सालभर कमाई का ज़रिया बनी अविशान भेड़, जानिए क्यों बढ़ रही है इसकी मांग
अविशान भेड़ भारत में विकसित की गई एक ऐसी नस्ल, जो अपनी प्रजनन क्षमता और बेहतर मांस उत्पादन के लिए जानी जाती है। जानते हैं कैसे ये नस्ल कम लागत में किसानों की आमदनी बढ़ा सकती है।
देश की एक बड़ी आबादी भेड़ पालन से जुड़ी हुई है, लेकिन भेड़ की कुछ नस्लें एक बार में एक बच्चे ही देती हैं, जबकि कुछ दूध बहुत कम मात्रा में देती हैं, इसी समस्या का हल निकालने के लिए वैज्ञानिकों ने भेड़ की नई नस्ल अविशान विकसित की है जो साल में एक से चार तक बच्चे देती हैं, दूध का भी उत्पादन भी बढ़िया होता है।
अविशान नस्ल को केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान (ICAR-CSWRI), अविकानगर, राजस्थान ने तीन स्थानीय नस्लों के क्रॉस से विकसित किया है। ICAR-CSWRI के निदेशक डॉ अरुण कुमार तोमर इस नस्ल की ख़ासियतें बताते हुए कहते हैं, "अविशान (Avishaan) नस्ल को कई सालों की रिसर्च के बाद हमारे वैज्ञानिकों ने किया किया है। इसकी सबसे ख़ास बात ये है कि ये एक बार में दो ज़्यादा बच्चे देती है, कई बार तो चार बच्चे भी देती है।"
इस संकरण में Garole का 12.5%, Malpura का 37.5% और Patanwadi का 50% शामिल है, जिससे यह नस्ल विशेष रूप से कम मेहनत में अधिक उत्पादन देने में सक्षम हुई है। ज़्यादा बच्चे पैदा होने से पशुपालकों को मांस उत्पादन और बिक्री दोनों से बेहतर आमदनी मिलती है। इसके अलावा इस नस्ल में मेमनों की मृत्यु दर भी काफी कम लगभग 5% पाई गई है, जो पारंपरिक नस्लों की तुलना में बेहद कम है।
डॉ अरुण आगे कहते हैं, "ये देश में पहला प्रयोग है, जब एक साथ जिसमें हमने तीन देसी भेड़ों का क्रॉस कराया। हर एक नस्ल की अपनी ख़ासियतें थीं, जो एक साथ अविशान में देखी जा सकती हैं।"
देश में पिछले कुछ वर्षों में भेड़ की संख्या में वृद्धि हुई है, पशुधन गणना 2012 के अनुसार देश जहाँ भेड़ की संख्या 65.1 मीलियन थी, वहीं साल 2019 के आंकड़ों के अनुसार देश में भेड़ों की संख्या 74.3 मीलियन हो गई है, जो हर साल बढ़ ही रही है।
इस भेड़ की माँस उत्पादन क्षमता भी बेहतर है और पानी व विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में इसे आसानी से पाला जा सकता है। अविशान भेड़ों को कई राज्यों में अच्छी प्रतिक्रिया मिली है और किसानों इसका पालन कर रहे हैं। इसका पालन आसान तरीके और कम खर्च में किया जा सकता है, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को भी इसका लाभ मिलता है।
डॉ अरुण बताते हैं, "देश के लगभग सभी हिस्सों में ये बहुत अच्छा काम कर रही है और किसानों के यहाँ और किसानों की बहुत अच्छी डिमांड है कि ये भेड़ हमें भी मिले। क्योंकि एक साथ दो से ज़्यादा बच्चे मिलते हैं। उतनी मेहनत में दो से तीन गुना आमदनी इनकी हो जाती है।"
"हम लोगों ने इसको हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर में भी दिया है और उधर बंगाल और आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तक भी इसको दिया है। सभी जगह से इसके बहुत अच्छे रिज़ल्ट आए हुए हैं और इसकी डिमांड दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, "उन्होंने कहा।
अविशान भेड़ केवल मांस के लिए ही नहीं बल्कि दूध (भेड़ों का दूध) और ऊन उत्पादन के लिए भी उपयोगी है, जिससे पशुपालकों को कई स्रोतों से लाभ मिल सकता है। इसकी बढ़ती लोकप्रियता का एक कारण यही है कि इसे उन किसानों के लिए भी अपनाया जा सकता है जिनके पास सीमित संसाधन हैं या वे शुष्क/अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में रहते हैं।
इस तरह अविशान भेड़ देश में भेड़ पालन व्यवसाय को न केवल आसान बनाती है, बल्कि छोटे-बड़े किसानों को ग्रामीण आजीविका में आत्मनिर्भरता और बढ़ती आमदनी का मौका भी देती है। यह नस्ल आज भेड़ पालन की दुनिया में एक महत्वपूर्ण नाम बन चुकी है और पशुपालन व्यवसाय के लिए एक आकर्षक विकल्प के रूप में उभर रही है।
कैसे होगा फ़ायदा
अविशान भेड़ पालकर कैसे मुनाफ़ा होगा ये समझते हैं, ICAR-CSWRI मादाओं का जन्मदर 90 प्रतिशत और मेमना मृत्यु दर 5 प्रतिशत हो तो 100 अविशान भेड़ों को पालकर हर साल एक मेमना देने वाली भेड़ की तुलना में 45-50 ज्यादा मेमने मिल जाते हैं। अगर किसान इन अतिरिक्त मेमनों को पालकर 3-4 माह की उम्र में 2500 रुपये प्रति मेमने की दर से बेचता है, तो उसको लगभग एक लाख रुपये की अतिरिक्त आमदनी प्राप्त हो सकती है।
कम प्रजनता की नस्ल वाली भेड़ों के मुकाबले 100 अविशान भेड़ों के पालने से किसान को 45-50 मेमने ज़्यादा मिलते हैं और किसान सालाना एक लाख रुपये का मुनाफा कमा सकता है।
आईसीएआर में भी हुई रजिस्टर्ड
हाल ही में अविशान भेड़ क़ो भेड़ नस्ल के रूप मे आईसीएआर नई दिल्ली मे रजिस्टर्ड किया गया। डॉ तोमर इस बारे में कहते हैं, "जब किसी चीज़ को एक पंजीकरण मिल जाता है, ऑथेंटिसिटी मिल जाती है, वेरीफाइड (verified) हो जाती है, तो उस चीज़ की कीमत बढ़ जाती है। वह देश की अभी पंजीकृत नस्लों में से एक है।"
अविशान भेड़ क़ो पंजीकरण होने से अविकानगर के साथ ही देश के अन्य राज्यों मे बढ़ावा देने के लिए नई परियोजना लाई जा सकेगी। भविष्य मे इसको किसान तक ले जाने के लिए संस्थान द्वारा अपनी ओर से पूरे प्रयास किये जायेगे, जिससे प्रति भेड़ उत्पादन क़ो बढ़ाया जा सके।