National Girl Child Day: राजस्थान का पिपलांत्री गाँव, जब बेटियों के नाम लगाए जाते हैं 111 पेड़
राजस्थान के पिपलांत्री गाँव में बेटी का जन्म दुख नहीं, उत्सव है। यहाँ हर नवजात बेटी के नाम 111 पेड़ लगाए जाते हैं, ताकि धरती और समाज दोनों का भविष्य सुरक्षित हो।
कभी-कभी बदलाव की सबसे बड़ी कहानियाँ संसदों में नहीं, कॉन्फ्रेंस हॉल में नहीं, बल्कि मिट्टी से सने छोटे-छोटे गाँवों में जन्म लेती हैं। ऐसी ही एक कहानी राजस्थान के राजसमंद ज़िले के पिपलांत्री गाँव से निकलती है। एक ऐसा गाँव, जहाँ बेटी का जन्म बोझ नहीं, उत्सव है। जहाँ रोना नहीं, ढोल बजते हैं। जहाँ डर नहीं, पेड़ उगते हैं।
यहाँ जब भी किसी घर में बेटी जन्म लेती है, गाँव मिलकर 111 पेड़ लगाता है। सिर्फ़ एक पौधा नहीं, पूरे 111 पेड़ ताकि उस बच्ची के साथ-साथ धरती भी बड़ी हो, हवा भी सांस ले सके और समाज भी सोच में आगे बढ़े।
पिपलांत्री गाँव रेगिस्तान की सूखी ज़मीन में यह विचार किसी बारिश से कम नहीं था। क्योंकि जिस दौर में देश के कई हिस्सों में बेटी को जन्म से पहले ही मिटा दिया जाता है, उसी दौर में पिपलांत्री ने बेटी को पेड़ों की छांव में बड़ा करने का सपना देखा।
गाँव की बेटियाँ गर्व से कहती हैं, “मेरे जन्म पर 111 पेड़ लगाए गए थे।” कोई कहती है, “हम रक्षाबंधन पर पेड़ों को भाई मानकर राखी बाँधते हैं।” और किसी की आँखों में चमक आ जाती है जब वह बताती है कि उसका नाम जंगल के साथ जुड़ा है।
इस क्रांति के पीछे खड़े हैं गाँव के पूर्व सरपंच श्याम सुंदर पालीवाल, लेकिन यह सिर्फ़ एक आदमी की कहानी नहीं है। ये है पूरे गाँव की सामूहिक सोच की जीत की कहानी।
साल 2005 में पिपलांत्री और आसपास के इलाकों में संगमरमर खनन के कारण जंगल कट रहे थे। पानी का स्तर गिर रहा था। खेत सूख रहे थे। साथ ही समाज में कन्या भ्रूण हत्या, दहेज और लिंग भेद जैसी कुरीतियाँ गहरी होती जा रही थीं। प्रकृति भी बीमार थी और समाज भी।
फिर 2006 में एक निजी त्रासदी ने इस सोच को जन्म दिया। श्याम सुंदर पालीवाल की बेटी का निधन हो गया। उस दर्द ने उन्हें तोड़ने के बजाय बदल दिया। उन्होंने तय किया, अगर मेरी बेटी वापस नहीं आ सकती, तो मैं हर बेटी को अमर कर दूँगा।
उन्होंने अपनी बेटी की याद में एक पौधा लगाया। फिर उस एक पौधे से जन्म हुआ एक आंदोलन का हर बेटी के नाम 111 पेड़।
गाँव ने सिर्फ़ पेड़ नहीं लगाए, बल्कि बेटियों का भविष्य भी सुरक्षित किया। जब किसी लड़की का जन्म होता है, तो गाँव मिलकर 21 हजार रुपये जमा करता है। माता-पिता 10 हजार जोड़ते हैं और यह राशि बच्ची के नाम बैंक खाते में 20 साल के लिए फिक्स डिपॉजिट कर दी जाती है। इसके साथ शर्त होती है बेटी पढ़ेगी, बाल विवाह नहीं होगा, और उसे सम्मान मिलेगा।
यहाँ पेड़ों को भगवान की तरह पूजा जाता है। उनके तनों पर चेहरे बनाए जाते हैं। ताकि लोग उनसे जुड़ाव महसूस करें। ताकि पेड़ सिर्फ़ लकड़ी न रहें आस्था बन जाएँ। श्याम सुंदर कहते हैं, "पानी पर काम किया, पेड़ों पर काम किया, हर ऐसा विषय, जो लोगों को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने का कार्य करता हो, उस पर हमने काम किया। हमारे जितने भी पेड़ हैं, उन पर हमने चेहरे बनाए हैं। यह विचार हमें तब आया जब हम किसी मंदिर में जाते हैं, वहाँ एक मूर्ति होती है और उस मूर्ति में आस्था रखकर लोग उसके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। तो ये पेड़ हमारी आस्था हैं।"
आज पिपलांत्री में हजारों पेड़ लहराते हैं। पानी का स्तर सुधरा है। खेती बेहतर हुई है। गाँव की हवा साफ़ हुई है। लेकिन सबसे बड़ी बात, यहाँ की सोच बदल गई है। अब यहाँ बेटी के जन्म पर लोग मिठाई बाँटते हैं। थाली बजती है। घरों में दीये जलते हैं। माँएँ सिर ऊँचा करके कहती हैं मेरी बेटी पैदा हुई है।
गाँव की जमुना पालीवाल कहती हैं, "बेटा केवल एक कुल को पालता है, लेकिन एक बेटी सात कुलों को तारती है और हमारे पिपलांत्री गाँव ने इस बात को सार्थक कर दिखाया है।" जब बेटियाँ स्कूल जाती हैं और पेड़ों की कतारों के बीच से होकर लौटती हैं, तो यह सिर्फ़ शिक्षा की राह नहीं होती, यह एक बेहतर भविष्य की पगडंडी होती है।
पिपलांत्री ने यह साबित कर दिया कि बदलाव के लिए कानून से ज़्यादा ज़रूरी है सोच। और जब सोच बदलती है, तो समाज भी बदल जाता है। आज यह गाँव भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए मिसाल है। यह सिखाता है कि बेटी बचाओ सिर्फ़ नारा नहीं, जीवनशैली हो सकती है कि पर्यावरण बचाओ सिर्फ़ पोस्टर नहीं, परंपरा बन सकती है।
रेगिस्तान में उगा यह जंगल हमें याद दिलाता है जब इंसान की सोच हरी होती है, तो धरती भी हरी हो जाती है और यही संदेश पिपलांत्री दे रहा है बेटियों के नाम पेड़ लगाइए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ सांस ले सकें।