मध्यप्रदेश में पाँच लुप्तप्राय गिद्धों को मिली आज़ादी, आसमान में फिर गूँजेगी उनकी उड़ान
मध्यप्रदेश में एक ऐतिहासिक पल आया जब 23 फरवरी 2026 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हलाली डेम के जलक्षेत्र में पाँच लुप्तप्राय गिद्धों को खुले आसमान में उड़ान भरने का मौका दिया। देखते ही देखते वे पाँचों पक्षी नीले आकाश में गायब हो गए जैसे प्रकृति ने अपने खोए हुए बच्चों को वापस पा लिया हो। इन पाँच गिद्धों में चार भारतीय गिद्ध (Gyps indicus) और एक सिनेरियस गिद्ध (Aegypius monachus) शामिल हैं। ये दोनों ही प्रजातियाँ आज दुनियाभर में खतरे में हैं और इनकी संख्या तेज़ी से घट रही है। ऐसे में इन्हें प्रकृति की गोद में वापस लौटाना एक बड़ी और सराहनीय पहल है।
भारत में गिद्धों की 9 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से 4 अत्यंत संकटग्रस्त श्रेणी में हैं। 1980 के दशक में इनकी कुल संख्या लगभग 4 करोड़ थी, जो 2017 तक घटकर मात्र 19,000 रह गई। हालाँकि मध्यप्रदेश में तस्वीर बदल रही है। यहाँ 2019 में गिद्धों की संख्या 8,397 थी जो 2021 में 9,446, 2024 में 10,845 और 2025 में बढ़कर 12,981 हो गई, यानी छह साल में 35% की वृद्धि हुई। 2025 की जनगणना में 16 वन मंडल और 64 वन प्रभागों को शामिल किया गया और दक्षिण पन्ना में अकेले 1,127 गिद्ध दर्ज किए गए। मध्यप्रदेश अब पूरे भारत में गिद्ध संरक्षण में नंबर एक राज्य बन चुका है, जबकि दक्षिण भारत में अभी भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है जहाँ 2025 के सर्वेक्षण में केवल 390 गिद्ध ही पाए गए।
गिद्ध क्यों ज़रूरी हैं हमारे लिए?
बहुत से लोग गिद्धों को अशुभ या डरावना पक्षी समझते हैं, लेकिन सच यह है कि ये पक्षी हमारे पर्यावरण के सबसे ज़रूरी 'सफाईकर्मी' हैं। जब कोई जानवर मर जाता है, तो गिद्ध उसके शव को खाकर उसे जल्दी नष्ट कर देते हैं। इससे बीमारियाँ फैलने का खतरा बहुत कम हो जाता है। सोचिए, अगर ये गिद्ध न हों तो जंगलों और खेतों में मरे हुए जानवरों के शव सड़ते रहेंगे, जिससे हवा और पानी दोनों दूषित होंगे। इसीलिए वैज्ञानिक कहते हैं कि गिद्ध के बिना हमारा पारिस्थितिकी तंत्र यानी इकोसिस्टम अधूरा है।
सिनेरियस गिद्ध एक अंतरराष्ट्रीय मेहमान
इन पाँच गिद्धों में जो सिनेरियस गिद्ध है, वह खास तौर पर उल्लेखनीय है। यह प्रजाति मध्य एशिया से भारत तक लंबी दूरी की यात्रा करती है। इसके संरक्षण का मतलब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एक महत्वपूर्ण काम है। जब यह पक्षी एक देश से दूसरे देश में उड़ता है, तो वह कई देशों की प्रकृति को जोड़ता है। इसीलिए इसका संरक्षण पूरी दुनिया की जिम्मेदारी है।
आधुनिक तकनीक से होगी निगरानी
इन पाँचों गिद्धों को सिर्फ छोड़ा ही नहीं गया, बल्कि उन पर GPS-GSM उपग्रह ट्रांसमीटर भी लगाए गए हैं। यह एक छोटा सा यंत्र होता है जो पक्षी की पीठ पर लगाया जाता है और उसकी हर गतिविधि का डेटा सैटेलाइट के ज़रिए वैज्ञानिकों तक पहुँचाता है। इसकी मदद से यह जाना जा सकेगा कि ये गिद्ध कहाँ उड़ते हैं, कहाँ रुकते हैं, कौन से इलाके उनके लिए खतरनाक हैं और इंसानी गतिविधियाँ उनकी दिनचर्या को किस तरह प्रभावित कर रही हैं। यह जानकारी आने वाले वर्षों में गिद्धों की सुरक्षा के लिए बहुत काम आएगी। यह पूरा अभियान अकेले सरकार का नहीं है। इसमें तीन बड़े और जाने-माने संगठन भी शामिल हैं। WWF-India, Bombay Natural History Society (BNHS) और Wildlife SOS। ये तीनों संस्थाएँ वन विभाग के साथ मिलकर उपग्रह निगरानी कार्यक्रम चला रही हैं। इनके अनुभव और तकनीकी जानकारी से यह काम और भी मज़बूत हो गया है।
मध्यप्रदेश बन रहा है गिद्ध संरक्षण का अग्रणी राज्य
यह पहली बार नहीं है जब मध्यप्रदेश ने गिद्धों को प्रकृति में वापस लौटाया हो। इससे पहले भी राज्य के संरक्षण-प्रजनन केंद्र में पाले गए गिद्धों को जंगल में छोड़ा जा चुका है। देश में पहली बार यह काम मध्यप्रदेश ने किया था, जो उसे इस क्षेत्र में एक अग्रणी राज्य बनाता है। इसके साथ ही वल्चर एस्टिमेशन-2026 के शुरुआती आँकड़े भी उत्साहजनक हैं। दक्षिणपन्ना वन प्रभाग में सर्वेक्षण के पहले ही दिन एक हज़ार से अधिक गिद्ध देखे गए यह संख्या बताती है कि संरक्षण के प्रयास रंग ला रहे हैं।
चीता परियोजना भी चल रही है साथ-साथ
गिद्ध संरक्षण के साथ-साथ मध्यप्रदेश चीता पुनःस्थापन परियोजना में भी सक्रिय है। बोट्सवाना से आठ और चीते लाए जाने की योजना है, जो राज्य की वन्यजीव विविधता को और समृद्ध बनाएगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि उनकी सरकार पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता मानती है और वन्यजीव संरक्षण की दिशा में यह सफर आगे भी जारी रहेगा।