Success Story : राजस्थान की तपती ज़मीन में आंवले की खेती, चार एकड़ से खड़ा किया करोड़ों का कारोबार
राजस्थान की मिट्टी में अक्सर लोग पानी की कमी और सूखे की बात करते हैं। लेकिन इसी धरती पर एक किसान ने यह साबित कर दिया कि अगर सोच बड़ी हो, तो चार हेक्टेयर जमीन भी करोड़ों का कारोबार खड़ा कर सकती है। यह कहानी है 76 वर्षीय प्रगतिशील किसान कैलाश चौधरी की, जिन्होंने कच्चे आंवले को ₹15 किलो से उठाकर प्रोसेसिंग के जरिए ₹250 किलो तक बेचने का सफर तय किया।
असफलता से मिली दिशा
कैलाश चौधरी बताते हैं कि शुरुआत में जब उनका आंवला हरा-का-हरा बाजार में नहीं बिका, तो निराशा हुई। लेकिन उन्होंने हार मानना नहीं सीखा था। एक बार वे प्रतापगढ़ गए, जहां कुछ महिलाएं साधारण चूल्हे पर आंवले से लड्डू, कैंडी, मुरब्बा और अचार बना रही थीं। वहीं से उन्हें रास्ता मिला “फल बेचने से ज्यादा फायदा उसकी प्रोसेसिंग में है।” उन्होंने छोटे स्तर से आंवले की कैंडी और मुरब्बा बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे टेक्नोलॉजी जोड़ी, फूड ग्रेड ड्रम में स्टोरेज शुरू किया और आज उनके पास 400 से ज्यादा ड्रम की क्षमता है, जिसमें लगभग 1000 क्विंटल माल स्टॉक किया जा सकता है।
सघन बागवानी से बढ़ाया उत्पादन
पहले आंवले के पेड़ 20×20 फुट की दूरी पर लगाए जाते थे। लेकिन कैलाश जी ने समय के साथ बदलाव किया और 15×15 फुट की सघन बागवानी अपनाई। इससे पौधों की संख्या बढ़ी और उत्पादन भी। आज उनके पास 1100 आंवले के पेड़, करीब 200 बेलपत्र के पेड़ और पुराने जामुन के पेड़ हैं। चार हेक्टेयर के बगीचे से औसतन 1000 से 1100 क्विंटल आंवला हर साल उत्पादन होता है। एक पेड़ से लगभग एक क्विंटल तक फल मिल जाता है और एक बार लगाया गया पेड़ 40-45 साल तक उत्पादन देता है।
₹15 से ₹250 तक का सफर
कैलाश जी का सीधा सिद्धांत है “कच्चा माल सस्ता बिकता है, लेकिन प्रोसेसिंग से उसकी कीमत कई गुना बढ़ जाती है।” जहाँ आंवला ₹15-20 किलो बिकता है, वहीं उससे बनी कैंडी ₹250 किलो तक जाती है। वे आंवले से 8 से 10 तरह के उत्पाद बनाते हैं। उनके उत्पाद इंग्लैंड, अमेरिका, यूरोप, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया तक निर्यात हो चुके हैं। अच्छी पैकिंग, क्वालिटी और भरोसे के कारण विदेशों में उनके डिस्ट्रीब्यूटर बने।
- अलग-अलग फ्लेवर की कैंडी
- तीन तरह के मुरब्बे
- जूस और मिक्स जूस
- अचार और अन्य हेल्थ प्रोडक्ट
पहले पोषण, फिर दवाई
कैलाश चौधरी का मानना है कि पेड़ भी बच्चों की तरह होते हैं। “जो स्वस्थ होगा, उसे बीमारी नहीं लगेगी। जो कमजोर होगा, उसे दस बीमारियाँ घेर लेंगी।” वे साल में दो बार कंपोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट खाद देते हैं। फ्लड इरिगेशन की जगह माइक्रो स्प्रिंकलर सिस्टम अपनाया है, जिससे पानी की बचत होती है और पौधे स्वस्थ रहते हैं। उनका कहना है कि अगर समय पर पोषण दिया जाए तो दवाइयों की जरूरत बहुत कम पड़ती है।
परिवार बना ताकत
10वीं पास कैलाश चौधरी ने 1967 में पढ़ाई छोड़ी और खेती से जुड़ गए। आज वे खुद को “रिटायर” बताते हैं, लेकिन असल में खेती से कोई किसान रिटायर नहीं होता। उनके दो बेटे और दो बहुएं कारोबार संभाल रहे हैं। तीसरी पीढ़ी पढ़ाई के साथ आधुनिक तकनीक जोड़ने की तैयारी में है।
रोजगार और प्रेरणा
उनके बगीचे और प्रोसेसिंग यूनिट में साल भर काम चलता है, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है। प्रदेश भर से किसान उनके यहां प्रशिक्षण लेने आते हैं। वे साफ कहते हैं , “थोड़ा-बहुत पढ़ा-लिखा बेरोजगार युवा अगर मेहनत करे तो खेती से बेहतर कोई व्यवसाय नहीं।”
कैलाश चौधरी ने खेती से जुड़ी कुछ जरूरी बातें बताई-
फसल बेचने से ज्यादा मुनाफा प्रोसेसिंग में है।
सघन बागवानी से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
गुणवत्ता और भरोसा बाजार की सबसे बड़ी पूंजी है।
खेती में सीखने की ललक जीवन भर रखनी चाहिए।
अमृत फल की ताकत
आंवले को आयुर्वेद में ‘अमृत फल’ कहा गया है। कैलाश चौधरी ने इसी अमृत फल को पहचान कर उसे ब्रांड बनाया। आज उनका नाम और काम दोनों दूर-दूर तक पहचाने जाते हैं। कैलाश चौधरी की कहानी बताती है कि जमीन छोटी हो सकती है, लेकिन सोच बड़ी होनी चाहिए। सही योजना, मेहनत और प्रोसेसिंग के जरिए किसान भी करोड़ों का कारोबार खड़ा कर सकता है। यह सिर्फ एक किसान की सफलता नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की संभावनाओं की कहानी है।