भारत का समुद्री खाद्य निर्यात तेज़ रफ्तार पर, डिजिटल तकनीक से मजबूत हो रही वैश्विक पहचान
भारत का समुद्री खाद्य निर्यात अब सिर्फ मछली बेचने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक आधुनिक, तकनीक आधारित और वैश्विक मानकों पर खरा उतरने वाला सेक्टर बनता जा रहा है। इसी दिशा में आयोजित सीफूड एक्सपोर्ट प्रमोशन पर गोलमेज सम्मेलन में नीति, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी से जुड़े कई अहम पहलुओं पर चर्चा हुई।
इस सम्मेलन एशिया, अफ्रीका, यूरोप, उत्तरी अमेरिका, ओशेनिया और लैटिन अमेरिका समेत 83 देशों के राजदूत, उच्चायुक्त और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए।
सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में मत्स्य विभाग के केंद्रीय सचिव डॉ. अभिलाक्ष लेखी ने कहा कि भारत के समुद्री खाद्य निर्यात में तेज़ बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। इसका बड़ा कारण पूरी वैल्यू चेन में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल, बेहतर रिकॉर्ड सिस्टम, उत्पादन की औपचारिक व्यवस्था और ट्रैकिंग सिस्टम का मजबूत होना है।
उन्होंने बताया कि अब भारत का सीफूड सेक्टर केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि गुणवत्ता पैकेजिंग, अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप मानक और मजबूत ट्रेसिबिलिटी सिस्टम के कारण भारत एक भरोसेमंद वैश्विक निर्यातक के रूप में उभर रहा है।
भारत आज दुनिया में जलीय कृषि उत्पादन के मामले में दूसरा सबसे बड़ा देश है और मछली उत्पादन में अग्रणी देशों में शामिल है। एक समय यह क्षेत्र केवल आजीविका आधारित गतिविधि था, लेकिन अब यह एक मजबूत निर्यात उद्योग बन चुका है। इसमें मछली पालन, चारा उत्पादन, प्रोसेसिंग, कोल्ड चेन, परिवहन, भंडारण और मूल्य संवर्धन जैसे कई स्तर शामिल हो चुके हैं। इसका सीधा फायदा लाखों छोटे, सीमांत और पारंपरिक मछुआरों को मिल रहा है, जिनकी आय और रोजगार के अवसर बढ़े हैं।
मत्स्य विभाग के संयुक्त सचिव सागर मेहरा ने सम्मेलन की शुरुआत करते हुए कहा कि भारत का मत्स्य उत्पादन और समुद्री निर्यात लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार खाद्य सुरक्षा, गुणवत्ता प्रमाणन और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप निर्यात सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उनका कहना था कि आज दुनिया भारतीय समुद्री उत्पादों से सिर्फ मात्रा नहीं, बल्कि गुणवत्ता और पारदर्शिता की उम्मीद कर रही है।
आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में भारत का समुद्री खाद्य निर्यात 16.98 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया, जिसकी कुल कीमत करीब 62,408 करोड़ रुपये यानी लगभग 7.45 अरब डॉलर रही। यह भारत के कुल कृषि निर्यात का लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा है। भारत इस समय दुनिया का छठा सबसे बड़ा समुद्री खाद्य निर्यातक बन चुका है।
सम्मेलन में यह भी चर्चा हुई कि वैश्विक बाजार तेजी से बदल रहा है। अब उपभोक्ता सिर्फ सस्ती मछली नहीं चाहते, बल्कि वे प्रमाणित, टिकाऊ स्रोतों से प्राप्त, सुरक्षित और पोषण से भरपूर समुद्री उत्पादों की मांग कर रहे हैं। उत्तरी अमेरिका, यूरोप और पूर्वी एशिया में मछली आधारित प्रोटीन की खपत लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही रेडी-टू-कुक, रेडी-टू-ईट, फंक्शनल फूड और हेल्थ बेस्ड सीफूड उत्पादों की मांग भी तेज़ी से बढ़ रही है।
इन बदलावों को भारत के लिए एक बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को और मजबूत करे, वैल्यू एडिशन पर ज्यादा ध्यान दे, अलग-अलग प्रजातियों का उत्पादन बढ़ाए और आधुनिक प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी अपनाए, तो वह वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी को और बढ़ा सकता है।