ली के पुराने शहरों में भी आज की तरह ही विकास का एक केंद्रीय स्वरूप था। अगर व्यापक रूप से देंखे तो हम गुरुग्राम या नोएडा जैसे शहरों को समकालीन दिल्ली महानगर का ही भाग मान सकते हैं। शाहजहानाबाद के सातवें शहर, सिविल लाइंस क्षेत्र के दिल्ली के आठवें शहर और इसी तरह प्रत्येक कॉलोनी को उनके बहुत ही वैशिष्ट्य स्थान और नियोजन के संदर्भ में पहचाना जा सकता है।

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हम शाहजहानाबाद शहर की पुरानी दिल्ली और पुराने मोहल्लों की बसावट (विलियम मैकेन्जी की ओर से प्रकाशित शाहजहानाबाद के नक्शे से) से पड़ोसियों से स्थान साझा करने की अवधारणा, व्यापारिक/ वाणिज्यिक/आवासीय मिश्रित गतिविधियों को अपनाते हुए सड़क पर पैदल चलने वालों के लिए जगह रखने वाले शहर का अनुभव सीख सकते हैं। ये सभी अवधारणाएं, क्षेत्रीय सिद्धांतों और कॉलोनियों के शहर नियोजन मॉडल के साथ विलुप्त से हो गईं। इन नक्शों को देखने से पता चलता है कि कब और क्यों नालियों की प्रणाली (ड्रेनेज सिस्टम) की समस्या और जल संरक्षण की सुविधाएं शुरू हुई। ब्रितानी युग के बाद से ही अधिकतर समय भू-विज्ञान और भू-स्थलाकृति के विरोधाभास में नगर नियोजन किया गया।

शहर को समझने के लिए इतिहास और पुराने नक्शों से बेहतर माध्यम कोई नहीं

किसी भी शहर के समकालीन विकास के मूल को समझने के लिए इतिहास और पुराने नक्शों से बेहतर कोई माध्यम नहीं हो सकता है। उनमें झांकने से यह पता चलता है कि मौजूदा महानगर की अनेक समस्याओं का कारण स्थानीय संदर्भ में पश्चिम के गलत मॉडल (प्रारूप) को अपनाया जाना या सीधा कहें तो नक़ल करना है।

लेखिका ने शहर की वास्तुकला और योजना बनाते समय देसी संदर्भ, उसका भूविज्ञान, जलवायु और संस्कृति की अनदेखी को रेखांकित किया है। उसने वास्तुकारों के इन मूलभूत कारकों पर ध्यान देने की अपेक्षा केंद्रीयकृत योजना यानी ऊपर से थोपने की प्रवृति की कमी को उजागर किया है। मरिया के अनुसार, गुडगाँव और नोएडा में स्थानीय आवश्यकताओं से हटकर बनी चमकदार, कांच और लोहे वाली वास्तुकला की इमारतें इस बात का जीता जागता उदाहरण हैं।

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उनका मानना है कि भारतीय युवा वास्तुकारों में अभी भी भवन निर्माण के लिए विदेशी मॉडलों के प्रति एक ललक है। इसके लिए वह वास्तुकला के कॉलेजों के पाठ्यक्रम में भारतीय इतिहास और विरासत के न होने की बात को दोषी मानती हैं। कहीं से प्रेरित होकर नकल करना तभी कारगर होता है जब युवा वास्तुकारों को इस बात का ज्ञान होता है कि उनकी नकल स्थानीय जनता की आवश्यकताओं को पूरा करने में सफल होगी। पर दुर्भाग्य से वास्तविकता इससे बिल्कुल उलट है क्योंकि अधिकतर युवा वास्तुकारों में इस दृष्टि का अभाव है।

पहला नक्शा 19वीं शताब्दी का

इस पुस्तक में संग्रहित पहला नक्शा 19 वीं शताब्दी के शुरुआत का है। यह वह समय है जब अंग्रेज दिल्ली पहुंचे थे और दिल्ली पर आधिपत्य के लिए अंग्रेजों-सिन्धिया की मराठा सेना के बीच पटपड़गंज में एक युद्ध (1803) हुआ था। भारत में मानचित्र बनाने की विधा का उपनिवेशवाद के साथ गहरा जुड़ाव रहा है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि मानचित्र निर्माण, उसकी सूचना से उपजने वाला ज्ञान और इन दोनों से मिलने वाली शक्ति का हमेशा से आपस में अटूट संबंध रहा है।

मारिया ने इन नक्शों का केवल दिखावटी इस्तेमाल न करते हुए उनके माध्यम से शहर के विकास का विश्लेषण किया है। उन्होंने ठीक एक इतिहासकार, जो कि ऐतिहासिक घटनाओं की व्याख्या को समझने के लिए लिखित अभिलेखीय रिकॉर्ड का प्रयोग करता है, की तरह नक्शों का इस्तेमाल करते हुए शहर के विकास को समझने की कोशिश की है।

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नक्शों में छिपे अनेक छोटी घटनाओं के बारे में जानकारी मिली

मारिया के अनुसार, इस किताब को लिखते समय उन्हें नक्शों में छिपे अनेक छोटी पर आकर्षक ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में जानकारी मिली। उदाहरण के लिए जैसे ‘दिल्ली 1857 शहर की योजना’ और उससे सटे हुए इलाकों वाले नक्शे में, ‘जहां निकोलसन गिरा’ का वाक्य लिखा होना, रिज पर ब्रितानी कैम्प में क्वार्टर मास्टर जनरल के ऑफिस का बना होना या अंग्रेज जनरल लॉर्ड लेक का मराठों के विरुद्ध सैनिक अभियानों वाले नक्शे में आपस में खींची हुई दो छोटी तलवारों से मराठा-अंग्रेज युद्ध के स्थान को चिन्हित करना।

उल्लेखनीय है कि 21 सितम्बर, 1857 ई. को दिल्ली पर अंग्रेज़ों ने दोबारा अधिकार कर लिया, परंतु भारतीयों के साथ लड़ाई में अंग्रेज़ सेनापति जॉन निकोलसन मारा गया था। इसी तरह, ‘दिल्ली की घेराबंदी 1857 का नक्शा’ अंग्रेज छावनी की पहली स्थिति और बसावट को प्रदर्शित करता है। शाहजहानाबाद की उत्तर दिशा में स्थित छावनी को रिज की ओर से सुरक्षा मिली हुई थी।

जिसकी विशेषता छावनी का एक बहुत सरल और कामकाजी ग्रिड पैटर्न का होना था। अंग्रेजों की सैन्य घेराबंदी को गहराई से समझने के लिए 8 जून से 14 सितंबर 1857 की अवधि में दिल्ली में ब्रितानी सेना की तैनाती योजना को देखना उपयुक्त है। नक्शे पर सैन्य युद्धाभ्यास साफ दिखते हैं, फिर चाहे वह दुश्मन की खाईं हो, विशिष्ट तोपखानों की तैनाती की स्थिति हो, बाईं ओर से अथवा दाईं ओर से घुसने की संभावना का संकेत! यहां अलग-अलग तोपखानों को चिह्नित करते हुए उनके कमांडिंग ब्रिगेडियर का नाम दर्ज है, जिसमें पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का दृश्य साफ दिखाई देता है।

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पहले दिल्ली प्रकृति के समरूप बसा था न कि उसके विरूद्ध

हैरानी की बात यह है कि मारिया को अपने अध्ययन में हाथ से बने नक्शे सबसे अधिक पसंद आए। उसमें भी विशेष रूप से 1807 का एक पुराना नक्शा जो उन्हें उस दौर के गाँव, जलमार्गों, नहरों और खेतों वाली विलक्षण दिल्ली में ले गया। मानो समय का पहिया उलटा घुम गया हो। इस पुराने नक्शे से इस बात का पता चलता है कि तब शहरी नियोजन में भूगोल और स्थलाकृति का विशेष ध्यान रखा जाता था।

दिल्ली जैसा प्राचीन शहर वास्तव में प्रकृति के समरूप बसा था न कि उसके विरूद्ध। उदाहरण के लिए अगर शाहजहानाबाद के लिए स्थान चयन पर विचार करें तो पता चलेगा कि यह एक पहाड़ी पर बना शहर था जो कि प्राकृतिक रूप से बाढ़ से बचाव की स्थिति में था। लेखिका का मानना है कि वास्तुकारों और योजनाकारों को पुरानी राजधानी के प्रकृति के साथ सहयोग की भूमिका के संबंध से प्रेरित होकर एक बेहतर और पर्यावरण-अनुकूल शहर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। दिल्ली के शानदार अतीत के नक्शों को देखना-बूझना एक अच्छा अनुभव हो सकता है।

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