AI की दौड़ में 86% बुजुर्ग Digital Literacy से वंचित, Online अपॉइंटमेंट में आ रही दिक्कत, जानिए कैसे करें उनकी मदद
भारत की राजधानी दिल्ली में AI Summit 2026 चल रहा है। दुनिया भर की नज़र भारत पर है AI की दुनिया में भारत के इस कदम को लेकर। जब दुनिया AI की तेज़ रफ्तार पर सवार है, बड़े-बड़े AI Summit में भविष्य की बात हो रही है और तकनीक को विकास का इंजन बताया जा रहा है, उसी वक्त दिल्ली में हुई एक सिटी-लेवल सर्वे ने बताया है कि 86% बुजुर्गों को कभी डिजिटल साक्षरता की ट्रनिंग नहीं मिली, यानी करनीक में आगे बढ़ती दुनिया में समाज का एक वर्ग कहीं पीछे छूट रहा है।
एक तरफ़ आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस स्वास्थ्य, शासन और सेवाओं को आसान बनाने का वादा कर रहा है, तो दूसरी तरफ़ बुज़ुर्ग ऑनलाइन डॉक्टर अपॉइंटमेंट, हेल्थ रिकॉर्ड और सरकारी योजनाओं तक पहुँच से वंचित हैं। यह विरोधाभास सवाल उठाता है—क्या AI की दौड़ में हम इंसान को, ख़ासकर बुज़ुर्गों को, साथ लेकर चल पा रहे हैं?
Digital दौर में बुज़ुर्ग अकेले
दिल्ली में एक नए सर्वे से पता चला है कि बुज़ुर्गों के लिए इलाज तक पहुँचना मुश्किल हो रहा है और इसकी सबसे बड़ी वजह डिजिटल दुनिया से दूरी है। 'हमारी दिल्ली एल्डर फ्रेंडली' सर्वे के अनुसार, 86% बुज़ुर्गों को कभी डिजिटल साक्षरता की ट्रेनिंग नहीं मिली, जिससे वे ऑनलाइन अपॉइंटमेंट, हेल्थ रिकॉर्ड और सरकारी योजनाओं जैसी ज़रूरी चीज़ों से वंचित रह जाते हैं। यह सर्वे KG Community Development Council (KGCDC) और Wellness Health & You (WHY) ने मिलकर किया, जिसमें 600 बुज़ुर्गों से बात की गई।
बुजुर्गों के पास नहीं Digital Training
यह सर्वे दिल्ली के सिद्धार्थ एक्सटेंशन, लाजपत नगर-1 और सुखदेव विहार जैसे इलाकों में रहने वाले बुज़ुर्गों पर केंद्रित था। सर्वे के नतीजे बताते हैं कि भले ही बुज़ुर्गों के पास स्मार्टफोन और इंटरनेट हो, लेकिन उसे इस्तेमाल करने की जानकारी न होने के कारण वे कई सुविधाओं से दूर हैं। यह डिजिटल खाई उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं से सीधे तौर पर अलग कर रही है। सर्वे में यह भी सामने आया कि लगभग 45% बुज़ुर्ग हाई ब्लड प्रेशर और 11% डायबिटीज़ जैसी बीमारियों से पीड़ित हैं। इसके अलावा, कई बुज़ुर्गों को चलने-फिरने में दिक्कत होती है, उन्हें अपनी बीमारियों की जानकारी कम होती है, पोषण पर सही सलाह नहीं मिलती और वे डिप्रेशन व अकेलेपन का शिकार हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों तक पहुँचना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती है।
इलाज से वंचित हो रहे बुज़ुर्ग
जब इलाज से जुड़ी ज़्यादातर चीज़ें ऑनलाइन हो गई हैं, जैसे डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लेना, अपनी मेडिकल रिपोर्ट देखना या दवाओं की जानकारी पाना, तब मोबाइल चलाना न आने का मतलब है कि वे सीधे तौर पर इलाज से वंचित रह जाते हैं। इसी वजह से, शहर में रहते हुए भी कई बुज़ुर्ग खुद को अकेला और असहाय महसूस करते हैं।
कैसे करें बुज़ुर्गों की मदद
इस समस्या का हल सिर्फ़ सरकार पर छोड़ना काफी नहीं है। सर्वे में यह भी सुझाव दिया गया है कि समुदाय-आधारित पहलें, जैसे सीनियर एसोसिएशन, बडी ग्रुप और युवा स्वयंसेवक, बुज़ुर्गों की मदद कर सकते हैं। कुछ जगहों पर सामुदायिक ओपीडी, डिजिटल एल्डर केयर कार्ड और सेवा प्रदाताओं से छूट जैसी पहलें शुरू की गई हैं। इनका मकसद बुज़ुर्गों को सिर्फ़ 'लाभार्थी' बनाने के बजाय, उन्हें अपने स्वास्थ्य के बारे में सक्रिय रूप से निर्णय लेने में मदद करना है।
यह स्थिति सिर्फ़ दिल्ली की नहीं, बल्कि पूरे भारत के शहरों में बूढ़े हो रहे लोगों की कहानी है। जहाँ रास्ते पास हैं, पर इलाज दूर; इंटरनेट तेज़ है, पर समझ की कमी है। अगर हम डिजिटल साक्षरता को बुज़ुर्गों की एक बुनियादी ज़रूरत मानें, जैसे दवा, डॉक्टर और देखभाल, तो हालात बदल सकते हैं। सवाल यह है कि क्या हम अपने शहरों को बुज़ुर्गों के लिए बेहतर बनाने के लिए तकनीक को इंसानों के लिए आसान बनाने को तैयार हैं?