ग्रामीण भारतीय लड़कियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बनेगा AI चैटबॉट 'वाइसा', भारत-ब्रिटेन मिलकर करेंगे काम
भारत की करोड़ों ग्रामीण लड़कियां आज भी मानसिक तनाव और उदासी को अकेले झेलने पर मजबूर हैं, न कोई सुनने वाला, न कोई समझने वाला। घर में बात करने पर डांट मिलती है, बाहर बताने में शर्म लगती है और डॉक्टर तक पहुंचना तो जैसे सपने की बात है। लेकिन अब इस तस्वीर को बदलने की कोशिश शुरू हो गई है। भारत और ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक ऐसा डिजिटल दोस्त बनाने का फैसला किया है जो इन लड़कियों की बात सुनेगा, समझेगा और मदद करेगा।
नई दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में इस परियोजना का एलान किया गया। भारत के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, ब्रिटेन के इंपीरियल कॉलेज लंदन, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी और मिलान फाउंडेशन जैसे बड़े संस्थानों ने मिलकर 5.3 मिलियन पाउंड यानी करीब 56 करोड़ रुपये की इस परियोजना को शुरू करने की घोषणा की है। इस पूरे काम के लिए पैसा वेलकम ट्रस्ट नाम की एक अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्था ने दिया है, जो दुनियाभर में स्वास्थ्य सुधार के लिए काम करती है।
क्या है यह चैटबॉट?
यह चैटबॉट 'वाइसा' नाम के एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करेगा। वाइसा पहले से ही दुनिया के 105 से ज्यादा देशों में 70 लाख से अधिक लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है। यह ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा यानी NHS और कई सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों के साथ भी काम कर चुका है। इस नए प्रयोग में वाइसा को खास तौर पर भारतीय ग्रामीण लड़कियों की जरूरतों और उनकी संस्कृति के हिसाब से ढाला जाएगा।
यह चैटबॉट लड़कियों से बातचीत करके उनके तनाव, चिंता और उदासी को समझेगा। आसान भाषा में सलाह देगा और मानसिक सहारा बनेगा। अगर स्थिति गंभीर हो तो यह सही डॉक्टर या स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने का रास्ता भी बताएगा। सबसे बड़ी बात यह है कि यह पूरी तरह से निजी और सुरक्षित होगा, यानी लड़की जो भी कहेगी वह गुप्त रहेगा।
समस्या कितनी बड़ी है?
भारत में 10 से 19 साल के 25 करोड़ से ज्यादा बच्चे और किशोर हैं, जो दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, आधे मानसिक रोग 14 साल की उम्र से पहले ही शुरू हो जाते हैं। लेकिन इलाज नहीं होता क्योंकि न जागरूकता है, न सुविधा।
भारत में 95 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को मानसिक स्वास्थ्य सेवा नहीं मिल पाती। ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा और भी बुरा है। खास तौर पर लड़कियों के लिए, जहां न केवल डॉक्टर दूर है, बल्कि घर के बड़े भी मानसिक स्वास्थ्य को बीमारी मानने से इनकार करते हैं।
हाल में हुए एक युवा सर्वे में पाया गया कि भारत के छोटे शहरों और गांवों के युवा बड़े शहरों के मुकाबले एआई के साथ ज्यादा भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं। 43 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे किसी से नहीं कह सकते, ऐसी बातें चैटबॉट से कह देते हैं। यह इस बात का सबूत है कि ग्रामीण लड़कियों के लिए एक ऐसे डिजिटल दोस्त की जरूरत है जो कभी नहीं थकता, कभी नहीं डांटता और कभी नहीं जज करता।
पहले समझेंगे, फिर बनाएंगे
शोधकर्ता सीधे चैटबॉट नहीं बनाएंगे पहले वे ग्रामीण लड़कियों से बात करेंगे, उनकी जिंदगी को समझेंगे और यह जानने की कोशिश करेंगे कि उन्हें मानसिक मदद पाने में कौन सी रुकावटें आती हैं। इसके आधार पर वाइसा की एआई सामग्री और काम करने के तरीके को बदला जाएगा, ताकि यह उन लड़कियों की असली जिंदगी से मेल खाए।
इंपीरियल कॉलेज लंदन की प्रोफेसर सेयर कोस्टेलो ने कहा, "यह परियोजना एआई, डेटा साइंस, डिजिटल स्वास्थ्य और वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य के मेलजोल पर खड़ी है।" उन्होंने कहा कि उनका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि यह एआई टूल असली आंकड़ों पर आधारित हो और सही नतीजे दे।
वाइसा की मुख्य अनुसंधान अधिकारी चैताली सिन्हा ने कहा, "हमारा काम सिर्फ भाषा का अनुवाद नहीं है। हम समुदाय के साथ मिलकर एक ऐसा डिजिटल टूल बनाना चाहते हैं जो न सिर्फ चिकित्सकीय रूप से कारगर हो, बल्कि ग्रामीण भारत की लड़कियों के लिए सच में काम आए।"
चुनौतियां भी हैं
विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि चैटबॉट डॉक्टर की जगह नहीं ले सकता। कुछ मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि एआई पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता मानसिक क्षमता को कमजोर कर सकती है और युवा मुश्किल या बुरी लगने वाली भावनाओं से दूर भागने लगते हैं। जो उनके दीर्घकालिक मानसिक स्वास्थ्य के लिए सही नहीं। इसीलिए इस परियोजना में एआई के साथ-साथ इंसानी मदद की भी व्यवस्था रखी जाएगी। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में स्मार्टफोन और इंटरनेट की सीमित पहुंच भी एक बड़ी चुनौती है। हालांकि भारत के 5 लाख 97 हजार गांवों में से 5 लाख 72 हजार गांवों में अब मोबाइल कनेक्टिविटी पहुंच चुकी है, जो इस परियोजना के लिए एक अच्छी बुनियाद है।
उम्मीद की नई किरण
वेलकम ट्रस्ट की मानसिक स्वास्थ्य निदेशक मिरांडा वोलपर्ट ने कहा कि यह फंड खासतौर पर उन डिजिटल नवाचारों को ढूंढने और आगे बढ़ाने के लिए दिया गया है जो मानसिक समस्याओं की शुरुआत में ही मदद कर सकें। कुल मिलाकर, यह परियोजना उन लाखों ग्रामीण लड़कियों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है जो तनाव और अकेलेपन में जी रही हैं। अगर यह प्रयोग सफल हुआ तो वह दिन दूर नहीं जब एक साधारण स्मार्टफोन किसी ग्रामीण लड़की का सबसे भरोसेमंद मानसिक स्वास्थ्य साथी बन जाएगा।