क्या भारत की कृषि छोटे खेतों के बावजूद उत्पादन बढ़ा सकती है?

Gaon Connection | Mar 28, 2026, 11:32 IST
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भारत की खेती एक अनोखे दौर से गुजर रही है। खेत छोटे हो रहे हैं, पर अनाज और बागवानी उत्पादन बढ़ रहा है। सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि उन्नत बीज, बेहतर सिंचाई और सरकारी योजनाओं से उत्पादन बढ़ा है। जानिए, जमीन कम होने के बाद भी उत्पादन बढ़ने के पीछे क्या कुछ बदलाव हैं जो खेती में किए गए है?
 बागवानी उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज

भारत में कृषि क्षेत्र एक दिलचस्प लेकिन जटिल दौर से गुजर रहा है। एक तरफ खेती योग्य जमीन लगातार छोटे-छोटे हिस्सों में बंट रही है, तो दूसरी तरफ खाद्यान्न और बागवानी उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। यह विरोधाभास न सिर्फ नीतिगत बदलावों को दर्शाता है, बल्कि खेती के तरीके और प्राथमिकताओं में आए बदलाव की भी ओर इशारा करता है।



छोटे होते खेत: संरचनात्मक चुनौती

कृषि एवं किसान कल्‍याण मंत्रालय की तरफ से बताए गए आंकड़ों के अनुसार देश में औसत जोत का आकार 2010-11 के 1.15 हेक्टेयर से घटकर 2015-16 में 1.08 हेक्टेयर रह गया। यह गिरावट बताती है कि खेती की जमीन लगातार विभाजित हो रही है। छोटे और सीमांत किसानों की संख्या बढ़ने से खेती की लागत, संसाधनों की उपलब्धता और मशीनीकरण जैसी चुनौतियाँ और जटिल हो जाती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि छोटी जोत पर खेती करना आर्थिक रूप से उतना लाभकारी नहीं होता, जब तक कि उत्पादन प्रणाली में बदलाव न किया जाए।



उत्पादन में वृद्धि: आँकड़ों की तस्वीर

इन चुनौतियों के बावजूद उत्पादन के आंकड़े अलग कहानी बताते हैं। 2013-14 में जहाँ कुल खाद्यान्न उत्पादन 265 मिलियन टन था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 357.7 मिलियन टन हो गया। इसी तरह बागवानी उत्पादन भी 277.4 मिलियन टन से बढ़कर 369.1 मिलियन टन तक पहुँच गया है। यह वृद्धि संकेत देती है कि उत्पादन बढ़ाने के लिए केवल भूमि विस्तार पर निर्भरता कम हुई है।



बदलाव के कारण

उत्पादन में वृद्धि के पीछे कई कारक एक साथ काम कर रहे हैं। फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने वाली नीतियों ने किसानों को पारंपरिक अनाज फसलों से हटकर दालों, तिलहनों और बागवानी फसलों की ओर रुख करने के लिए प्रेरित किया है।



इसके साथ ही उन्नत बीज, सिंचाई के बेहतर साधन और उर्वरक प्रबंधन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा विकसित नई फसल किस्मों ने भी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में भूमिका निभाई है, खासकर वे किस्में जो जलवायु और रोगों के प्रति अधिक सहनशील हैं।



योजनाओं का दायरा और सीमाएं

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनका उद्देश्य उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ खेती को टिकाऊ बनाना है। मृदा स्वास्थ्य, जैविक खेती, वर्षा आधारित कृषि और तेलहन-दलहन मिशन जैसी पहलें इसी दिशा में काम कर रही हैं। हालांकि, जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का प्रभाव सभी क्षेत्रों में एक जैसा नहीं है। कई राज्यों में जानकारी की कमी, संसाधनों की सीमित पहुंच और क्रियान्वयन में देरी जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं।



एफपीओ: समाधान या आंशिक राहत?

छोटे किसानों को संगठित करने के लिए किसान उत्पादक संगठन (FPO) मॉडल को बढ़ावा दिया गया है। सरकार के अनुसार देशभर में 10,000 एफपीओ बनाए गए हैं, जिन्हें वित्तीय और संस्थागत सहायता दी जा रही है। यह मॉडल किसानों को सामूहिक खरीद और बिक्री का अवसर देता है, जिससे लागत कम करने और बेहतर कीमत पाने में मदद मिल सकती है। लेकिन एफपीओ की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उन्हें बाजार, प्रबंधन और निरंतर समर्थन कितना मिल पाता है।



संतुलन की जरूरत

कुल मिलाकर, घटती जोत के बावजूद बढ़ता उत्पादन भारतीय कृषि की क्षमता को दिखाता है, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियां भी बनी हुई हैं। छोटे खेत, बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन और बाजार की अनिश्चितता जैसे मुद्दे अभी भी किसानों के सामने हैं। ऐसे में आगे की नीतियों का फोकस केवल उत्पादन बढ़ाने से आगे बढ़कर किसानों की आय, संसाधनों तक पहुंच और जोखिम प्रबंधन पर होना जरूरी होगा।

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