देश भर में बनाए जा रहे हैं जलवायु अनुकूल तटीय मछुआरा गाँव, जानिए क्या मिलेंगी सुविधाएँ

Gaon Connection | Feb 03, 2026, 17:25 IST
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प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत देशभर में 100 जलवायु अनुकूल तटीय मछुआरा गाँव विकसित किए जा रहे हैं। इस योजना से मछुआरों को आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षित आजीविका, बेहतर बाजार सुविधा और जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता मिलेगी।

<p>तटीय मछुआरा गाँवों को मिलेगा आधुनिक सुविधाओं का लाभ।<br></p>

समुद्र किनारे रहने वाले मछुआरा समुदाय जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े असर झेलने वालों में शामिल हैं। कभी समुद्री तूफान, कभी समुद्र स्तर बढ़ना, तो कभी मछली पकड़ने में अनिश्चितता, इन सबने तटीय इलाकों की आजीविका को जोखिम में डाल दिया है। इसी चुनौती को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक नई पहल शुरू की है, जिसके तहत देश के तटीय इलाकों में 100 मछुआरा गांवों को “जलवायु अनुकूल तटीय मछुआरा गांव” के रूप में विकसित किया जा रहा है।



मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत मत्स्य पालन विभाग ने इस योजना को प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत लागू किया है। इस पहल का मकसद ऐसे गाँव तैयार करना है जो आर्थिक रूप से मजबूत हों, पर्यावरण के अनुकूल हों और जलवायु बदलाव के झटकों को सहने में सक्षम बन सकें। इसके तहत हर गाँव पर करीब 2 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं और यह पूरी राशि केंद्र सरकार द्वारा दी जा रही है। इस कार्यक्रम के दिशा-निर्देश फरवरी 2024 में जारी किए गए थे।



इस योजना के जरिए तटीय इलाकों में मछुआरों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बेहतर बनाने पर खास ध्यान दिया जा रहा है। गाँवों में आधुनिक मछली बाजार, फिश ड्राइंग यार्ड, प्रसंस्करण केंद्र, आइस प्लांट, कोल्ड स्टोरेज, फिशिंग जेट्टी और तट संरक्षण से जुड़े काम किए जा रहे हैं। इससे मछुआरों को अपनी पकड़ सुरक्षित रखने, उसे सही दाम पर बेचने और नुकसान कम करने में मदद मिलेगी।



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इसके साथ ही योजना में जलवायु अनुकूल गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। जैसे समुद्री शैवाल की खेती, आर्टिफिशियल रीफ यानी कृत्रिम चट्टानों का निर्माण, और ग्रीन फ्यूल का इस्तेमाल। इन उपायों से समुद्री जैव विविधता बढ़ेगी, मछली उत्पादन को सहारा मिलेगा और पर्यावरण पर दबाव कम होगा।



सरकार का लक्ष्य केवल ढांचा तैयार करना नहीं है, बल्कि गाँवों में जीवन की कुल गुणवत्ता को बेहतर बनाना भी है। इसलिए प्रशिक्षण, सुरक्षा उपकरण, आपदा प्रबंधन सुविधाएं, सौर ऊर्जा आधारित लाइटिंग, प्राथमिक चिकित्सा सुविधाएं और सामाजिक बुनियादी ढांचे पर भी काम किया जा रहा है। इससे मछुआरा परिवारों को सुरक्षित और स्थिर आजीविका मिल सकेगी।



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इन गाँवो का चयन कई मानकों के आधार पर किया गया है। समुद्र तट से दूरी, मछुआरों की आबादी, नावों की संख्या, मछली लैंडिंग गतिविधियां और जलवायु जोखिम जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर गाँव चुने गए हैं। ज्यादा मछुआरा आबादी वाले और जलवायु संकट के प्रति ज्यादा संवेदनशील इलाकों को प्राथमिकता दी गई है।



कर्नाटक में इस योजना के तहत पांच गाँवों को चुना गया है, जहां बहुउद्देशीय मत्स्य केंद्र, तट सुरक्षा कार्य, सौर ऊर्जा आधारित बाजार लाइटिंग, नेट मरम्मत यार्ड, फिश प्रोसेसिंग यूनिट, आपातकालीन बचाव सुविधाएं और सोलर फिश ड्रायर जैसी सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। वहीं आंध्र प्रदेश में 15 गाँवों को इस कार्यक्रम में शामिल किया गया है, जहां फिश ड्राइंग प्लेटफॉर्म, हाई मास्ट सोलर लाइट, GPS उपकरण, प्राथमिक चिकित्सा किट, जीवन रक्षक उपकरण और पोर्टेबल आइस बॉक्स जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं।



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