Harish Rana Case: "सबको माफ़ करते हुए...अब जाओ", गम़गीन आखों से परिवार ने दी हरीश को आखिरी विदाई

Preeti Nahar | Mar 17, 2026, 11:54 IST
Image credit : Gaon Connection Creatives
Harish Rana Updates:सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद हरीश राणा को एम्स में भर्ती किया गया है और अब उनकी गरिमामयी मृत्यु (Dignified Death) के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसके लिए मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया है। 5 सदस्यीय मेडिकल टीम बनाई गई है। टीम में शामिल एक्सपर्ट में पैलिएटिव केयर, न्यूरोलॉजी, एनेस्थिसिया और अन्य विभागों के वरिष्ठ डॉक्टर हैं।
हरीश राणा की कहानी: 13 साल की बेबसी और उम्मीद

गाजियाबाद के हरीश राणा की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस दर्द की कहानी है जिसे उनका परिवार पिछले 13 साल से झेल रहा था। एक हादसे के बाद कोमा में गए हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। इलाज, उम्मीद और इंतजार, सब कुछ करने के बाद आखिरकार परिवार ने इच्छामृत्यु की माँग की। इस मामले ने पूरे देश में ‘गरिमा के साथ जीवन और मृत्यु’ पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है।



13 साल की बेबसी और उम्मीद

ये कहानी है कि 32 साल के गाजियाबाद ( Ghaziabad ) के एक लड़के की जिसका नाम है हरीश राणा ( Harish Rana News), जो चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग का छात्र था। दिखने में बेहद स्मार्ट और खुशनुमा मिजाज, जो पढ़ने में बेहद होशियार था, जो भविष्य में कुछ बड़ा करना चाहता है। लेकिन अचानक उसके साथ कुछ ऐसा हुआ कि उसकी हंसली खेलती जिंदगी पलभर में उजड़ गई.. साल 2013 में गंभीर ब्रेन इंजरी के कारण वे कोमा में चले गए और ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ में पहुँच गए। पिछले 13 सालों से वे न बोल पा रहे थे, न खुद से कुछ कर पा रहे थे। उनका पूरा जीवन मशीनों और मेडिकल सपोर्ट पर निर्भर हो गया था। परिवार ने देश के बड़े अस्पतालों में इलाज कराया, लाखों रुपये खर्च किए, लेकिन डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि अब उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। ऐसे में परिवार के सामने सबसे मुश्किल सवाल था—क्या सिर्फ शरीर को जिंदा रखना ही जीवन है? आख़िरकार परिवार ने गम़गीन आखों से हरीश को विदाई दी और कहा-



"सबको माफ़ करते हुए...अब जाओ"



इच्छामृत्यु क्या है- आसान भाषा में समझिए

इच्छामृत्यु, जिसे अंग्रेजी में Euthanasia कहा जाता है, का मतलब है किसी ऐसे व्यक्ति को जीवन से मुक्ति देना जो लाइलाज बीमारी या कोमा जैसी स्थिति में हो और जिसके ठीक होने की कोई उम्मीद न हो। इसके दो प्रकार होते हैं एक्टिव और पैसिव। एक्टिव इच्छामृत्यु में मरीज को दवा या इंजेक्शन देकर मौत दी जाती है, जो भारत में पूरी तरह गैरकानूनी है। वहीं पैसिव इच्छामृत्यु में मरीज का इलाज या लाइफ सपोर्ट हटा दिया जाता है, जिससे उसकी प्राकृतिक मृत्यु हो जाती है। हरीश राणा के मामले में पैसिव इच्छामृत्यु की बात सामने आई।



इच्छामृत्यु यानी यूथेनेशिया को लेकर अक्सर ऐसे मामलों में बहस तेज हो जाती है। आम तौर पर इसमें व्यक्ति खुद अपने जीवन को समाप्त करने की इच्छा जाहिर करता है। लेकिन भारत में एक्टिव यूथिनिसिया यानी इंजेक्शन देकर जीवन खत्म करना गैरकानूनी है। यही वजह है कि देश में इसे अनुमति नहीं दी गई है, क्योंकि इसके दुरुपयोग की आशंका भी बनी रहती है। हालांकि दुनिया के कुछ देशों जैसे नीदरलैंड, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों में एक्टिव यूथिनिसिया को कानूनी मान्यता दी गई है। वहाँ तय कानूनी प्रक्रिया के तहत मरीज को इंजेक्शन देकर मृत्यु दी जाती है। भारत में इस मुद्दे पर सबसे चर्चित मामला मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग का रहा। वह वर्षों तक वेजिटेटिव स्टेट में रहीं, यानी उनका ब्रेन काम नहीं कर रहा था, लेकिन शरीर के अन्य अंग काम कर रहे थे। इस केस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सख्त शर्तों के साथ पैसिव यूथिनिसिया की अनुमति दी।



हरीश के केस में AIIMS का क्या कहना?

दरअसल हरीश की ऐसी हालत पिछले 13 साल से है। उसे नर्सिंग केयर भी मिल रही है, उकसे सारे अंग काम भी कर रहे हैं, यूरिन भी पास कर रहा है, लेकिन वह न्यूट्रिशन सपोर्ट की वजह से जिंदा है। चूंकि हरीश वेंटिलेटर सपोर्ट पर नहीं है, इसलिए इसमें ज्यादा समय लग सकता है। यही वजह है कि एम्स की तरफ से अभी स्पष्ट तौर पर कुछ कहा नहीं गया है। अधिकारिक तौर पर सिर्फ इतना ही कहा हया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार प्रोसीजर अपनाया जा रहा है।



भारत में इच्छामृत्यु की स्थिति- कानून क्या कहता है?

भारत में इच्छामृत्यु पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से लागू नहीं है, बल्कि इसे सख्त नियमों के तहत सीमित रूप में अनुमति दी गई है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘राइट टू डाई विद डिग्निटी’ यानी गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी थी। इसके तहत पैसिव इच्छामृत्यु को कुछ शर्तों के साथ मंजूरी दी गई, जैसे मेडिकल बोर्ड की राय, परिवार की सहमति और कानूनी प्रक्रिया का पालन। हालांकि, एक्टिव इच्छामृत्यु आज भी भारत में अवैध है।



हाई कोर्ट का रुख, याचिका ख़ारिज क्यों हुई?

हरीश राणा के परिवार ने सबसे पहले दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन वहाँ से उन्हें राहत नहीं मिली। हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि हरीश वेंटिलेटर पर नहीं हैं और उनकी स्थिति को ‘टर्मिनल बीमारी’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि फीडिंग ट्यूब हटाना सीधे तौर पर मौत देने जैसा होगा, जो कानून के दायरे में नहीं आता।



सुप्रीम कोर्ट का फैसला, गरिमा के साथ मौत की इजाजत

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ से बड़ा और ऐतिहासिक फैसला आया। सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह प्रक्रिया मेडिकल नियमों और पेलिएटिव केयर के तहत पूरी की जाए, ताकि मरीज को किसी तरह की पीड़ा न हो। अदालत ने यह भी कहा कि जीवन का अधिकार सिर्फ जीने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी शामिल है। यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया।



क्यों अहम है यह मामला, समाज और कानून पर असर?

हरीश राणा का मामला सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि समाज के लिए एक बड़ा सवाल भी है। यह केस उन हजारों परिवारों की स्थिति को सामने लाता है, जो लंबे समय तक कोमा या गंभीर बीमारी से जूझ रहे अपने प्रियजनों को देखकर मानसिक, आर्थिक और भावनात्मक दबाव झेलते हैं। इस फैसले ने इच्छामृत्यु पर नई बहस को जन्म दिया है, क्या जीवन की गुणवत्ता ज्यादा महत्वपूर्ण है या सिर्फ उसका अस्तित्व? आखिरकार, हरीश राणा की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जीवन और मृत्यु के फैसले कितने जटिल और संवेदनशील होते हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कानून और संवेदना के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है। अब जरूरत इस बात की है कि देश में इच्छामृत्यु को लेकर स्पष्ट और व्यावहारिक नीति बने, ताकि ऐसे मामलों में परिवारों को लंबी और कठिन कानूनी लड़ाई न लड़नी पड़े।

Tags:
  • harish rana
  • court
  • sachin gupta
  • supreme court
  • ani
  • Harish Rana Euthanasia Case
  • हरीश राणा इच्छामृत्यु
  • Right to Die with Dignity India
  • गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार
  • Passive Euthanasia Supreme Court