Dairy Business: करना चाहते हैं डेयरी बिज़नेस? कम लागत, ज्यादा कमाई वाली इन देसी गायों के बारे में जानें
भारत की डेयरी इंडस्ट्री का जादू देसी गायों में छुपा है। गिर, साहीवाल, थारपारकर जैसी नस्लें न केवल दूध के कम खर्चीले उत्पादन में मददगार हैं, बल्कि ये हमारे पर्यावरण और जलवायु के साथ भी मेल खाती हैं। ये नस्लें कम लागत, बेहतर अनुकूलन और A2 दूध के कारण किसानों के लिए लाभकारी विकल्प हैं। क्षेत्र के अनुसार नस्ल चुनकर पशुपालन को टिकाऊ और फायदे का बिज़नेस बनाया जा सकता है।
Low Cost Dairy Farming: भारत की डेयरी इंडस्ट्री की असली ताकत देसी गायों में है। ये गायें हमारे मौसम, खाने और खेती के हिसाब से सालों से ढल चुकी हैं। आज जब किसान कम खर्च और लगातार कमाई चाहते हैं, तो देसी गायें एक अच्छा रास्ता दिखा रही हैं। गिर, साहीवाल, थारपारकर, हरियाणा और गंगातीरी जैसी देसी गायें कम लागत, बेहतर माहौल में रहने और A2 दूध देने की वजह से किसानों के लिए फायदेमंद हैं। अपने इलाके के हिसाब से सही नस्ल चुनकर पशुपालन को टिकाऊ और फायदे का धंधा बनाया जा सकता है।
देसी गायों की ये नस्लें कम लागत में ज्यादा और टिकाऊ दूध उत्पादन देती हैं। ये हमारे मौसम और खेती की परिस्थितियों के अनुसार सदियों से ढल चुकी हैं। इसलिए, आज के समय में जब किसान कम खर्च और स्थायी आमदनी की तलाश में हैं, तो ये नस्लें एक भरोसेमंद विकल्प बनकर सामने आती हैं।
गिर नस्ल
गिर नस्ल गुजरात के गिर वन क्षेत्र से आती है और पूरे उत्तर प्रदेश में आसानी से पाली जा सकती है। यह नस्ल औसतन 8 से 15 लीटर दूध रोज़ देती है, और कुछ अच्छी गायें 25 लीटर तक भी दे सकती हैं। गिर गाय का दूध शुद्ध A2 प्रकार का होता है, जिसकी सेहत के प्रति जागरूक लोगों में खास मांग है। कम संसाधनों में भी अच्छा उत्पादन इसकी बड़ी खासियत है।
साहीवाल नस्ल
ये नस्ल पंजाब क्षेत्र से मानी जाती है और उत्तर प्रदेश के लगभग सभी हिस्सों के लिए उपयुक्त है। यह नस्ल रोज़ाना 8 से 12 लीटर दूध देती है, जबकि श्रेष्ठ पशुओं में 18–20 लीटर तक उत्पादन देखा गया है। दूध में वसा प्रतिशत 4.5 से 5 प्रतिशत तक होता है, जिससे घी और दही बनाने में फायदा मिलता है। गर्म और शुष्क इलाकों में यह नस्ल खास तौर पर सफल मानी जाती है।
थारपारकर नस्ल
थारपारकर राजस्थान के थार मरुस्थल से आई है और बुंदेलखंड जैसे सूखे क्षेत्रों के लिए आदर्श मानी जाती है। यह गाय 6 से 12 लीटर प्रतिदिन दूध देती है और दोहरे उद्देश्य वाली नस्ल है, यानी दूध के साथ कृषि कार्यों में भी उपयोगी है। कम पानी और सीमित चारे में भी टिके रहना इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
हरियाणा नस्ल
ये नस्ल हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पाई जाती है। यह औसतन 6 से 10 लीटर दूध रोज़ देती है और अर्ध-शुष्क जलवायु में अच्छी तरह ढल जाती है। इस नस्ल की सहनशीलता और कार्य क्षमता अधिक होती है, इसलिए इसे दूध के साथ-साथ खेती के कामों के लिए भी पसंद किया जाता है। इसका दूध भी A2 श्रेणी में आता है।
गंगातीरी नस्ल
गंगातीरी पश्चिमी बिहार से निकली है और वाराणसी व पूर्वांचल क्षेत्र के लिए बेहद उपयुक्त मानी जाती है। यह नस्ल रोज़ाना औसतन 5 से 10 लीटर दूध देती है और गर्म व आर्द्र जलवायु में बेहतर प्रदर्शन करती है। कम इनपुट प्रणाली में पालन योग्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली यह नस्ल छोटे किसानों के लिए खास फायदेमंद है।
स्वदेशी दुग्ध नस्लें सिर्फ दूध का स्रोत नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण आजीविका का मजबूत आधार भी हैं। ये नस्लें कम खर्च में टिकाऊ उत्पादन देती हैं और बदलते मौसम में भी किसानों का साथ निभाती हैं। सही क्षेत्र में सही नस्ल का चयन किसान की आमदनी और स्थिरता दोनों बढ़ा सकता है।