Designer Rice: CSIR वैज्ञानिकों ने बनाया हाई-प्रोटीन और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI)वाला पौष्टिक ‘डिज़ाइनर राइस’
भारत में चावल सिर्फ एक भोजन नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है। देश के करोड़ों लोग रोजाना चावल खाते हैं। लेकिन आम सफेद चावल में ज्यादातर स्टार्च होता है, जो शरीर में जल्दी शुगर में बदल जाता है। यही वजह है कि डॉक्टर अक्सर मधुमेह के मरीजों को चावल कम खाने की सलाह देते हैं। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इसका एक नया समाधान ढूंढ लिया है। केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित CSIR-National Institute for Interdisciplinary Science and Technology के वैज्ञानिकों ने ऐसा ‘डिज़ाइनर राइस’ विकसित किया है, जिसमें सामान्य चावल के मुकाबले तीन गुना ज्यादा प्रोटीन है और इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) भी कम है।
चावल को नए तरीके से बनाया गया
इस परियोजना का नेतृत्व संस्थान के निदेशक C. Anandharamakrishnan ने किया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस चावल को बनाने के लिए जेनेटिक बदलाव नहीं किया गया, बल्कि फूड प्रोसेसिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इस प्रक्रिया में पहले टूटे हुए चावल (ब्रोकन राइस) को आटे की तरह पीस लिया जाता है। फिर उसमें प्रोटीन और जरूरी पोषक तत्व जैसे आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 मिलाए जाते हैं। इसके बाद इस मिश्रण को फिर से चावल के दानों के आकार में तैयार किया जाता है। खास बात यह है कि यह चावल दिखने, पकने और स्वाद में लगभग सामान्य चावल जैसा ही होता है, लेकिन पोषण के मामले में काफी बेहतर है।
मधुमेह और कुपोषण से लड़ने में मदद
भारत में एक तरफ मधुमेह के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बड़ी आबादी कुपोषण और पोषक तत्वों की कमी से भी जूझ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह नया चावल दोनों समस्याओं से निपटने में मदद कर सकता है।
- इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स 55 से कम है, जिससे खाने के बाद ब्लड शुगर तेजी से नहीं बढ़ता।
- सामान्य चावल में जहाँ लगभग 6 से 8 प्रतिशत प्रोटीन होता है, वहीं इस डिजाइनर चावल में 20 प्रतिशत से अधिक प्रोटीन पाया जाता है।
- इसमें आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 जैसे जरूरी पोषक तत्व भी शामिल किए गए हैं, जो एनीमिया जैसी समस्याओं से बचाव में मदद कर सकते हैं।
उद्योगों को भी सौंपी गई तकनीक
इस तकनीक को प्रयोगशाला से बाजार तक पहुँचाने के लिए वैज्ञानिकों ने इसे उद्योगों के साथ साझा किया है। संस्थान ने यह तकनीक Tata Consumer Products Limited जैसी कंपनियों को ट्रांसफर की है, ताकि इसे बड़े स्तर पर तैयार कर लोगों तक पहुँचाया जा सके। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस चावल का स्वाद भी सामान्य चावल जैसा ही है, इसलिए लोगों को अपनी खाने की आदतें बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
टूटे चावल से बनेगा नया अवसर
इस तकनीक की एक खास बात यह भी है कि इसमें टूटे हुए चावल का इस्तेमाल किया जाता है, जो अक्सर मिलिंग के दौरान निकलते हैं और कम कीमत पर बिकते हैं। इससे किसानों और चावल उद्योग को भी अतिरिक्त फायदा मिल सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर अपनाई जाती है तो यह सिर्फ पोषण सुधारने में ही नहीं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और टिकाऊ खाद्य व्यवस्था बनाने में भी मदद कर सकती है। इस तरह वैज्ञानिकों का यह नया ‘डिज़ाइनर राइस’ भविष्य में भारत की थाली को और ज्यादा पौष्टिक बनाने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है।