ईरान युद्ध का असर: DAP-यूरिया के दाम आसमान पर, सप्लाई अटकी, खेती पर संकट
पश्चिम एशिया में जारी ईरान से जुड़े युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने का असर अब भारत की खेती पर साफ दिखने लगा है। खाद की कीमतों में तेज उछाल और सप्लाई चेन में बाधा ने कृषि क्षेत्र के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है। हालात ऐसे हैं कि खरीफ सीजन किसी तरह संभल सकता है, लेकिन असली संकट रबी सीजन में सामने आने की आशंका जताई जा रही है। आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ दो महीनों में यूरिया की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं, जिससे किसानों और सरकार दोनों की चिंता बढ़ गई है।
खाद की कीमतों में भारी उछाल, सप्लाई पर असर
भारतीय पोटाश लिमिटेड के 2.5 मिलियन टन यूरिया आयात के टेंडर में कीमतें 935 से 959 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गईं, जबकि फरवरी में यही कीमत 508-512 डॉलर प्रति टन थी। इसी तरह डीएपी की कीमत भी युद्ध से पहले 720 डॉलर से बढ़कर अब 865 से 925 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है। सल्फर, जो खाद बनाने में जरूरी है, उसकी कीमत 550 डॉलर से बढ़कर 900 डॉलर प्रति टन हो गई है, जबकि अमोनिया 435 डॉलर से बढ़कर 850-900 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया है। युद्ध के कारण कतर और सऊदी अरब की कई इकाइयां बंद हो गई हैं, जिससे भारत को अब इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों से आयात करना पड़ रहा है।
खरीफ सीजन पर दबाव, यूरिया की कमी का खतरा
केंद्र सरकार के अनुमान के मुताबिक खरीफ 2026 के लिए यूरिया की कुल जरूरत 19.4 मिलियन टन है, जबकि अप्रैल की शुरुआत में उपलब्धता सिर्फ 5.5 मिलियन टन थी। भारत हर साल करीब 39-40 मिलियन टन यूरिया इस्तेमाल करता है, जिसमें से 30-31 मिलियन टन देश में बनता है और बाकी 9-10 मिलियन टन आयात किया जाता है। लेकिन गैस की सप्लाई प्रभावित होने से मार्च में उत्पादन घटकर 1.5 मिलियन टन रह गया, जबकि सामान्य स्थिति में यह 2.5 मिलियन टन होता है। अप्रैल में भी उत्पादन 1.7-1.8 मिलियन टन के आसपास रहने का अनुमान है, जिससे सप्लाई और मांग के बीच अंतर बढ़ सकता है।
रबी सीजन में बड़ा संकट, विकल्पों की तला
विशेषज्ञों का मानना है कि खरीफ सीजन किसी तरह निकल सकता है, लेकिन रबी सीजन में खाद की कमी गंभीर समस्या बन सकती है। भारत में कुल खाद खपत का करीब 55% हिस्सा यूरिया का है, जबकि डीएपी 9-9.5 मिलियन टन और एनपीके मिश्रित खाद 14 मिलियन टन के आसपास है। ऐसे में सरकार और कंपनियां वैकल्पिक विकल्पों पर विचार कर रही हैं, जैसे ट्रिपल सुपर फॉस्फेट (TSP) और मोनो अमोनियम फॉस्फेट (MAP) का उपयोग बढ़ाना, जिससे डीएपी पर निर्भरता कम हो सके।
समाधान की दिशा: नई तकनीक और बायोस्टिमुलेंट्स
खाद संकट से निपटने के लिए नई तकनीकों पर भी जोर दिया जा रहा है। कंपनियां यूरिया और डीएपी में सूक्ष्म पोषक तत्व (जैसे जिंक, आयरन, सल्फर) मिलाकर उनकी दक्षता बढ़ाने का सुझाव दे रही हैं, जिससे कम मात्रा में ज्यादा उत्पादन मिल सके। इसके अलावा बायोस्टिमुलेंट्स—जो सूक्ष्म जीवों और प्राकृतिक तत्वों से बने होते हैं—का इस्तेमाल बढ़ाने पर भी जोर है। ये पौधों की पोषक तत्वों को उपयोग करने की क्षमता बढ़ाते हैं, जिससे खाद की जरूरत कम हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संकट भारत के लिए खेती में तकनीकी बदलाव और टिकाऊ विकल्प अपनाने का अवसर भी बन सकता है।