Bihar: झारखंड के जंगलों से निकलकर बिहार के जमुई क्यों पहुँचा 26 हाथियों का झुंड?
बिहार के जमुई जिले में पिछले करीब एक महीने से हाथियों का एक बड़ा झुंड वन क्षेत्रों में लगातार घूमता रहा। जानकारी के अनुसार, लगभग 26 हाथियों का यह झुंड झारखंड के जंगलों से भटककर जमुई पहुँचा था। इतने बड़े झुंड की मौजूदगी से स्थानीय ग्रामीणों और किसानों में शुरुआत में चिंता का माहौल जरूर बना, लेकिन वन विभाग की सक्रियता के चलते स्थिति नियंत्रण में रही।
लगातार निगरानी से टला बड़ा खतरा
वन विभाग ने इस पूरे दौरान झुंड की 24 घंटे निगरानी की। हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए ड्रोन मॉनिटरिंग, ट्रैकिंग सिस्टम और जमीनी स्तर पर टीमों की तैनाती की गई। इसके साथ ही स्थानीय प्रशासन, पुलिस और ग्रामीणों के सहयोग से मानव-हाथी संघर्ष की आशंका को काफी हद तक टाल दिया गया। वन विभाग के अनुसार, यह एक चुनौतीपूर्ण अभियान था क्योंकि हाथियों का झुंड अक्सर दिशा बदलता रहा और खेतों के पास भी पहुँचता था। ऐसे में टीमों ने समय रहते अलर्ट जारी कर ग्रामीणों को सतर्क रखा।
क्यों बदलते हैं हाथी अपनी जगह?
वन विभाग के अधिकारियों ने बताया है कि एशियाई हाथी जब अपनी जगह बदलते हैं तो वो भोजन और पानी की तलाश के लिए लंबी दूरी भी तय कर लेते हैं। अगर किसी प्राकृतिक वन क्षेत्र में चारे की कमी हो जाए तो हाथियों का झुंड चारा खोजने के लिए आसपास के खेतों पर ही निर्भर रहने लगता है। खासकर गेहूं, गन्ना और मक्का जैसी फसलों के खेतों पर उनकी खाने की निर्भरता बढ़ जाती है। ऐसे में मानव-हाथी संघर्ष की संभावना भी बढ़ जाती है, जिसे काबू करना वन विभाग और ग्रामीण लोगों के लिए भी कड़ी चुनौती बन जाता है।
1 महीने तक चला ऑपरेशन
करीब एक महीने तक चले इस ऑपरेशन के बाद वन विभाग ने समन्वित रणनीति अपनाते हुए हाथियों के झुंड को सुरक्षित तरीके से वापस झारखंड के जंगलों की ओर मोड़ दिया। इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि न तो किसी इंसान को नुकसान हुआ और न ही किसी हाथी को कोई चोट पहुंची।
फसल नुकसान का आकलन शुरू
हालांकि, हाथियों के आवागमन के दौरान कुछ इलाकों में किसानों की फसलों को नुकसान पहुँचा है। वन विभाग अब प्रभावित क्षेत्रों का सर्वे कर रहा है और नुकसान का आकलन किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि नियमानुसार किसानों को मुआवजा दिया जाएगा।
आगे की तैयारी और जागरूकता
वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए भविष्य में भी इसी तरह की निगरानी और समन्वय की रणनीति अपनाई जाएगी। साथ ही ग्रामीणों के बीच जागरूकता बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि ऐसी परिस्थितियों में लोग सुरक्षित व्यवहार कर सकें। इस पूरे घटनाक्रम ने यह दिखाया कि समय पर कार्रवाई, तकनीक का इस्तेमाल और स्थानीय सहयोग से बड़े से बड़े वन्यजीव संकट को भी बिना नुकसान के संभाला जा सकता है।