Carbon Credit Farming: पश्चिम यूपी में कार्बन क्रेडिट खेती होगी शुरू, किसानों की आय बढ़ाने की नई पहल

Gaon Connection | Mar 26, 2026, 18:57 IST
उत्तर प्रदेश में किसानों की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए एक नई योजना शुरू हो रही है। यह परियोजना कार्बन क्रेडिट पर आधारित खेती को प्रोत्साहित करेगी। खासकर पश्चिमी यूपी के तीन जिलों में इसका कार्यान्वयन होगा। धान की उपज पर विशेष फोकस किया जाएगा।
पश्चिमी यूपी के 3 जिलों में कार्बन-क्रेडिट खेती 

उत्तर प्रदेश में किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए एक नई और बड़ी पहल शुरू होने जा रही है। यह पहल कार्बन क्रेडिट पर आधारित खेती को बढ़ावा देगी, जो पश्चिमी यूपी के तीन जिलों - सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और शामली में लागू होगी। यह देश का पहला ऐसा बड़ा राज्य स्तरीय कार्यक्रम है, जिसे IIT Roorkee (IIT-R) लीड करेगा और खरीफ की फसल के साथ ही शुरू हो जाएगा। इस प्रोजेक्ट में धान की खेती पर खास ध्यान दिया जाएगा और पहले चरण में करीब पांच लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया जाएगा, जिसमें लगभग तीन लाख किसान शामिल होंगे।



किसानों की आय बढ़ाने की नई राह

यूपी कृषि विभाग ने इस अनोखे प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है। इस पहल के लिए पाँच निजी कंपनियाँ मिलकर पैसा लगा रही हैं, जिनमें Proclime Services (चेन्नई), Tryambhu Tech Solutions (संगारेड्डी), AccelESG India (रंगारेड्डी), Compliance Kart (नोएडा) और Satt Global Services (उदयपुर) शामिल हैं। कुल मिलाकर इस योजना में करीब 100 करोड़ रुपये का निवेश होने की उम्मीद है।



कार्बन क्रेडिट खेती: कैसे काम करेगी?

कार्बन क्रेडिट वाली खेती के तरीके खरीफ सीजन से ही शुरू हो जाएंगे, जो आमतौर पर मई से जून के बीच होता है। यह खास तौर पर धान की फसल के लिए होगा। इस प्रक्रिया में कई अहम कदम उठाए जाएंगे। सबसे पहले, मिट्टी की जाँच की जाएगी। इसके बाद, लेजर लैंड लेवलिंग (लेजर मशीन से खेत को बिल्कुल समतल करना) की जाएगी। फिर, सुपर सीडर (एक खास मशीन) का इस्तेमाल करके धान के बीज छोटे और बराबर दूरी वाले गड्ढों में बोए जाएंगे। इस प्रक्रिया का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि कटाई के बाद, फसल के अवशेष, जिन्हें 'पराली' कहते हैं, खेत में ही छोड़ दिए जाएंगे।



पर्यावरण और किसान दोनों के लिए फायदेमंद

इस खेती के तरीके की एक खास बात यह है कि उसी खेत का इस्तेमाल रबी की फसलों के लिए भी किया जा सकता है, बिना जुताई की जरूरत के। इस प्रक्रिया को 'मल्चिंग' (mulching) कहते हैं। Proclime Services के CEO, Kavin Kumar Kandasamy के मुताबिक, "खेत में छोड़ा गया अवशेष जैविक खाद का काम करता है।" इस जैविक खाद से रासायनिक खादों पर निर्भरता 30% से ज्यादा कम होने की उम्मीद है।



रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता होगी कम

कार्बन क्रेडिट पर आधारित खेती की पूरी पहल उत्तर प्रदेश में टिकाऊ खेती की दिशा में एक बड़ा कदम है। लेजर लैंड लेवलिंग और सुपर सीडर जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाने के साथ-साथ फसल के अवशेषों की मल्चिंग जैसी फायदेमंद प्रथाओं को एकीकृत करके, यह परियोजना न केवल किसानों की आय बढ़ाने का लक्ष्य रखती है, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल खेती को भी बढ़ावा देती है। शैक्षणिक संस्थानों, सरकारी निकायों और निजी कंपनियों के बीच यह सहयोग बड़े पैमाने पर प्रभाव डालने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की क्षमता को दर्शाता है।

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