Rainbow Trout Farming: अरुणाचल में पहली बार इस मछली के अंडों की हैचिंग, पहाड़ी मछली पालन को मिलेगा नया सहारा
अरुणाचल प्रदेश के ज़ीरो में पहली बार रेनबो ट्राउट के ‘आईड ओवा’ की पायलट हैचिंग शुरू हुई है। यह कदम हिमाचल, कश्मीर, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर राज्यों में कोल्ड-वॉटर फिशरीज को मजबूत करने, किसानों की आमदनी बढ़ाने और आधुनिक एक्वाकल्चर को बढ़ावा देने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
भारत में ठंडे पानी में पाली जाने वाली रेनबो ट्राउट मछली को लेकर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पहली बार अरुणाचल प्रदेश के ज़ीरो स्थित Integrated Aqua Park में रेनबो ट्राउट के ‘आईड ओवा’ यानी विकसित अवस्था वाले अंडों को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर हैच किया जा रहा है। इसे देश में कोल्ड-वॉटर फिशरीज और आधुनिक Aquaculture के क्षेत्र में एक अहम कदम माना जा रहा है।
अरुणाचल प्रदेश के मत्स्य विभाग के उप निदेशक तागी योगगाम बताते हैं, "ठंडे प्रदेशों के मछली पालकों के लिए ट्राउट फिश काफी फायदेमंद होती है, पिछले कुछ सालों में इसकी माँग भी बढ़ी है, लेकिन अभी भी सही बीज न मिलने के कारण उत्पादन पर असर पड़ता है। इसीलिए एक्वा पार्क में पायलट प्रोजेक्ट के तहत अंडों को हैच किया गया है।"
वो आगे कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि अरुणाचल प्रदेश में इससे पहले हैचिंग नहीं हुई है, लेकिन एक्वा पार्क में इसे पहली बार किया गया है, इससे नॉर्थ-ईस्ट में ट्राउट का उत्पादन बढ़ेगा।"
यह पहल केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत की जा रही है, जिसके अंतर्गत देश के अलग-अलग राज्यों में कुल 11 इंटीग्रेटेड एक्वापार्क विकसित करने को मंजूरी दी गई है। इन परियोजनाओं पर कुल ₹682.60 करोड़ रुपये की लागत स्वीकृत की गई है। सरकार का उद्देश्य है कि आधुनिक तकनीक, बेहतर नस्ल और मजबूत ढांचे के जरिए मछली उत्पादन को बढ़ाया जाए और ग्रामीण इलाकों में रोजगार के नए अवसर पैदा किए जाएं।
अरुणाचल प्रदेश में, विशेष रूप से पश्चिम कामेंग और तवांग जिले में रेनबो ट्राउट मछली के पालन की अपार संभावना है। यहां का पानी और तापमान इन मछलियों के पालन और प्रवर्धन के लिए अनुकूल है। राज्य में रेनबो ट्राउट के जीरे की उपलब्धता के मामले में बाधा है, इसलिए इससे पहले यहाँ शेरगांव और नुरानांग ट्राउट फार्म में भूरे ट्राउट के अंडों का उत्पादन कुछ हद तक शुरू किया है।
लेकिन ऐसा नहीं है कि कोई रेंबो ट्राउट के अंडों को हैच कर सकता है, इसके लिए सरकार ने नियम बनाए हैं।
सरकार ने रेनबो ट्राउट के अंडों के लिए नए नियम क्यों बनाए?
मत्स्य पालन विभाग के अनुसार, भारत में मौजूद रेनबो ट्राउट की नस्ल काफी पुरानी हो चुकी है। लंबे समय से एक ही नस्ल से प्रजनन होने के कारण मछलियों की बढ़त की रफ्तार धीमी हो गई है और उत्पादन क्षमता भी घट रही है। इसी वजह से सरकार ने विदेश से बेहतर गुणवत्ता वाले ‘आईड ओवा’ मंगाने के लिए तकनीकी दिशानिर्देश भी बनाए हैं।
इन दिशानिर्देशों का मकसद यह है कि आनुवंशिक रूप से मजबूत नस्ल लाई जाए, जिससे मछली तेजी से बढ़े, बीमारी कम लगे और किसानों को ज्यादा उत्पादन मिले। इससे हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और अब पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों में ट्राउट पालन को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।
आईड ओवा क्या होता है और सिर्फ वही क्यों आयात किए जाते हैं?
आईड ओवा रेनबो ट्राउट मछली के अंडों की वह अवस्था होती है, जब भ्रूण की आंखें साफ दिखाई देने लगती हैं। इस चरण में अंडे मजबूत होते हैं और उन्हें सुरक्षित तरीके से ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है।
सरकार ने साफ निर्देश दिया है कि भारत में जिंदा मछली नहीं, बल्कि केवल आईड ओवा ही मंगाए जाएंगे। इससे विदेशी बीमारियों के फैलने का खतरा कम होता है और हैचरी में नियंत्रित वातावरण में बच्चों को तैयार किया जा सकता है।
बीमारी से बचाव के लिए सख्त जांच और क्वारंटीन
विदेश से आने वाले अंडों के साथ कोई खतरनाक बीमारी भारत में न पहुंचे, इसके लिए सरकार ने सख्त व्यवस्था बनाई है। हर खेप को कम से कम 14 दिन तक क्वारंटीन में रखा जाता है। इस दौरान वायरस, बैक्टीरिया और फंगल संक्रमण की जांच की जाती है।
अगर किसी खेप में बीमारी पाई जाती है, तो पूरी खेप को नष्ट कर दिया जाता है। इसके साथ ही आयात के दौरान इस्तेमाल किया गया पानी और पैकिंग सामग्री भी सुरक्षित तरीके से नष्ट की जाती है। इसका खर्च आयातकर्ता को खुद उठाना होता है।
अरुणाचल प्रदेश में पायलट प्रोजेक्ट क्यों है खास?
अरुणाचल प्रदेश के जीरो स्थित इंटीग्रेटेड एक्वापार्क में पहली बार रेनबो ट्राउट के आईड ओवा को हैच करने का प्रयोग किया जा रहा है। यह प्रयोग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह पता चलेगा कि पूर्वोत्तर भारत की जलवायु और जल संसाधनों में यह तकनीक कितनी सफल हो सकती है।
अगर यह पायलट प्रोजेक्ट सफल होता है, तो भविष्य में पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाकों में भी ट्राउट पालन को बढ़ावा मिल सकता है। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और मछली उत्पादन के नए केंद्र विकसित हो सकते हैं।
किसानों के लिए क्या बदलेगा?
हिमालयी और पहाड़ी इलाकों में खेती के सीमित विकल्प हैं। ऐसे में ट्राउट मछली पालन एक अच्छा वैकल्पिक रोज़गार बन रहा है। बेहतर नस्ल आने से मछलियां तेजी से बढ़ेंगी, उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आमदनी में सुधार हो सकता है।
सरकार का मानना है कि इंटीग्रेटेड एक्वापार्क जैसे मॉडल से किसानों को हैचरी, फीड, कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग जैसी सुविधाएं एक ही जगह मिलेंगी। इससे छोटे किसानों को भी बाजार से जुड़ने का मौका मिलेगा।
पर्यावरण को लेकर सरकार की चिंता
रेनबो ट्राउट भारत की मूल मछली नहीं है। अगर यह नदियों और झरनों में फैल गई तो स्थानीय मछली प्रजातियों को नुकसान पहुंच सकता है। इसी वजह से सरकार ने साफ नियम बनाए हैं कि आयातित मछलियों को खुले जल स्रोतों में छोड़ना पूरी तरह प्रतिबंधित है। फार्म संचालकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि मछलियां तालाब या रेसवे से बाहर न निकलें। किसी भी तरह की लापरवाही पर कार्रवाई की जा सकती है।
नियम तोड़ने पर सख्त कार्रवाई
अगर कोई व्यक्ति बिना अनुमति अंडे मंगाता है, गलत जानकारी देता है या सुरक्षा नियमों का पालन नहीं करता, तो उसका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर पूरी खेप को नष्ट भी किया जा सकता है। उद्देश्य साफ है विकास के साथ-साथ जैव-सुरक्षा और पर्यावरण की रक्षा।
रेनबो ट्राउट के आईड ओवा का आयात और अरुणाचल प्रदेश में शुरू हुआ पायलट प्रोजेक्ट भारत के कोल्ड-वॉटर फिशरीज सेक्टर के लिए एक नया रास्ता खोल रहा है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत बनाए जा रहे इंटीग्रेटेड एक्वापार्क देश में मछली उत्पादन को आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम हैं।
अगर यह योजना सही तरीके से लागू होती है, तो इससे पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में रोजगार बढ़ेगा, किसानों की आमदनी सुधरेगी और भारत का एक्वाकल्चर सेक्टर और मजबूत होगा।
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