Success Story: डिजाइनिंग की दुनिया से की खेती में वापसी, फहद फारूकी ने खेती को बनाया ‘डिज़ाइनर एग्रीकल्चर’ का मॉडल

Gaon Connection | Mar 03, 2026, 13:29 IST
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कमाल की सोच और आधुनिक शिक्षा के साथ दिल्ली में पले-बढ़े फहद फारूकी ने खेती को एक नई दिशा दी। डिज़ाइन की पढ़ाई के बाद, उन्होंने अपने खेतों में साधारण खेती की पारंपरिक पद्धतियों को चुनौती दी। अल्ट्रा हाई डेंसिटी और ट्रेलिस व्यवस्था के जरिए आम की ऐसी खेती की, जो 2500 रुपये प्रति किलो तक बिकते हैं।
<p>फहद फारूकी-सफल किसान<br></p>

किसान की छवि अक्सर सादगी, पुराने कपड़ों और पारंपरिक खेती से जुड़ी दिखाई देती है, लेकिन शहर के नजदीक बसे अपने खेतों में फहद फारूकी इस तस्वीर को बदलते नजर आते हैं। खैराबाद में जन्मे और दिल्ली में पले-बढ़े फहद ने शुरुआती शिक्षा के बाद डिजाइन की पढ़ाई की। उनका चयन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (NIFT) में हुआ, जहाँ से उन्होंने डिजाइन की बारीकियां सीखीं। कला और डिजाइन की इसी समझ को उन्होंने खेती में उतार दिया और आज वह खुद को सिर्फ किसान नहीं, बल्कि ‘एग्रीकल्चर डिज़ाइनर’ मानते हैं। समझते हैं उनकी सफल खेती की असल कहानी।



पढ़ाई डिजाइन की, रास्ता चुना खेती का

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उत्तर-प्रदेश के सीतापुर के खैराबाद में जन्मे फहद की परवरिश दिल्ली में हुई। परिवार ने बेहतर शिक्षा के लिए उन्हें शहर भेजा। कला और डिजाइन में रुचि होने के कारण उन्होंने फैशन और डिजाइन की पढ़ाई की। बड़े संस्थान में चयन हुआ, सपनों की दुनिया उनके सामने थी। लेकिन कॉरपोरेट और ग्लैमर की दुनिया में करियर बनाने के बजाय उन्होंने अपने पुश्तैनी खेतों को नई नजर से देखने का फैसला किया। उनका मानना था कि “अगर डिजाइन कपड़ों और इमारतों में हो सकता है, तो खेती में क्यों नहीं?” बस यहीं से शुरू हुई उनकी ‘डिज़ाइनर एग्रीकल्चर’ की यात्रा।



आम का बाग, लेकिन अलग अंदाज

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शहर के पास स्थित उनकी चार एकड़ की नर्सरी और करीब 20 बीघे में फैले आम के बाग में आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक सोच का मेल दिखता है। फहद अल्ट्रा हाई डेंसिटी और ट्रेलिस सिस्टम पर आम की खेती कर रहे हैं, जिसमें पेड़ों को तार-बांस का सहारा देकर उत्तर-दक्षिण दिशा में लगाया गया है ताकि सूरज की रोशनी का अधिकतम उपयोग हो सके। फहद ने करीब 20 बीघे में आम का बाग तैयार किया। यहाँ पारंपरिक तरीके से पेड़ नहीं लगाए गए, बल्कि वैज्ञानिक ढंग से ‘नॉर्थ-साउथ ओरिएंटेशन’ में रोपण किया गया ताकि सूरज की रोशनी का पूरा फायदा मिले। उन्होंने अल्ट्रा हाई डेंसिटी और ट्रेलिस सिस्टम अपनाया, जिससे पेड़ों की ऊंचाई, फैलाव और फल की गुणवत्ता नियंत्रित रहती है।



2500 रुपये प्रति किलो वाले आमों की खेती

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उनके बाग में आम की कई खास किस्में हैं, जिनमें चर्चित ‘मियाज़ाकी’ जैसी प्रीमियम वैरायटी भी शामिल है। हालांकि वह बताते हैं कि इसे उन्होंने बांग्लादेश से मंगाया। उनके पास लगभग 70 पेड़ इस किस्म के हैं। वह बताते हैं कि हर फल महंगा नहीं होता, लेकिन जो 5-10% फल आकार, रंग और मिठास में बेहतरीन होते हैं, वही प्रीमियम दाम पर बिकते हैं। उनके कुछ आम 2500 रुपये प्रति किलो तक बिकते हैं। सबसे खास बात यह है कि वह अपनी उपज सीधे चुनिंदा ग्राहकों तक पहुंचाते हैं। कोई बिचौलिया नहीं, कोई मंडी पर निर्भरता नहीं। उनका कहना है, “खेती सिर्फ उगाने का नाम नहीं, सही ग्राहक तक पहुंचाने का नाम भी है। जंगल में मोर नाचा किसने देखा?”



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फहद बताते हैं, "देखिए खेती तो मुझसे बेहतर बहुत सारे लोग करते होंगे। मगर मेरा जो स्ट्रेंथ है वो है पूरी तरीके से एक बैलेंस्ड अप्रोच लेकर चलना। खेती में प्रोड्यूस करना बहुत इंपॉर्टेंट है मगर आप उसे सही व्यक्ति तक की ले जा नहीं पा रहे हैं और अगर सही उपभोक्ता आपके पास नहीं है तो आपका सारा किया कराया जो है वो बेकार है।" फहद मानते हैं कि भारतीय आम और जैविक उत्पादों में निर्यात की अपार संभावना है, लेकिन केमिकल उपयोग, असमान गुणवत्ता और मानकीकरण की कमी बड़ी बाधा है। उनका लक्ष्य है कि भारतीय आम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ब्रांड की तरह स्थापित किया जाए।



जैविक और भरोसेमंद उत्पादन

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फहद की खेती का दूसरा बड़ा आधार है जैविक और भरोसेमंद उत्पादन। हजारा स्थित खेतों में वह खरीफ, रबी और जायद तीनों मौसम की फसलें उगाते हैं और हर साल फसल चयन में बदलाव कर ‘फाइन ट्यूनिंग’ करते हैं। मटर, धनिया, लहसुन, आलू जैसी फसलें बिना रासायनिक खाद और कीटनाशकों के उगाई जाती हैं। उनका कहना है कि ऑर्गेनिक खेती में सबसे बड़ा सवाल ‘भरोसे’ का होता है, इसलिए वह पहले अपने परिवार और रिश्तेदारों को वही उपज खिलाते हैं जो बाजार में बेचते हैं।



आलू और स्ट्रॉबेरी की खेती में तकनीक से दोस्ती

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उनके खेतों में ड्रिप सिंचाई, नमी मापने वाले सेंसर और सीमित पानी के इस्तेमाल जैसी आधुनिक तकनीक अपनाई गई है। ड्रिप लाइनों से नियंत्रित सिंचाई और नमी मापने के लिए सेंसर का इस्तेमाल उनकी खेती को तकनीकी रूप से उन्नत बनाता है। आलू की खेती के बारे में फहद बताते हैं कि आलू 45 इंच चौड़े बेड पर उगाए जाते हैं, जिससे उत्पादन बेहतर और साफ-सुथरा रहता है। सही तकनीक का इस्तेमाल किया जाए तो आलू 120 दिन में तैयार होते हैं और एक पौधे से लगभग एक किलो तक उत्पादन मिल जाता है।



साथ ही स्ट्रॉबेरी की खेती में उन्होंने खुद का डिजाइन किया स्टैंड बनाया है, ताकि फल जमीन को न छुए और खराब न हो। वह प्लास्टिक मल्च की जगह धान की पराली का इस्तेमाल करते हैं और जरूरत के हिसाब से मिनटों में पानी देते हैं। शुरुआती फलों को तोड़कर वह पौधे के पत्तों के विकास पर जोर देते हैं ताकि मिठास बेहतर हो। उनका कहना है कि “खेती में पानी और पोषण का संतुलन ही असली विज्ञान है।”



बदलती तस्वीर का किसान

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फहद फारूकी का मानना है कि भारतीय आम में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन केमिकल उपयोग, गुणवत्ता में असमानता और मानकीकरण की कमी के कारण निर्यात में देश पीछे है। वह अपने स्तर पर आकार, गुणवत्ता और स्वाद को एक मानक पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। डिजाइन की पृष्ठभूमि से आए इस किसान ने यह दिखाया है कि खेती केवल परंपरा नहीं, बल्कि नवाचार, प्रबंधन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का क्षेत्र भी है। फहद फारूकी की कहानी सिर्फ एक किसान की सफलता नहीं, बल्कि सोच में बदलाव की कहानी है। उन्होंने दिखाया कि खेती में पढ़ाई, तकनीक, डिजाइन और मार्केटिंग का मेल हो तो गांव में रहकर भी ग्लोबल स्तर पर काम किया जा सकता है। आज उनका खेत सिर्फ फसल नहीं उगाता, बल्कि एक संदेश भी देता है कि किसान होना मजबूरी नहीं, एक आधुनिक और सम्मानजनक पेशा है।

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