Traditional Crops: क्या भारत की पोषण सुरक्षा और टिकाऊ खेती का भविष्य इन 6 पारंपरिक फसलों में छिपा है?
क्यों जरूरी है यह पहल: भारत में जलवायु परिवर्तन, कुपोषण और टिकाऊ खेती (सस्टेनेबिलिटी) जैसी चुनौतियां तेजी से बढ़ रही हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए अब पारंपरिक और कम उपयोग में आने वाली फसलों की ओर ध्यान दिया जा रहा है। एक नई पहल के तहत देश में छह ऐसी फसलों की पहचान की गई है, जिन्हें मुख्यधारा में लाकर पोषण सुरक्षा, पर्यावरण संतुलन और किसानों की आय बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। यह प्रयास वैज्ञानिकों, किसानों और नीति निर्माताओं के सहयोग से आगे बढ़ाया जा रहा है। इसकी जानकारी M. S. Swaminathan Research Foundation ने दी है।
कौन-कौन सी हैं ये छह फसलें?
इस पहल में जिन छह फसलों को शामिल किया गया है, उनमें हॉर्स ग्राम (कुल्थी), करोंदा, याम (रतालू), कोदो मिलेट, क्विनोआ और विंग्ड बीन शामिल हैं। ये सभी फसलें पारंपरिक रूप से उगाई जाती रही हैं, लेकिन समय के साथ मुख्यधारा की खेती से बाहर हो गईं। अब इन्हें “ऑपर्च्युनिटी क्रॉप्स” यानी अवसर वाली फसलें माना जा रहा है, क्योंकि इनमें वर्तमान चुनौतियों से निपटने की बड़ी क्षमता है।
पोषण और जलवायु के लिहाज से अहम
ये फसलें न केवल पोषण से भरपूर हैं बल्कि जलवायु के अनुकूल भी हैं। उदाहरण के तौर पर, हॉर्स ग्राम मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ प्रोटीन का अच्छा स्रोत है, जबकि करोंदा सूखा सहन करने वाली और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स से भरपूर फसल है। कोदो मिलेट को मधुमेह के रोगियों के लिए फायदेमंद माना जाता है और इसमें फाइबर की मात्रा अधिक होती है। क्विनोआ उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन और औषधीय गुणों के लिए जानी जाती है, वहीं विंग्ड बीन मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाकर खेती को अधिक टिकाऊ बनाती है।
किसानों और खाद्य सुरक्षा के लिए लाभ
इन फसलों का एक बड़ा फायदा यह है कि ये कठिन परिस्थितियों में भी अच्छी पैदावार दे सकती हैं, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को फायदा होगा। याम जैसी फसलें खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, खासकर उन इलाकों में जहाँ सूखा या संसाधनों की कमी होती है। इन फसलों को बढ़ावा देने से किसानों की आय के नए स्रोत खुल सकते हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।
मुख्यधारा में लाने की रणनीति
इस पहल के तहत इन फसलों को बीज से लेकर बाजार तक पूरी वैल्यू चेन में शामिल करने की योजना बनाई जा रही है। इसका मतलब है कि इनके उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन और उपभोग-सभी चरणों पर काम किया जाएगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि अब इन फसलों के पोषण और औषधीय महत्व को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, जिससे इन्हें दोबारा लोकप्रिय बनाया जा सकता है।
आगे की राह
इन छह फसलों को एक राष्ट्रीय स्तर के संवाद के जरिए चुना गया है, जिसमें किसानों, वैज्ञानिकों, उद्यमियों और नीति निर्माताओं ने भाग लिया। अब इन फसलों से जुड़े चुनौतियों का आकलन किया जाएगा और उनके समाधान विकसित किए जाएंगे। यदि यह पहल सफल होती है, तो यह न केवल जलवायु संकट से निपटने में मदद करेगी, बल्कि देश में पोषण सुरक्षा और टिकाऊ कृषि को भी नई दिशा देगी।