Mobile Addiction: सुविधा, लत और सुरक्षा के बीच फँसे हैं बच्चे, Parents के लिए Psychiatrist ने सुझाए ज़रूरी नियम
आज की नई पीढ़ी उस दौर में पैदा हो रही है जहाँ मोबाइल फोन सिर्फ एक डिवाइस नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है। बच्चों की उँगलियाँ किताबों से पहले स्क्रीन को पहचानने लगी हैं और डिजिटल दुनिया उनकी सोच, पढ़ाई और व्यवहार को लगातार प्रभावित कर रही है। एक ओर स्मार्टफोन डिजिटल लर्निंग और जानकारी तक आसान पहुँच का ज़रिया बन रहे हैं, तो दूसरी ओर बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों की एकाग्रता, सेहत और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। इसी बहस के बीच हिमाचल प्रदेश सरकार ने स्कूलों में मोबाइल फोन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। सवाल ये है कि क्या मोबाइल फोन सच में बच्चों की पढ़ाई और सुरक्षा के लिए खतरा हैं, या फिर सही नियमों के साथ ये एक उपयोगी शैक्षिक साधन भी बन सकते हैं?
आज की नई पीढ़ी डिजिटल दुनिया में जन्म ले रही है। पैदा होते ही सेल्फी कैमरा उनकी आंखों के सामने आ जाता है। डिजिटल दुनिया में जन्में बच्चे Digital Literacy को अपने टीचर्स और पैरेंट्स के मुकाबले बेहतर तरीके से समझ रहे हैं। ये डिजिटल समझ बच्चों को क्लासरूम में पढ़ाई जाने वाली स्मार्ट एजुकेशन के बेहतर तरीके से समझने के कहीं न कहीं बहुत जरूरी हो जाती है। लेकिन बढ़ते स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों में एकाग्रता की कमी भी देखी जा रही है। स्कूलों में में पढ़ाई स्मार्ट उपकरणों के साथ होती है लेकिन समस्या ये आ रही है कि बच्चों को घर पर जो काम दिया जाता है स्कूलों की तरफ से जिसे "होमवर्क" कहा जाता है, वो भी अब स्मार्टफोन के सहारे ही किया जाता है या कहें पूरी तरह से स्मार्ट फोन पर होता है।
स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा सभी वयस्कों की जिम्मेदारी होती है जिसमें टीचर और अभिभावक दोनों शामिल होते हैं। स्कूलों में बच्चों द्वारा बढ़ता मोबाइल फोन का इस्तेमाल एक बड़ी चिंता का विषय है, जो बच्चों की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। इसी मामले को देखते हुए हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने स्कूलों में बच्चों के मोबाइल फोन को ले जाने पर पूरी तरह से बैन लगाने को कहा। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के आदेश के अनुसार, 1 मार्च 2026 से हिमाचल के सभी स्कूलों में छात्र-छात्राओं के मोबाइल फोन इस्तेमाल करने पर पूरी तरह से रोक लग जाएगी।
मोबाइल फोन के इस्तेमाल को लेकर हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने एक अहम फैसला सुनाया है. सीएम के आदेश के अनुसार, 1 मार्च 2026 से हिमाचल के सभी स्कूलों में छात्र-छात्राओं के मोबाइल फोन इस्तेमाल करने पर पूरी तरह से रोक लग जाएगी। कुछ साल पहले स्कूलों में बढ़ते मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने वहाँ के स्कूलों के लिए दिशानिर्देश जारी किए कि स्कूलों को मोबाइल फोन के उपयोग पर कैसे और क्यों प्रतिबंध लगाना चाहिए।
स्कूलों में मोबाइल फ़ोन के उपयोग से जुड़े कुछ आँकड़े इस प्रकार हैं:
ऑफकॉम (Ofcom) के अनुसार, UK में 12 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते 97% बच्चों के पास अपना मोबाइल फ़ोन होता है। 3-5 वर्ष की उम्र के 19% बच्चों के पास पहले से ही मोबाइल फ़ोन है, जबकि छह से सात वर्ष के बच्चों में यह आँकड़ा बढ़कर 30% हो जाता है। ऑफकॉम ने यह भी पाया कि 8–11 वर्ष के 63% बच्चे और 12–15 वर्ष के 93% बच्चे सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल करते हैं।
नेशनल बिहेवियर सर्वे के मुताबिक, माध्यमिक स्कूलों के 29% छात्र कहते हैं कि अधिकांश कक्षाओं में बच्चे बिना अनुमति मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल करते हैं।
ONS (ऑफिस फॉर नेशनल स्टेटिस्टिक्स) के अनुसार, हर पाँच में से एक बच्चा ऑनलाइन बुलिंग का शिकार हो चुका है।
RCPCH (रॉयल कॉलेज ऑफ पीडियाट्रिक्स एंड चाइल्ड हेल्थ) का कहना है कि स्क्रीन टाइम उन गतिविधियों का समय छीन लेता है जिनका बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जैसे मेलजोल, नींद और व्यायाम।
ऑफकॉम की रिपोर्ट बताती है कि- दुनिया भर में हर चार में से एक देश में स्कूलों में मोबाइल फ़ोन पर पहले से ही प्रतिबंध या कड़े नियम लागू किए जा चुके हैं।
साल 2021 में बढ़े इंटरनेट पर कदम
दुनिया भर में मोबाइल फोन का पढ़ाई में उपयोग ऑनलाइन कोर्स करने वाले छात्रों में अधिक होता है। साल 2021 में लगभग 220 मिलियन छात्र इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे थे। भाषा सिखाने वाली मोबाइल एप्लीकेशन "Duolingo" पर साल 2023 में हर दिन करीब 2 करोड़ लोग इस्तेमाल करते थे, वहीं 2021 में Wikipedia पर एक दिन में 20 करोड़ लोग आते थे पढ़ने के लिए। दुनिया भर में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 2005 में 16 प्रतिशत थी जो कि साल 2022 में बढ़कर 66 प्रतिशत हो गई।
भारत की बात करें तो कोरोना काल के दौरान मोबाइल फ़ोन बच्चों की पढ़ाई के लिए बेहद ज़रूरी हो गया था और मोबाइल ही एक ज़रिया था, जिसकी मदद से बच्चों को घर पर ही शिक्षा दी जा रही थी। कई अभिभावकों ने क़र्ज़ पर स्मार्टफोन लेकर अपने बच्चों को दिया। इसका असर ये हुआ स्मार्टफोन लगभग हर घर का हिस्सा बन गया और खासकर छोटे बच्चों को अपना खुद का निजी स्मार्टफोन मिल गया। प्रथम' (Pratham) फाउंडेशन की 'असर' (ASER) 2020 की रिपोर्ट (वेव 1) के मुताबिक जहाँ पहले गाँवों में कोविड के समय 36.5 प्रतिशत घरों में स्मार्टफोन था, वहीं कोविड के बाद के दो सालों के अंदर-अंदर 61.8 प्रतिशत घरों में स्मार्टफोन पहुँच चुका है। रिपोर्ट में लिखा है कि 2020 में लगभग एक-तिहाई ग्रामीण बच्चों के पास पढ़ाई के लिए कोई ऑनलाइन सामग्री नहीं थी, जबकि स्कूलों ने डिजिटल माध्यमों (जैसे स्मार्टफोन 61.8% घरों में) का उपयोग बढ़ा दिया था।
क्या स्कूलों में मोबाइल फ़ोन की अनुमति दी जानी चाहिए?
मोबाइल फोन की बढ़ती निर्भरता चाहे वो पढ़ाई को लेकर हो या फिर अपना समय बिताने के लिए सोशल मीडिया सर्फिंग हो, दोनों ही पहलू में स्क्रीन टाइम को बढ़ावा मिलता हैं। लेकिन इसके उलट दूसरा पहलू भी है कि कक्षाओं में मोबाइल फोन के कुछ वास्तविक फायदे भी हैं, जिनके बारे में चर्चा कम ही की जाती है।
1 डिजिटल लर्निंग- यदि मोबाइल फोन का सही से उपयोग किया जाए, तो ये डिवाइस बच्चों की पढ़ाई को बेहतर बना सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ ऐप्स और गेम्स पढ़ाई के विषय सिखाने और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देने में मदद करते हैं। ये तरीक उन बच्चों के लिए जरूरी होते हैं जिनकी विशेष शैक्षिक जरूरतें होती हैं।
2 किसी विषय के रिसर्च के लिए- मोबाइल एक ऐसा डिवाइस है जो छात्रों के इंटरनेट का एक्सिस देता है। इंटरनेट जानकारी और सूचनाओं का भंडार है। पढ़ाई से संबंधित प्रोजेक्ट्स या कोर्स वर्क के समय रिसर्च करने के लिए मोबाइल एक आसान और सरल उपाय भी है जो किसी भी छात्र की किसी विषय के बारे में सीखने में मदद करता है।
3 दिनचर्या के कामों के लिए- कई बार बच्चों को स्वास्थ्य से जुड़ी ज़रूरतों को याद रखने के लिए मोबाइल फ़ोन की जरूरत पड़ती है, जैसे दवाइयाँ समय पर लेना, दवा समय से लेने के लिए अलर्ट लगाकर रखना या फिर बच्चा घर से बाहर पढ़ाई के लिए जा रहा है तो घरवालों से कनेक्ट रहने के लिए, घर से बाहर डिजिटल पेमेंट करने के लिए मोबाइल साथ में रखना।
4 कम्यूनिकेशन आसान करने के लिए – मोबाइल फ़ोन स्कूल को छात्रों तक जानकारी जल्दी और आसानी से पहुँचाने का साधन हैं, चाहे वह टाइम टेबल में बदलाव हो, स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी सूचना हो या साप्ताहिक नोटिस। ये सब जानकारी ईमेल या संदेश के ज़रिए भेजी जा सकती है और काग़ज़ी पत्रों की ज़रूरत कम हो जाती है।
5 आपात स्थिति में जरूरत – आपात स्थिति में परिवार के सदस्य से नियमित संपर्क की ज़रूरत हो सकती है। ऐसे में कक्षा में मोबाइल फ़ोन होने से वे हर समय संपर्क में रह सकते हैं।
ये तो हुआ मोबाइल फोन के स्कूलों में इस्तेमाल के फायदे क्या हो सकते हैं। अब आता है सबसे अहम सवाल कि स्कूल एक सेफ़ स्पेस माना जाता है तो बच्चों को स्कूल वो सुविधाएँ प्रोवाइड कराए जिसके लिए छात्र क्लासरूम में मोबाइल लाता है चाहे रिसर्च के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करना हो या फिर परिवार के साथ संपर्क में रहना हो। गाँव कनेक्शन ने इस बात का गहराई से समझने के लिए दिल्ली के एक स्कूल की अध्यापिका से संपर्क किया और जाना कि छात्रों का स्कूलों में मोबाइल लाना और इस्तेमाल करना उनकी पढ़ाई को कैसे डिस्टर्ब कर सकता है।
दिल्ली के उजवा गाँव के सरकारी महाविद्यालय की अध्यापिका उषा ने बताया कि - छात्र अपने माता-पिता की अनुमति के बिना मोबाइल स्कूल में लाते है। स्कूल की तरफ से छात्रों को किसी भी प्रकार का फोन लाने की अनुमति नहीं है। छात्रों के कक्षा में मोबाइल का इस्तेमाल करने से पढ़ाई डिस्टर्ब होती है, न सिर्फ मोबाइल लाने वाले बच्चों की बल्कि सहपाठी भी डिस्टर्ब होते हैं। सबसे अधिक छात्र मोबाइल का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर वीडियो देखने के लिए करते हैं, वो भी कक्षा के बीच में। इससे न तो पढ़ाई पर फोकस रहता है न ही छात्र अनुशासन में रहता है।
अध्यापिका उषा बताती हैं कि- कई छात्रों के परिवार की आर्थिक हाताल बेहतर होती हैं। जिसके चलते पेरेंट्स खुद अपने बच्चों को महंगे मोबाइल खरीद कर देते हैं। कई पेरेंट्स से हमने शिकायत की, लेकिन पेरेंट्स समस्या समझने के बजाय कारण बताते हैं कि "जी बच्चे जिद करते हैं तो दिलवा देते है मोबाइल, हमारे घरों में, पड़ोस में सब मोबाइल चलाते है, बच्चा बड़ा हो रहा है तो जरूरत तो पड़ती ही है!" ऐसे में पेरेंट्स को अपने बच्चों की ज़िद को मानने के बजाय उस जिद के नुकसान के बारे में बात करनी चाहिए, जो ज्यादातर पेरेंट्स समझ नहीं पाते।
छात्रों का स्कूलों में मोबाइल इस्तेमाल के नुकसान
क्या स्कूलों में मोबाइल फ़ोन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए? इस पर अध्यापिका उषा बताती हैं कि- "स्कूलों में बच्चों के पास मोबाइल फ़ोन होने के नुकसान काफ़ी ज़्यादा हैं। इसी वजह से स्कूलों में कक्षा के दौरान मोबाइल फ़ोन के उपयोग पर रोक लगाई जानी चाहिए।" अध्यापिका उषा मानती हैं कि कुछ जरूरी कारण हैं जिनकी वजह से स्कूलों में मोबाइल फ़ोन पर प्रतिबंध होना अनिवार्य होना चाहिए जैसे-
1 मोबाइल फ़ोन ध्यान भटकाते हैं – सोशल मीडिया नोटिफ़िकेशन, ऐप्स और गेम्स बच्चों का ध्यान पढ़ाई से भटका देते हैं और कक्षा में बार-बार अड़चन पैदा करते हैं। इसके कारण छात्रों को ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई होती है, शिक्षकों का ध्यान भी बँटता है और एकेडमिक प्रोग्रेस पर नकारात्मक असर पड़ता है।
2 मोबाइल फ़ोन बुलिंग को बढ़ावा दे सकते हैं – सोशल मीडिया या इंटरनेट के ज़रिए की जाने वाली बदमाशी को साइबर बुलिंग कहा जाता है, जिसका बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा और गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। स्कूल में मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल से साइबर बुलिंग की संभावना बढ़ जाती है, क्योंकि छात्र हर समय ऑनलाइन रहते हैं और दूसरे छात्रों द्वारा ऑनलाइन उत्पीड़न के लिए हमेशा असुरक्षित बने रहते हैं।
3 मोबाइल फ़ोन बच्चों को शोषण के ख़तरे में डालते हैं – इंटरनेट और सोशल मीडिया के ज़रिए बच्चों का शोषण और दुर्व्यवहार एक गंभीर समस्या है, क्योंकि इससे शोषण करने वालों को बच्चों तक बिना किसी रोक-टोक के, दिन-रात सीधी पहुँच मिल जाती है। बच्चों को इंटरनेट सुरक्षा और उससे जुड़े ख़तरों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए ताकि वे खुद को नुकसान से बचा सकें।
4 मोबाइल फ़ोन स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा करते हैं – मोबाइल फ़ोन का अत्यधिक उपयोग आँखों में तनाव, गर्दन की समस्या, नींद में बाधा और चिंता जैसी कई स्वास्थ्य परेशानियाँ पैदा कर सकता है। यदि छात्र स्कूलों में होने वाले ब्रेक और गेम्स पीरियड के समय भी मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल करते हैं, तो इससे शारीरिक गतिविधि भी कम हो जाती है।
5 मोबाइल फ़ोन बच्चों की वेलबीइंग पर असर डालते हैं – मोबाइल फ़ोन पर ज़्यादा समय बिताने का मतलब है कि बच्चे अपने सहपाठियों के साथ आमने-सामने कम बातचीत करते हैं, जिससे उनके मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य पर नेगेटिव प्रभाव पड़ता है। छात्रों को ब्रेक के समय फ़ोन चलाने के बजाय खेलने-कूदने और मेलजोल बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।
माँ-पिता कैसे छुड़ाएँ बच्चों की मोबाइल की आदत ?
जिस घर में आज के समय में छोटे या स्कूल जाने वाले बच्चे हैं, उस घर के बड़े-बुजुर्ग और माता-पिता अक्सर बच्चों की मोबाइल के अधिक इस्तेमाल की आदत से परेशान रहते हैं। जिसका हल खोजना आज के पेरेंट्स के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। ऐसे में गाँव कनेक्शन ने दिल्ली के नजफगढ़ में रहने वाले एक माता -पिता से बात की जिनके दो बच्चे पूर्व (16 साल) और लक्षित (11 साल) अभी स्कूल में पढ़ाई करते हैं। पूर्व के पिता नवीन कुमार और माँ नीति ने बताया कि वो अपने छोटे बेटे लक्षित की मोबाइल देखने की आदत से काफी परेशान थे। लक्षित के पिता ने बताया कि-"बार-बार मना करने के बाद भी मोबाइल पर कार्टून और रील्स देखने की आदत हम नहीं बदल पा रहे थे।"
नवीन कुमार ने आगे बताया कि-"इसी लत के कारण लक्षित की पढ़ाई पर असर पड़ने लगा, जिससे वो पढ़ाई में फोकस नहीं कर पाता था। परीक्षा में नंबर भी कम आने लगे थे। हमें बहुत चिंता होने लगी थी। फिर हमने घर में कुछ नियम बनाए मोबाइल देखने को लेकर। जैसे- सप्ताह में सिर्फ एक दिन मोबाइल दिया जाएगा, वो भी 2 से 3 घंटे के लिए, अगर तय दिन के अलावा मोबाइल देखा तो लक्षित की पसंद की चीजें हम नहीं दिलवाते थे। सिर्फ नियम ही अकेला रास्ता नहीं था, बच्चे की आदत को सुधारने के लिए। उसे बार-बार समझाया गया कि ज्यादा मोबाइल देखोगे तो आंखें खराब हो जाएंगी, उम्र बढ़ने के साथ-साथ दिखाई देना बंद हो जाएगा। बच्चे ने इस बात को समझा या डरा ये हम नहीं जानते, लेकिन धीरे-धीरे अब वो सप्ताह के उसी दिन मोबाइल देखता है जिस दिन तय किया गया है। बाकि दिन वो अपना समय आस-पड़ोस के बच्चों के साथ खेलने में बिताता है।"
लक्षित की माँ बताती हैं कि- हम ये तो नहीं कह सकते कि मोबाइल देखने की आदत फिर से नहीं आएगी, लेकिन हाँ अगर घर पर कुछ नियम और घर का माहौल बच्चों की हेल्थ को देखते हुए बनाएँ जाएँ तो काफी हद कर बच्चों की मोबाइल की लत को कंट्रोल किया जा सकता है।
दिल्ली के गंगाराम अस्पताल के Psychiatrist डॉ राजीव मेहता बताते हैं कि - बच्चों के मोबाइल एडिक्शन के सबसे पहले जिम्मेदार पेरेंट्स होते हैं। किसी भी लत को दूर करने के उपाय के बारे में सोचा जाता है तो सबसे पहले लत लगी क्यों और जिसकी चीज़ की लत है वो पेशेंट को मिल कहाँ से रही है। ऐसे में अगर कोई पाँच साल का बच्चा लगातार मोबाइल चलाता है तो ये पेरेंट्स की गलती है कि इतने छोटे बच्चे के हाथों में मोबाइल दिया गया। डॉ राजीव मेहता ने कुछ जरूरी पॉइंट्स बताए हैं कि-
Moblie Addiction की रोकथाम सबसे पहले कैसे करनी है ?
- सबसे जरूरी है बच्चों पर कंट्रोल रखें।
- अगर बच्चा मोबाइल देख रहा है तो उसका सख्ती से टाइम फिक्स करें।
- पेरेंट्स ये जांचे की बच्चा एकेडमिक या नॉन एकेडमिक, किस कारण से मोबाइल देख रहा है।
- जिस डिवाइस को बच्चा यूज कर रहा है इसमें एप्लीकेशन को रेगुलेट करें। जो ऐप बच्चा डाउनलोड कर रहा है वो रेगुलेट करें, ताकि बच्चा आपत्तिजनक, हिंसक कंटेंट देखने से बचा रहे।
- ऐप्स को रेगुलेट करने से टाइम चेक कर सकते हैं कि कितनी देर बच्चा किस एप्लीकेशन पर समय बिता रहा है, ऐसा करने से समय रहते मोबाइल इस्तेमाल के बढ़ते समय को कंट्रोल किया जा सकता है।
- ये कुछ जरूरी सुझाव हैं जिनको शुरूआती स्टेज में ही पेरेंट्स को ध्यान में रखना होगा, जब आपका बच्चा कम उम्र में मोबाइल माँगने लगता है।
बच्चा मोबाइल देखने की ज़िद करे तो क्या करें ?
कई रिपोर्ट्स बताती है कि रेगुलेशन से बचने के लिए बच्चे पेरेंट्स को ब्लैकमेल करना शुरू कर देते हैं जैसे-गुस्सा हो जाना,घर से बाहर निकल जाने की धमकी देना,चिल्लाने लगना या फिर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगना। हालिया हुई गाजियाबाद की घटना में मोबाइल इस्तेमाल पर रोक लगाने से तीन बहनों ने घर की बालकनी से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। ऐसे में पेरेंट्स बच्चों के साथ सख्त व्यवहार करने से डरने लगते हैं।
इसके लिए डॉ राजीव मेहता बताते हैं, "ऐसे में पेरेंट्स को बिलकुल भी डरना नहीं चाहिए। क्योंकि बच्चा ऐसा तभी करता है जब उससे मोबाइल छीन लिया जाए, लेकिन मोबाइल न देखें तो क्या करना है ये ना बताया जाए। जैसे घर से बाहर न जाने देना, न ही कोई नई हॉबी सिखाना या फिर अपने खाली समय को रचनात्मक तरीके से कैसे सदुपयोगी बनाना है ये भी न बताना। ऐसे न करने से बच्चा अपने मनोरंजन के लिए सबसे आसान उपाय की तरफ आकर्षित होता है जो है मोबाइल। लेकिन इस स्टेज पर ये समझना भी जरूरी है कि बच्चा अपने खाली समय का सदुपयोग करे तो कैसे करे।"
बच्चों की मोबाइल से दूरी बनाने के लिए पेरेंट्स को क्या करना है?
- बच्चों को बाहर जाने दें, अपने जाने-पहचाने या आस-पड़ोस के इलाके तक, घर में बाँध कर न रखें।
- पड़ोसी बच्चों के साथ दोस्ती बढ़ाने दें, उनके साथ खेलने दें।
- घर के अंदर फिजिकल कार्ड गेम्स, बोर्ड गेम्स रखें।
- बच्चों को सैर पर लेकर जाएँ, नेचर के करीब रखें। जितना हो सके बच्चे के साथ समय बिताएँ।
- सबसे जरूरी है पेरेंट्स खुद रोल मॉडल बनें। बच्चों के सामने अनावश्यक फोन न चलाएँ न ही इंटरनेट सर्फिंग करें।
- अधिक फोन चलाने से सेहत पर क्या असर होता है, उसके बारे में बच्चों को प्रेम से समझाया जाए।
- बच्चों के साथ दोस्ती बना कर रखें, ताकि बच्चे अपने मन के भाव कहने में हिचके ना।
- अगर बच्चे ने कोई गलती की है तो, गलती के क्या नुकसान होते हैं या हो सकते हैं वो समझाएँ, ताकि बच्चा आपसे डरे नहीं बल्कि आप पर भरोसा आपका कहना मानना शुरू करे।
- अगर इन कोशिशों के बाद भी बच्चा मोबाइल की लत नहीं छोड़ रहा है तो आपको मनोचिकित्सक से सलाह लेकर बच्चे की काउंसलिंग करवानी चाहिए।
- Right vs Responsibility मॉडल बच्चों को समझाएँ, की मोबाइल चलाना बच्चा हक समझता है तो मोबाइल के इस्तेमाल की कुछ जिम्मेदारियाँ होती हैं, उसी के अनुसार मोबाइल का इस्तेमाल करें। ऐसा करने से बच्चा धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारी समझना शुरू कर सकता है।