MP NEWS: 14 महीनों में 149 तेंदुओं की मौत, हादसे बने मौत के सबसे बड़े कारण
मध्य प्रदेश में बीते 14 महीनों (जनवरी 2025 से) के दौरान 149 तेंदुओं की मौत ने वन्यजीव संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरटीआई के जरिए सामने आए आंकड़ों के अनुसार, इन मौतों में सबसे बड़ी वजह सड़क हादसे रहे हैं। वहीं वन विभाग का कहना है कि मृत्यु दर को नियंत्रित करने के प्रयास जारी हैं और 4 प्रतिशत की यह दर बड़े बिल्लियों (Big Cats) के लिए स्वीकार्य सीमा के भीतर है।
देश में सबसे ज्यादा तेंदुओं की संख्या, फिर भी बढ़ी मौतें
‘Status of Leopards in India 2022’ रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश में देश में सबसे अधिक 3,907 तेंदुए पाए जाते हैं। वर्ष 2018 में यह संख्या 3,421 थी, यानी राज्य में तेंदुओं की आबादी में लगातार वृद्धि हुई है। इसके बावजूद मौतों का बढ़ता आंकड़ा चिंता का विषय बन गया है।
सड़क हादसे सबसे बड़ा खतरा
आरटीआई के अनुसार, कुल मौतों में 31 प्रतिशत तेंदुओं की जान सड़क हादसों में गई। इनमें से 19 मौतें सीधे हाईवे पर दर्ज की गईं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि सड़कों और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर का वन्यजीवों पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
प्राकृतिक कारण और आपसी संघर्ष भी जिम्मेदार
तेंदुओं की मौतों में 24 प्रतिशत मामले प्राकृतिक कारणों जैसे- उम्र और बीमारी से जुड़े हैं। वहीं 21 प्रतिशत मौतें वन्यजीवों के आपसी संघर्ष के कारण हुईं। इसके अलावा शिकार (पोचिंग) और बदले की कार्रवाई में हत्या के मामले 14 प्रतिशत रहे।
बिजली करंट और फंदों से भी मौतें
आंकड़ों के मुताबिक, 8 तेंदुओं की मौत करंट लगने से हुई, जबकि 2 तेंदुए फंदों में फंसकर मारे गए। करीब 9 प्रतिशत मामलों में मौत के कारणों का पता नहीं चल सका।
वन विभाग के उपाय और सफाई
वन विभाग के अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एल कृष्णमूर्ति ने बताया कि तेंदुओं की मौत कम करने के लिए रोडमैप तैयार किया गया है। उन्होंने कहा कि नई सड़कों पर एनिमल पासेज, चेतावनी संकेत (signage) और नियमित गश्त जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। साथ ही सड़कों के पास जल स्रोत न बनाने की सलाह दी जा रही है, ताकि जानवर वहां आकर्षित होकर हादसों का शिकार न बनें।
मृत्यु दर पर वन विभाग का तर्क
वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, लगभग 4,000 तेंदुओं की आबादी में 149 मौतें केवल 4 प्रतिशत नुकसान दर्शाती हैं, जो सामान्य मानी जाती है। उन्होंने कहा कि बिल्ली प्रजाति (Cat Family) में 10 से 20 प्रतिशत वार्षिक मृत्यु दर भी स्वीकार्य होती है, खासकर उम्र और अन्य कारणों से।
एक्टिविस्ट ने उठाए गंभीर सवाल
आरटीआई दाखिल करने वाले एक्टिविस्ट अजय दुबे ने इन आंकड़ों को “चिंताजनक” बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि “टाइगर स्टेट” कहलाने वाला मध्य प्रदेश अब तेंदुओं के लिए कब्रगाह बनता जा रहा है। उन्होंने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के दिशा-निर्देशों के पालन में कमी और सुरक्षित कॉरिडोर की कमी को इसका बड़ा कारण बताया।
मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ती चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार, तेंदुए अक्सर मानव बस्तियों के आसपास पाए जाते हैं, जिससे दुर्घटनाओं और संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में सुरक्षित कॉरिडोर, बेहतर योजना और सख्त निगरानी की जरूरत पहले से ज्यादा महसूस की जा रही है। यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि बढ़ती आबादी के बावजूद तेंदुओं की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बनी हुई है और इसके लिए ठोस व समन्वित प्रयासों की तत्काल आवश्यकता है।