बदलता रेगिस्तान: हरियाली की आड़ में भूजल संकट की कहानी
भारत का थार रेगिस्तान हरा हो रहा है। सुनने में अच्छा लगता है न? लेकिन यह हरियाली दरअसल एक बड़े पर्यावरणीय संकट की चेतावनी है।अब क्या है वह संकट और क्या हैं वह कारण जिनकी वजह से थार में हरियाली बढ़ रही है और उसकी वजह से हमें क्या फ़र्क पड़ेगा, इन्हीं सवालों के जवाब हम जानेंगे “बदलता रेगिस्तान” की इस सीरीज़ में।
बीकानेर के बज्जू गाँव में सीताराम बिश्नोई अपने सरसों के खेत में खड़े हैं। 40 साल पहले यहाँ सिर्फ रेत थी। रात में टीले इधर से उधर खिसक जाते थे। आज यही ज़मीन सोने जैसी पीली सरसों से लहलहा रही है। सीताराम कहते हैं, "रात और दिन जितना फर्क होता है, उतना बदल गया है यह इलाका।"
थार रेगिस्तान का यह बदलाव किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित एक शोध बताता है कि 2001–2023 के बीच थार में औसत वार्षिक हरियाली (NDVI- यानी Normalized Difference Vegetation Index जो सैटेलाइट से पेड़-पौधों की हरियाली मापता है) करीब 38% तक बढ़ी है, और इसी अवधि में कुल इलाके की वर्षा में लगभग 64% का इज़ाफ़ा दर्ज हुआ है। लेकिन इस हरे रंग के पीछे एक काला सच छिपा है राजस्थान के 295 में से 216 इलाके अब 'खतरे के निशान' पर हैं। ज़मीन के नीचे का पानी इतनी तेज़ी से खत्म हो रहा है कि कुछ जगहों पर 138 मीटर गहरे कुएँ भी सूख गए हैं। थार का हरा होना दरअसल एक धीमे संकट की शुरुआत है।
भूजल का खतरनाक दोहन
पहली नज़र में यह किसी चमत्कार जैसा लगता है कि जिस थार रेगिस्तान को लोग दशकों तक सूखे, रेत और बंजर ज़मीन का प्रतीक समझते थे, वही अब सैटेलाइट तस्वीरों में हरे रंग से चमकने लगा है। इसके पीछे बारिश में इज़ाफ़ा तो है ही, लेकिन उसके अलावा एक बड़ा कारण भूजल के इस्तेमाल से खेती भी है। साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक सालाना तौर पर हरियाली में भूजल का योगदान 55% और वर्षा का योगदान 45% है, यानी आधे से ज़्यादा हरा-भरा प्रभाव ज़मीन के नीचे से निकाले जा रहे पानी पर टिका हुआ है।
यही है वह संकट जो हरियाली के पीछे छुपा हुआ है, जो आने वाले समय में एक विकराल रूप ले सकता है। हालांकि हरियाली में वर्षा का योगदान सिर्फ 45% हैं लेकिन अगर भविष्य में मानसून वैसा नहीं रहा जैसा अभी के दौर में है उस स्थिति में ग्राउंड वाटर पर निर्भरता और ज़्यादा बढ़ने की पूरी सम्भावना है।
राजस्थान के जयपुर IMD के हेड राधेश्याम शर्मा ने गाँव कनेक्शन से बताया,"ज़रूरी नहीं कि जिस रफ़्तार से अभी बारिश बढ़ रही है, अगले 10-20 साल में भी उसी रफ़्तार से बढ़ती रहे। मानसून का अपना प्राकृतिक उतार-चढ़ाव है जो हर दशक में बदलता रहता है।"
रेत के टीलों से हरे खेतों तक का सफर
राजस्थान के बीकानेर ज़िले के बज्जू गांव के किसान सीताराम बिश्नोई पिछले 40 वर्षों से खेती कर रहे हैं। फिलहाल तो उनके खेतों में सरसों लहरा रही है। लेकिन बीते दिनों को याद करते हुए वह बताते हैं कि पहले सिर्फ वे मोटे अनाज ही पैदा कर पाते थे। पुराने दिनों को याद करते हुए उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया कि,“84 (1984) का यदि आकलन देखें ना, तो वह एक विकट दृश्य था। जैसे हम फ़िल्मों में देखते हैं, रात-रात में टीले इधर से उधर चले जाते थे। तो उस हिसाब से देखें तो उसमें रात और दिन का जो परिवर्तन होता है, उतना परिवर्तन हुआ है इलाके का।”
आकड़ें बतातें हैं समस्या कितनी बड़ी
‘ग्राउंड वाटर ईयर बुक 2023–24’ की रिपोर्ट के अनुसार राज्य के कुल 295 ब्लॉकों में से 216 ब्लॉक ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड’ की श्रेणी में पहुंच गए हैं, क्योंकि यहां पानी का इस्तेमाल उसके रिचार्ज से कहीं ज़्यादा है। इस खतरे की सबसे बड़ी वजह है कि ज़मीन के नीचे पानी पहुंचने का रेट बहुत धीमा है पथरीले इलाकों में मात्र 5% से 7% और मैदानी भागों में 10% से 15% जबकि बढ़ती जनसंख्या और इंडस्ट्रीज़ के कारण पानी बहुत तेज़ी से निकाला जा रहा है।इस रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान के केवल 38 ब्लॉक ही सेफ ज़ोन में बचे हुए हैं, बाकी गंभीर या तो रेड अलर्ट ज़ोन में हैं। सबसे ज़्यादा प्रभावित ‘खतरे के निशान’ वाले इलाकों में झुंझुनू, सीकर, नागौर और जयपुर जैसे उत्तर-पूर्वी और मध्य हिस्से शामिल हैं, जहां भूजल स्तर 40 मीटर से भी ज़्यादा नीचे चला गया है। जोधपुर के खारा गांव में तो जल स्तर रिकॉर्ड 138.87 मीटर तक गहरा दर्ज किया गया है।
सीकर ज़िले के किसान चंद्र सिंह भाटी ने गांव कनेक्शन को बताया कि,“जिस टाइम में कोई पानी का स्रोत नहीं था, जल संसाधन नहीं थे, उस टाइम में चार के अलावा पांचवीं कोई फसल नहीं थी यहां। आज तो रबी की फसल होती है और खरीफ की फसल होती है, दोनों फसलें होती हैं। सबसे अधिक कपास और मूंगफली की जो फसल है, वह सबसे ज़्यादा पानी की वैरायटी मांगती है, ज़मीन की गुणवत्ता मांगती है, तो वह सारी बातें उसमें मेंटेन हुई हैं।”
खेती किसानी में सिचाई की उचित सुविधा किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं लेकिन क्या रेगिस्तान में खेती का ये नया दौर जिसमें एक्सोटिक फसलें जैसे मूंगफली और कपास रेगिस्तान की धरती पर दबाव तो नहीं डाल रही।
अगर ऐसा है तो आगे चलकर ये कितनी बड़ी समस्या बनने वाली है इसी विषय पर वर्षो से काम कर रहे समाज शास्त्र के प्रोफेसर और पर्यावरणवादी, संयुक्त राष्ट्र के प्रतिष्ठित 'लैंड फॉर लाइफ' (Land for Life Award) पुरस्कार से सम्मानित श्याम सुन्दर ज्याणी ने गाँव कनेक्शन से चिंता ज़ाहिर करतें हुए कहा,
"अभी जो एग्रीकल्चर का पैटर्न है, वो सस्टेनेबल नहीं है। ग्राउंडनट और कॉटन दोनों ही वॉटर इंटेंसिव क्रॉप हैं। गेहूँ भी लगा रहे हैं लोग, वो भी वॉटर इंटेंसिव है। इस कारण जो वॉटर टेबल है वो लगातार नीचे जा रही है और बहुत बड़ा इलाका जो है वो 'डार्क ज़ोन' बन गया है।"
श्याम सुन्दर ने आगे कहा की गंगानगर और बांसवाड़ा को छोड़कर बाकी सारे जिले खतरे के निशान में हैं। जहां पहले मीठा पानी था, वहां पानी अब खारा हो गया है। पानी की गुणवत्ता बदल गई है जो फसल और लोग दोनों के लिए ख़राब है।
खेती के इस नए चलन को एक दुष्चक्र बतातें हुए उन्होंने कहा,"केमिकल फर्टिलाइज़ेशन से और फिर एक्सेस वॉटर यूज़, चाहे तो आप ग्राउंड वॉटर कर रहे हैं, चाहे आप इंदिरा गांधी नहर का पानी है उससे इरिगेशन कर रहे हैं, उससे आपका जो सॉइल फर्टिलिटी है वो भी डाउन चली गई है।आने वाले टाइम में एग्रीकल्चर इनपुट कॉस्ट बढ़ेगा और जब आप ओवर यूज़ करते हैं केमिकल फर्टिलाइज़र का, तो ज़मीन में खुश्की पैदा होती है, वो और ज्यादा पानी मांगती है। तो ये एक विशियस साइकिल है।"
अभी का हाल और भविष्य कैसा हो सकता है?
अगर रेगिस्तान हरे हो गए तो उसका असर हमारे इकोसिस्टम पर कैसा होगा यह सवाल बेहद रोचक है। इसी विषय पर गहरा अध्ययन कर चुके IIT गांधीनगर के अर्थ एंड साइंसेज़ के PhD स्कॉलर हिरेन सोलंकी ने गांव कनेक्शन को बताया कि,” अगर हम स्पीशीज़ (Species) के बारे में देखें, तो जैसे मान लो कि 'ग्रेट इंडियन बस्टर्ड' है या कोई ऐसी स्पीशीज़ है जिन्हें खुले घास के मैदान (Grasslands) ही चाहिए।हमने अपनी स्टडी में ऐसा देखा है कि जो ग्रासलैंड और छोटी वनस्पतियाँ हैं, वो रिप्लेस हो रही हैं बड़ी वनस्पतियों से, तो उनकी हाइट थोड़ी बढ़ जाती है। और वो ग्रासलैंड एग्रीकल्चर लैंड में कन्वर्ट हो रहा है। तो जो भी स्पीशीज़ ग्रासलैंड या ड्राई लैंड पर डिपेंडेंट हैं, वे शिफ्ट हो सकती हैं।”
"ग्रीन डेजर्ट" क्या है समाधान ?
प्रोफेसर श्याम सुन्दर जाणी ने राजस्थान के 18,000 से अधिक गांवों में करीब 40 लाख पौधे लगाए हैं और 15 लाख से अधिक परिवारों को इस मुहिम से जोड़ा है। लेकिन उन्होंने हमेशा इस बात क्या ध्यान रखा की रेगिस्तान के इकोसिस्टम को ध्यान में रखतें हुए ही पर्यावरण को बचाये रखना है। उन्होंने इसी बात पर ज़ोर देते हुए गाँव कनेक्शन से बताया कि,"रेगिस्तान अपने आप में एक संपूर्ण और अनोखा तंत्र (इकोसिस्टम) है। यहाँ ज़रूरत से ज़्यादा पेड़ लगाना कोई समाधान नहीं है, बल्कि यह एक नई मुसीबत खड़ा कर सकता है जिसे मैं 'हरा रेगिस्तान' (Green Desert) कहता हूँ। रेगिस्तान को केवल हरा करना समस्या का हल नहीं, बल्कि कई बार यह खुद एक समस्या बन जाता है।"
समाधान के बारें में बतातें हुए वो कहतें है कि,"हमें रेगिस्तान को ज़बरदस्ती हरा-भरा बनाने की ज़रूरत नहीं है। हमारी असली ज़रूरत यह है कि रेगिस्तान का जो प्राकृतिक स्वरूप (हैबिटेट) है, हम उसे फिर से जीवित करें और उसे स्वस्थ बनाएँ।खेती के बढ़ते चलन के कारण हमने अपनी पारंपरिक देशी वनस्पतियों को लगभग नष्ट कर दिया है। 'फोग' जैसे पौधे मिट्टी को मजबूती से बांधकर रखते थे (सैंड बाइंडर), और 'खेजड़ी' की पत्तियां ज़मीन के लिए बेहतरीन प्राकृतिक खाद (ऑर्गेनिक मैन्योर) का काम करती थीं। जुलीफ्लोरा (Prosopis juliflora) और अकेशिया टॉर्टिलिस (विलायती बबूल), यूकेलिप्टस ये हार्मफुल हैं। ये सभी प्लांटेशन नेटिव प्लांट्स नहीं है और यहाँ के एक्सीटेम के लिए बेहद नुकसानदायक है।
अंग्रेजी में एक कहावत है 'Blessing in disguise' - जो बुरा लगे वो अच्छा निकले। लेकिन थार का हरा होना इसका उल्टा है - एक 'Curse in disguise' - जो अच्छा लगे वो दरअसल खतरनाक हो।थार का हरा होना क्लाइमेट चेंज का दिया हुआ एक वरदान हो सकता है जो पहली नज़र में विकास की निशानी लग सकता है।