Jodhpuri Mojari में जिंदा है राजस्थान की विरासत, 300 साल पुरानी परंपरा को संजोए हुए हैं मोहनलाल गुर्जर

Gaon Connection | Mar 09, 2026, 16:06 IST
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Mohan Lal Gujjar की कहानी राजस्थान की सदियों पुरानी कारीगरी को जीवित रखने की कहानी है। Jodhpur में उनका परिवार करीब 300 सालों से पारंपरिक जोधपुरी मोजरी बनाने का काम कर रहा है। पूरी तरह हाथ से बनने वाली इन मोजरियों में पारंपरिक डिज़ाइन के साथ आधुनिक सोच का मेल दिखाई देता है। इस काम से गाँव की सैकड़ों–हजारों महिलाएँ भी जुड़ी हैं और उन्हें रोजगार मिल रहा है। राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित मोहनलाल गुर्जर न सिर्फ इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा के जरिए इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने में भी लगे हैं। पढ़िए अपनी मिट्टी, अपनी कला से जुड़ाव की कहानी।
जोधपुर की मशहूर मोजरी

Jodhpur की गलियों में आज भी ऐसी कारीगरी जिंदा है जो सदियों से चली आ रही है। कल्पना कीजिए एक ऐसे परिवार की, जो लगभग 300 सालों से एक ही कला को साधना की तरह निभाता आ रहा हो—वही काम, वही तपस्या, वही कारीगरी। जोधपुर के रहने वाले Mohan Lal Gujjar इसी परंपरा के ध्वजवाहक हैं, जो पारंपरिक जोधपुरी मोजरी यानी जूतियाँ बनाते हैं और इस काम को एक कला का रूप दे चुके हैं।



मोहनलाल गुर्जर का परिवार पीढ़ियों से इस काम से जुड़ा रहा है। उनकी माँ को भी इसी कारीगरी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। समय के साथ मोहनलाल ने इस पारंपरिक काम में नए डिज़ाइन, नई तकनीक और आधुनिक सोच को जोड़ा है, जिसकी वजह से आज उनकी बनाई मोजरी देश ही नहीं, विदेशों तक पहचानी जाती है।



पूरी तरह हाथ से बनती है जोधपुरी मोजरी

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मोहनलाल गुर्जर बताते हैं कि जोधपुरी मोजरी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह हाथ से बनाई जाती है। मोहनलाल गुर्जर कहते हैं, “हम मोजरी का काम करते हैं, जोधपुरी जूती बनाते हैं। इसकी खासियत यह है कि यह पूरी तरह हैंडमेड होती है। इसमें चमड़े के अलावा किसी और चीज का इस्तेमाल नहीं किया जाता। यह बहुत सॉफ्ट और आरामदायक होती है। इसे मोड़कर रखा जा सकता है, इसलिए जोधपुर में इसे ‘पॉकेट मोजरी’ भी कहा जाता है।”



माँ से सीखा हुनर, अब अगली पीढ़ी तक पहुँचा

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इस कारीगरी की शुरुआत मोहनलाल ने बचपन में अपनी माँ से सीखी थी। परिवार में यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है और अब उनके बच्चे भी इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं। मोहनलाल कहते हैं, “यह हमारा पुश्तैनी काम है। मैंने अपनी माताजी से सीखा और उन्होंने अपनी माताजी से। लेकिन हमने कभी नहीं सोचा कि यह काम सिर्फ हमारे परिवार तक ही सीमित रहे। इसलिए हमने गुरु-शिष्य परंपरा के तहत कई लोगों को यह काम सिखाया, ताकि यह कला खत्म न हो।”



हजारों महिलाओं को मिल रहा रोजगार

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आज इस कारीगरी से बड़ी संख्या में कारीगर जुड़े हुए हैं। खास बात यह है कि इसमें गाँव की महिलाएं भी बड़ी संख्या में काम कर रही हैं। मोहनलाल के बेटे Vikas Gujjar बताते हैं कि मोजरी पर कढ़ाई और सिलाई का काम बेहद बारीकी से किया जाता है। विकास गुर्जर कहते हैं, “हम जोधपुरी जूती यानी मोजरी पर एंब्रॉयडरी और सिलाई का काम करते हैं। इस क्राफ्ट से लगभग 1500 से 2000 महिलाएं जुड़ी हुई हैं। मैंने यह काम अपने पिताजी और दादाजी के साथ मिलकर सीखा है और अब इसे आगे बढ़ाना चाहता हूं।”



राजाओं के दौर से जुड़ी है यह परंपरा

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मोहनलाल गुर्जर बताते हैं कि उनके समुदाय का इतिहास भी इस कारीगरी से जुड़ा हुआ है। पहले उनके पूर्वज राजाओं के समय में घोड़ों की जीन बनाने का काम करते थे, जो चमड़े से तैयार होती थी। वे बताते हैं, “हमारी कम्युनिटी जीनगर कहलाती है। पहले हम राजा-महाराजाओं के समय में घोड़ों की जीन बनाते थे। करीब 300–400 साल पहले से यह काम करते आ रहे हैं। धीरे-धीरे यह काम मोजरी बनाने के रूप में बदल गया।”



परंपरा के साथ आधुनिकता का मेल

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मोहनलाल गुर्जर सिर्फ पारंपरिक तरीके से ही काम नहीं करते, बल्कि इस कला को आगे बढ़ाने के लिए नए डिज़ाइन और आधुनिक सोच भी अपनाते हैं। उनकी बनाई मोजरी, बैग और बेल्ट में राजस्थान की शाही झलक दिखाई देती है। उनकी कारीगरी को देश ने भी सराहा है और उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार तथा नेशनल मेरिट सर्टिफिकेट से सम्मानित किया जा चुका है। आज मोहनलाल गुर्जर के साथ कई कारीगर काम कर रहे हैं—कुछ बुजुर्ग हैं और कुछ नई पीढ़ी के युवा। वे इस कला को सिखाने के लिए प्रशिक्षण भी देते हैं। मोहनलाल कहते हैं, “मैंने कई लोगों को 40 दिन से लेकर तीन महीने तक की ट्रेनिंग देकर यह काम सिखाया है। भारत के कई फैशन इंस्टिट्यूट जैसे NIFT और FDDI के छात्र भी यहां सीखने आते हैं। विदेशों से भी लोग इस कारीगरी को समझने के लिए हमारे पास आते हैं।”



हर मोजरी में बसती है जोधपुर की आत्मा

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मोहनलाल गुर्जर की बनाई हर मोजरी में सिर्फ चमड़ा और धागा ही नहीं होता, बल्कि उसमें जोधपुर की मिट्टी, संस्कृति और इतिहास भी जुड़ा होता है। जब कोई व्यक्ति उनकी बनाई मोजरी पहनता है तो वह सिर्फ एक जूती नहीं पहनता, बल्कि उस परंपरा का हिस्सा बन जाता है जो पीढ़ियों से गाँव की गलियों में जिंदा है। यह कहानी सिर्फ एक कारीगर की नहीं, बल्कि उस विरासत की है जो हर धागे और हर टांके में सांस लेती है और जो आने वाली पीढ़ियों तक भी इसी तरह चलती रहेगी।

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