Gaon Se: आदीवासी कला के जीवंत उदाहरण मांगीलाल भील मोरपंखों पर सजा रहे हैं भील पेंटिंग

Gaon Connection | Mar 20, 2026, 18:08 IST
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राजस्थान के उदयपुर के मांगीलाल भील, मोरपंख पर भील पेंटिंग की अनूठी कला को जीवंत कर रहे हैं। उनकी मेहनत ने न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार किया है, बल्कि उन्हें समाज में एक नई पहचान भी दी है। वे इस कला को अपने बच्चों को सिखाकर भील पेंटिंग की कला को जिंदा बनाए रखने की ठान चुके हैं। पढ़िए मांगीलाल कलाकार की ये कहानी।
भारत के आदिवासियों की भील पेंटिंग

भारत के आदिवासियों का संसार अद्भुत है। उनकी कहानियाँ, उनका जीवन, ज़िंदगी को देखने का उनका नज़रिया उनकी कलाओं में दिखता है। ये कलाएँ अक्सर बाकी देश तक पहुँचती नहीं। इसलिए यह जिम्मेदारी है हम जैसे डाकियों की, कि भारत के आदिवासियों, भारत की जनजातियों की कलाओं के बारे में आपको बताएँ।



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राजस्थान के उदयपुर में मांगीलाल भील ऐसे ही एक कलाकार हैं। वो चित्रकार हैं और अपने समाज, अपनी परंपराओं, अपने जीवन को लगातार कला में उतारते रहे हैं। उनकी खासियत है मोरपंख पर कलाकारी करना। उदयपुर की वो गलियाँ जिनकी दीवारों पर रंग बोलते हैं, कहानियां सांस लेती हैं और उन्हीं रंगों में पिछले 22 सालों से एक नाम घुला है मांगीलाल भील।



एक मोड़ ने पलट दी ज़िंदगी

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भील painting उनके लिए हुनर भी है और इश्क भी। कभी किसी मंदिर की दीवार पर, कभी हवेली के आंगन में मांगीलाल के रंगों ने परंपरा को जिया है, सहेजा है। लेकिन ज़िंदगी की कहानी तभी दिलचस्प होती है जब कोई मोड़ आता है। ऐसा ही एक रोचक मोड़ आया corona के वक्त। सब कुछ ठहर गया। लेकिन एक कलाकार को कौन रोक पाया है भला? मांगीलाल भील बताते हैं, "भील painting हम जो हमारे देवी देवता हैं, जो हमारे प्रमुख नृत्य है, उसके आधार पर बनाते हैं और यह भील जनजाति द्वारा बनाई जाती है। इसलिए इसको हम भील painting कहते हैं।"



पहली बार जब बनाई पेंटिंग

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एक दिन वो घर के पीछे की पहाड़ी पर गए। वहाँ मिला एक मोरपंख और फिर उसी पर उन्होंने पहली बार भील चित्रकला को उतारा। न ब्रश बदला, न रंग। बस कैनवास बदल गया और यहीं से उनकी कहानी ने नई उड़ान भरी। उस एक painting ने उनकी जिंदगी बदल दी। पहचान मिली, सम्मान मिला और आमदनी चार गुना बढ़ गई।



पिता की विरासत को देना है नया रूप

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बहुत कम बच्चे होते हैं जो अपनी बड़े-बुजुर्गों की विरासत में दिलचस्पी लेते हैं, उसे आगे बढ़ाने के बारे में सोचते हैं, लेकिन मांगीलाल के पुत्र ऋषभ की सोच बिल्कुल अलग है। ऋषभ गाँव कनेक्शन को बताते हैं, "मेरे पापा बहुत अच्छी drawing बनाते हैं। मैं उनसे सीख भी रहा हूँ और उन्होंने दीवारों पर जो drawings लगाई हुईं हैं, उसके लिए हम मोर के पंख पर लेकर आए हैं। बहुत unique concept है ये। पर मैं अपनी अलग पहचान बनाना चाहता हूँ। अलग drawings और अलग चीजों के साथ।"



पंखों के ज़रिए भरी उड़ान

मांगीलाल गाँव में वो पहले शख्स बने जो हवाई जहाज में बैठे और फिर मोरपंख पर ही क्यों रुकते? उन्होंने पीपल के पत्तों से लेकर उन्होंने अलग अलग माध्यमों पर अपनी कला को उतार दिया। जिस कला को कभी दीवारों तक सीमित समझा गया था, उसे नया आसमान देने का काम मांगीलाल ने किया। अपने कला को याद करते हुए मांगीलाल कहते हैं, जो कच्चे घर थे, उन पर मेरी मम्मी, मेरी दादी मिट्टी से लेप कर उस पर लकड़ी की फुलिका से कुछ न कुछ बनाते थे। मोर बना दिया, तोता बना दिया, चिड़िया बना दी। मैंने साथ में रहकर उसको देखा। ये ऐसे ऐसे बनाते हैं तो मैं भी थोड़ा थोड़ा सा बनाने लगा।



टीवी पर देखकर खुश होता है परिवार

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मांगीलाल अपनी बनाई हुई पेंटिंग को दिखाते हुए बताते हैं कि "इसमें हमारे समाज का एक प्रमुख नृत्य है गवरी, जो राखी के एक दिन बाद शुरू होता है और नवरात्र शुरू होने से पहले खत्म हो जाता है। यह सवा महीने का नृत्य होता है। उसमें हम जो किरदार निभाते हैं, वो सारी चीजें हम कैनवास पर उकेरते हैं। इसने मेरी आर्थिक स्थिति को बिल्कुल सुधार दिया है। बहुत अच्छा कर दिया है और पहले कुछ काम भी करते थे तो सौ, दो सौ, तीन सौ रुपये ही मिल पाते थे और समाज में भी कलाकार है। यह चित्र बनाता है उसका कोई मायने नहीं था। लेकिन आज जब लोग मुझे अखबारों में देखते हैं, न्यूज़ चैनल में देखते हैं और टीवी पर देखते हैं तो मेरे माता पिता भी खुश होते हैं, मेरा समाज भी खुश होता है।"



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आज वो न सिर्फ painting बना रहे हैं बल्कि नई पीढ़ी को सिखा भी रहे हैं ताकि ये रंग, ये कहानियाँ कभी फीकी ही न पड़े।

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