भारत-भूटान के बीच सीमा पार नदियों पर सहयोग तेज, बाढ़ प्रबंधन और जलविद्युत परियोजनाओं की समीक्षा
India Bhutan River Cooperation: भारत और भूटान ने सीमा पार नदियों पर सहयोग को और मजबूत करने का फैसला किया है। 24 से 27 फरवरी 2026 तक भूटान की यात्रा पर गए भारत के जल शक्ति मंत्रालय के सचिव श्री वी.एल. कंथा राव के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल ने बाढ़ प्रबंधन, जलविद्युत परियोजनाओं और डेटा साझाकरण पर भूटान के अधिकारियों के साथ मिलकर काम करने की योजना बनाई है। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच साझा नदियों के बेहतर प्रबंधन और बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करना है।
क्यों जरूरी था यह दौरा?
भूटान से निकलने वाली नदियां असम और पश्चिम बंगाल में बाढ़ का कारण बनती हैं। मानसून के दौरान इन नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है। इस कारण से निचले इलाकों में बाढ़ दैसी स्थिति बन जाती है जिससे जान-माल का भारी नुकसान होता है। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) और चरम मौसम की घटनाओं का खतरा भी बढ़ गया है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए दोनों देशों के बीच समन्वय और डेटा साझाकरण को मजबूत करना बहुत जरूरी हो गया था।
सचिव स्तरीय बैठक में क्या हुई चर्चा?
सचिव स्तरीय बैठक में बाढ़ प्रबंधन और बाढ़ पूर्वानुमान में मौजूदा सहयोग तंत्र की समीक्षा की गई। दोनों देशों के अधिकारियों ने भूटान में सीमा पार नदियों पर जल-मौसम विज्ञान अवलोकन नेटवर्क को मजबूत और आधुनिक बनाने पर जोर दिया। साथ ही, हाइड्रोलॉजिकल और बाढ़ के पूर्वानुमान से जुड़े डेटा के आदान-प्रदान की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने पर भी सहमति बनी। क्षमता निर्माण, तकनीकी सहयोग और विशेषज्ञता के आदान-प्रदान को बढ़ाने पर भी चर्चा हुई।
भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने भूटान में निर्माणाधीन पुनात्सांगचू-I और पुनात्सांगचू-II जलविद्युत परियोजनाओं का भी निरीक्षण किया। इन परियोजनाओं का लक्ष्य स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ाना और दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को मजबूत करना है। ये परियोजनाएं भूटान की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं और भारत को स्वच्छ ऊर्जा प्रदान करती हैं। प्रतिनिधिमंडल ने थिम्फू स्थित राष्ट्रीय जल विज्ञान एवं मौसम विज्ञान केंद्र (NCHM), चामगांग का जल शोधन संयंत्र और वांगडू फोड्रंग जोंग के पास बाढ़ निगरानी केंद्र का भी दौरा किया।
पहले क्या नुकसान होते थे?
पहले, असम और पश्चिम बंगाल में हर साल बाढ़ से हजारों हेक्टेयर फसल बर्बाद हो जाती थी। सड़कें, पुल और घर क्षतिग्रस्त हो जाते थे। लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता था। यदि अपस्ट्रीम क्षेत्रों से समय पर जल प्रवाह और वर्षा संबंधी डेटा साझा हो, तो निचले क्षेत्रों में पहले से चेतावनी जारी की जा सकती है और नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसी तरह, ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ की घटनाएं भी बड़ी तबाही ला सकती हैं। समय रहते निगरानी और सूचना आदान-प्रदान से इस खतरे को कम किया जा सकता है।
आगे की योजना क्या है?
भविष्य में, भारत और भूटान साझा नदी बेसिनों में जल संसाधन प्रबंधन को और मजबूत करेंगे। इसमें आधुनिक उपकरणों की स्थापना, डेटा साझाकरण तंत्र को डिजिटल और रियल टाइम बनाना, संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर संयुक्त अध्ययन शामिल हैं। भारत ने जल संसाधन प्रबंधन में सहयोग को और गहरा करने के लिए निरंतर समर्थन का आश्वासन दिया है। यह पहल न केवल बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करेगी, बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास और रणनीतिक साझेदारी को भी मजबूत करेगी। यह दौरा साझा जल संसाधनों के सतत और पारस्परिक रूप से लाभकारी प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।