जलवायु संकट की नई रिपोर्ट: 1995 से अब तक 8 लाख से ज़्यादा मौतें, भारत 9वें सबसे प्रभावित देश के रूप में दर्ज

Gaon Connection | Nov 13, 2025, 13:26 IST
COP30 में जारी क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026 ने एक बार फिर दिखाया है कि जलवायु संकट अब भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की सच्चाई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1995 से 2024 के बीच भारत बार-बार बाढ़, चक्रवात, लू और सूखे जैसी चरम मौसम की घटनाओं से प्रभावित हुआ है और अब दुनिया के दस सबसे असुरक्षित देशों में नौवें स्थान पर है।

कभी किसी किसान के खेत में अचानक आई बाढ़ ने उसकी सालभर की मेहनत बहा दी, तो कहीं तपती लू ने किसी मज़दूर की ज़िंदगी छीन ली। कभी कोई किसान सूखे के कारण अपनी फसल नहीं काट पाया, तो किसी बच्चे ने तूफ़ान में अपना घर खो दिया। ऐसे लाखों चेहरे और कहानियाँ अब दुनिया के हर कोने में एक जैसी लगने लगी हैं, क्योंकि जलवायु संकट अब सीमाओं का नहीं, इंसानियत का मसला बन चुका है।





COP30 में जारी क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026 ने एक बार फिर दिखाया है कि जलवायु संकट अब भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की सच्चाई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1995 से 2024 के बीच भारत बार-बार बाढ़, चक्रवात, लू और सूखे जैसी चरम मौसम की घटनाओं से प्रभावित हुआ है — और अब दुनिया के दस सबसे असुरक्षित देशों में नौवें स्थान पर है।





भारत पर लगातार हो रहा क्लाइमेट का वार





1995 से 2024 तक बना रहा चरम मौसम की घटनाओं का निशाना





ब्राज़ील के बेलेम में आयोजित COP30 सम्मेलन में जारी जर्मनवॉच की रिपोर्ट “क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026” ने एक बार फिर दिखाया कि जलवायु संकट अब सीमाओं से परे एक वैश्विक मानवीय चुनौती बन चुका है।





रिपोर्ट के अनुसार, 1995 से 2024 के बीच दुनिया भर में 9,700 से अधिक चरम मौसम घटनाओं ने 8,32,000 से ज़्यादा लोगों की जान ली और करीब 4.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का आर्थिक नुकसान किया।





इस अवधि में भारत उन देशों में शामिल रहा, जिन्हें इन घटनाओं ने सबसे ज़्यादा झकझोरा। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत इस अवधि में दुनिया के दस सबसे अधिक प्रभावित देशों में नौवें स्थान पर रहा।


भारत को बाढ़, चक्रवात, लू और सूखे जैसी आपदाओं ने बार-बार प्रभावित किया है, और अब चरम मौसम देश के कई हिस्सों में एक स्थायी संकट बन चुका है।





चरम मौसम: तीन अरब लोगों पर संकट





रिपोर्ट बताती है कि दुनिया की 40% आबादी — यानी तीन अरब से ज़्यादा लोग — उन 11 देशों में रहते हैं जो पिछले 30 वर्षों में बार-बार जलवायु आपदाओं की चपेट में आए हैं।





इन देशों में भारत (9वें स्थान पर), चीन (11वें), लीबिया (4वें), हैती (5वें) और फ़िलीपींस (7वें) जैसे देश शामिल हैं।


दिलचस्प यह है कि इनमें से कोई भी देश समृद्ध औद्योगिक देशों की श्रेणी में नहीं आता।





वहीं, विकसित देश भी अब इस संकट से अछूते नहीं हैं — फ़्रांस (12वें), इटली (16वें) और अमेरिका (18वें) जैसे देशों का नाम भी शीर्ष 30 सबसे प्रभावित देशों में शामिल है।





रिपोर्ट की मुख्य झलकियां (1995–2024)





9,700 से अधिक चरम मौसम की घटनाएँ दर्ज





8.3 लाख से अधिक मौतें





4.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा आर्थिक नुकसान





हीटवेव और तूफान मानव जीवन के लिए सबसे बड़े ख़तरे





बाढ़ से सबसे ज़्यादा आबादी प्रभावित





रिपोर्ट की सह-लेखिका लौरा शेफ़र के अनुसार, “तूफानों ने अब तक सबसे ज्यादा आर्थिक नुकसान किया है, जबकि बाढ़ ने सबसे अधिक लोगों को प्रभावित किया है। हीटवेव आज सबसे बड़ा मानवीय ख़तरा बन चुकी है।”







सबसे अधिक प्रभावित देश (1995–2024)





डॉमिनिका





म्यांमार





होंडुरस





लीबिया





हैती





ग्रेनाडा





फ़िलीपींस





निकारागुआ





भारत





बहामास





वर्ष 2024 में सबसे प्रभावित देश





सेंट विंसेंट एंड द ग्रेनेडाइन्स, ग्रेनाडा, चाड, पापुआ न्यू गिनी, नाइजर, नेपाल, फ़िलीपींस, मलावी, म्यांमार और वियतनाम।





भारत में बढ़ती हीटवेव और चक्रवातों की तीव्रता





रिपोर्ट में उद्धृत एक 2025 के अध्ययन के मुताबिक, चक्रवात ‘अम्फान’ (2020) की तीव्रता असामान्य रूप से गर्म समुद्री तापमान के कारण बढ़ी — जो मानवजनित जलवायु परिवर्तन का प्रत्यक्ष परिणाम था।


साथ ही, भारत में हीटवेव अब अधिक लंबी और घातक होती जा रही हैं, जिनका असर न केवल स्वास्थ्य बल्कि कृषि, जल संसाधन और बिजली आपूर्ति तक महसूस किया जा रहा है।





आईपीसीसी के अनुसार, औसत और चरम दोनों तरह की गर्मी हर महाद्वीप पर बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अब दुनिया में होने वाली हर हीटवेव में मानवीय गतिविधियों की भूमिका अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई है।





वीरा क्यूंज़ेल, वरिष्ठ सलाहकार (एडॉप्टेशन और मानवाधिकार) के अनुसार, “भारत, हैती और फ़िलीपींस जैसे देशों को इतनी आवृत्ति से आपदाएँ झेलनी पड़ रही हैं कि उन्हें अगले संकट से पहले संभलने का समय तक नहीं मिलता। इन देशों के लिए दीर्घकालिक सहायता और जलवायु फंडिंग बेहद ज़रूरी है।”





रिपोर्ट का आधार





क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स इंटरनेशनल डिज़ास्टर डेटाबेस (EM-DAT), वर्ल्ड बैंक और IMF के आंकड़ों पर आधारित है।


देशों की रैंकिंग छह संकेतकों से तय की जाती है —


मृतकों की संख्या, प्रभावित लोगों की संख्या, और आर्थिक नुकसान (सापेक्ष और पूर्ण दोनों रूपों में)।





विशेषज्ञों की राय





डेविड एकस्टीन, वरिष्ठ सलाहकार (क्लाइमेट फाइनेंस), जर्मनवॉच: “अब वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में तुरंत कटौती ज़रूरी है। अगर कार्रवाई में देरी हुई, तो मौतों और आर्थिक तबाही का सिलसिला बढ़ता जाएगा।”





वहीं लौरा शेफ़र, प्रमुख (अंतरराष्ट्रीय जलवायु नीति विभाग) के अनुसार, “हीटवेव और तूफ़ान सबसे अधिक जानलेवा साबित हुए हैं, जबकि आर्थिक दृष्टि से तूफानों का नुकसान सबसे बड़ा रहा है।”





वैश्विक परिप्रेक्ष्य





रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब दुनिया भर के नेता COP30 में जलवायु कार्रवाई को तेज़ करने की कोशिश कर रहे हैं।


इस साल अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने भी यह ऐतिहासिक राय दी कि देशों पर जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान को रोकने और उसकी भरपाई करने की कानूनी ज़िम्मेदारी है।


वहीं, वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट 2025 के अनुसार, चरम मौसम अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खतरा है — युद्ध के बाद।





भारत के लिए चेतावनी





भारत पहले से ही लंबी हीटवेव, बार-बार आने वाली बाढ़ और चक्रवातों से जूझ रहा है।


रिपोर्ट बताती है कि अगर उत्सर्जन में तेजी से कटौती नहीं हुई और अनुकूलन (Adaptation) व क्लाइमेट फाइनेंस पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में यह संकट और गहराएगा।





यह चेतावनी केवल आंकड़ों की नहीं — बल्कि भविष्य की सुरक्षा की पुकार है।