कर्नाटक की अनमोल धरोहर: जब गाँव-गाँव गूँजता था यक्षगान

Gaon Connection | Dec 29, 2025, 13:19 IST
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कभी कर्नाटक के गाँवों की रातें यक्षगान से रोशन होती थीं। मृदंग, मंजीरा और घुंघरुओं की आवाज़ में बसता था लोकजीवन। आज जब यह परंपरा संकट में है, तब कुछ गुरु और कलाकार इसे बचाने में जुटे हैं। यह कहानी है यक्षगान की, एक कला, एक विरासत और एक संघर्ष की।

<p>यक्षगान केवल एक नाट्यकला नहीं थी, यह गाँवों की सामूहिक स्मृति है।<br></p>

एक समय था, जब कर्नाटक के गाँवों में रात ढलते ही हवा बदल जाती थी। धान के खेतों के बीच, खुले आसमान के नीचे, मृदंग की थाप, मंजीरे की झंकार और घुंघरुओं की मधुर आवाज़ गूँज उठती थी। वही आवाज़, जो लोगों को खेतों से, घरों से, चौपालों से खींचकर एक जगह ले आती थी- यक्षगान।



यक्षगान केवल एक नाट्यकला नहीं थी, यह गाँवों की सामूहिक स्मृति थी। इसमें नृत्य था, संगीत था, संवाद था, और जीवन के हर रंग की झलक थी। रामायण, महाभारत और पुराणों की कथाएँ, देवताओं और राक्षसों की गाथाएँ, सब कुछ मंच पर जीवित हो उठता था।



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लेकिन समय बदला। शहर बढ़े, मनोरंजन के नए साधन आए। टीवी, मोबाइल और इंटरनेट ने धीरे-धीरे गाँव की रातों से यक्षगान की आवाज़ छीन ली। दर्शक कम होते गए, कलाकार छूटते चले गए। कई जगहों पर यह कला सिर्फ यादों में सिमट कर रह गई।



यक्षगान: एक कला, कई रूप

यक्षगान कलाकार रवि मडोली बताते हैं कि यक्षगान एक ही कला होते हुए भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नामों और शैलियों में जीवित रही है।



कोस्टल कर्नाटक में इसे पडुवलपाय यक्षगान कहा जाता है, मैसूर क्षेत्र में मुडलपाया, और हुबली-धारवाड़ के आसपास डोडडाटा और सन्नाटा के नाम से जाना जाता है।



रूप अलग हो सकता है, लेकिन आत्मा एक ही है- लोकजीवन से निकली, लोकजीवन के लिए बनी कला।



जब लगभग बुझने लगी थी यह लौ

बीते कुछ दशकों में हालात ऐसे हो गए कि यक्षगान सीखने वाले बच्चे मिलना मुश्किल हो गए। मंच सूने होने लगे। कलाकारों को रोज़गार के लिए दूसरी राहें पकड़नी पड़ीं।



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ऐसे समय में, कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने हार नहीं मानी। जिन्होंने यह मान लिया कि अगर ये कलाएँ खत्म हुईं, तो हमारे गाँवों की आत्मा भी कहीं खो जाएगी।



इन्हीं लोगों में से एक हैं, कोटा कृष्णमूर्ति तुंगा।



कोटा कृष्णमूर्ति तुंगा: परंपरा के पहरेदार

उडुपी ज़िले से आने वाले कोटा कृष्णमूर्ति तुंगा पिछले 30 वर्षों से भी अधिक समय से यक्षगान को सहेजने में लगे हुए हैं। आज वे बेंगलुरु में रहते हैं, लेकिन उनका दिल आज भी गाँव की मिट्टी और यक्षगान के रंगों में बसता है।



वे कहते हैं, “नाट्यशास्त्र में चार प्रकार के अभिनय बताए गए हैं, "आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक। यक्षगान में ये चारों मौजूद हैं। ‘यक्ष’ यानी सुर, नर, गंधर्व और किन्नर, और ‘गान’ यानी गायन। यक्षगान अपने आप में सम्पूर्ण कला है।”



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उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर माता-पिता और शिक्षक बच्चों को इस कला से परिचित नहीं कराएँगे, तो यह परंपरा आगे नहीं बढ़ पाएगी।



अगली पीढ़ी तक पहुँचना सबसे ज़रूरी

कृष्णमूर्ति तुंगा मानते हैं कि यक्षगान को बचाने के लिए सिर्फ मंच नहीं, शिक्षा और संवाद ज़रूरी है।



वे बच्चों को सिखाते हैं कि यक्षगान केवल नृत्य या अभिनय नहीं, बल्कि अनुशासन, टीमवर्क और संस्कृति से जुड़ने का माध्यम है।



जब कोई बच्चा पहली बार भारी आहार्य वेशभूषा पहनता है, जब वह चेहरे पर रंग लगाकर मंच पर कदम रखता है, तब सिर्फ एक कलाकार नहीं बनता, एक विरासत आगे बढ़ती है।



डिजिटल दौर में लोककला की नई लड़ाई

आज का समय डिजिटल क्रांति का है। यही संकट है, और यही अवसर भी।



अगर लोककलाएँ स्क्रीन से गायब हो जाएँ, तो नई पीढ़ी उनसे कट जाएगी। लेकिन अगर यक्षगान की प्रस्तुतियाँ रिकॉर्ड हों, सोशल मीडिया पर साझा हों, स्कूलों और मोहल्लों तक पहुँचे, तो यह फिर से ज़िंदा हो सकती है।



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यक्षगान सिर्फ कलाकारों की ज़िम्मेदारी नहीं है। यह हम सबकी ज़िम्मेदारी है, दर्शकों की, माता-पिता की, शिक्षकों की।



क्योंकि लोककला सिर्फ कला नहीं होती

भारत की लोकपरंपराएँ, नृत्य, संगीत, नाटक, हस्तशिल्प, ये हमारे इतिहास की किताबें हैं, जो बोलती हैं।



अगर ये चुप हो गईं, तो हमारी जड़ों से हमारी बातचीत टूट जाएगी।



यक्षगान हमें सिखाता है कि कहानी कहने की ताकत क्या होती है। यह हमें हमारी भाषा, हमारे गीत, हमारे गाँव और हमारे लोगों से जोड़ता है।



अगर हम चाहते हैं कि आने वाले समय में भी मृदंग की थाप गूँजे, घुंघरुओं की आवाज़ सुनाई दे, तो हमें आज कदम बढ़ाने होंगे।



तभी तो एक बार फिर से गूँजेगा- यक्षगान।






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