BAFTA 2026: मणिपुरी फिल्म 'बूंग' ने जीता BAFTA अवार्ड, बच्चों के नज़रिए से ये 5 फिल्में ज़रूर देखें

Gaon Connection | Feb 23, 2026, 19:13 IST

फरहान अख्तर के प्रोडक्शन हाउस द्वारा निर्मित मणिपुरी फिल्म 'बूंग' ने 2026 में ब्रिटिश एकेडमी फिल्म अवार्ड्स में बेस्ट चिल्ड्रन्स एंड फैमिली फिल्म का पुरस्कार जीतकर भारत को गर्व से भर दिया है। यह फिल्म एक युवा लड़के के साहसिक सफर की कहानी है, जो अपने पिता को खोजते हुए निकलता है।

<p>Boong/बूंग<br><br></p>

फरहान अख्तर के प्रोडक्शन हाउस के तहत बनी मणिपुरी भाषा की फिल्म ‘बूंग’ ने 2026 में British Academy Film Awards के मंच पर एक खास उपलब्धि हासिल की। ‘बूंग’ को Best Children’s & Family Film के कैटेगरी में BAFTA मिला। यह फिल्म न सिर्फ भारत के लिए गर्व की बात बनी, बल्कि यह दिखाती है कि स्थानीय-क्षेत्रीय कहानियाँ भी दुनिया के सबसे बड़े फिल्म मंचों पर पहचान पा सकती हैं।



क्या है बूंग/Boong की कहानी



‘बूंग’ एक छोटे से मणिपुरी गाँव में रहने वाले नन्हे लड़के की कहानी है, जिसका नाम भी बूंग है, जिसका मतलब स्थानीय बोली में “छोटा लड़का” होता है। बूंग की दुनिया तब उलट जाती है, जब उसके पिता रोज़गार की तलाश में घर से बाहर जाते हैं और फिर कभी लौटकर नहीं आते। घर में सवाल हैं, माँ की आँखों में इंतज़ार है और बच्चे के मन में डर। बूंग मानता है कि अगर वह अपने पिता को ढूंढ लाए, तो वही उसकी माँ के लिए सबसे बड़ा तोहफा होगा। इसी उम्मीद के सहारे वह अपने एक दोस्त के साथ लंबी और मुश्किल यात्रा पर निकल पड़ता है। यह सफ़र सिर्फ़ पिता की तलाश नहीं है, बल्कि बूंग के बचपन से समझदारी की ओर बढ़ने की कहानी भी है, जहाँ वह अकेलापन, हिम्मत, भरोसा और ज़िंदगी की सच्चाई को बहुत कम उम्र में समझने लगता है। यह फिल्म उन हज़ारों ग्रामीण परिवारों की चुप कहानी कहती है, जहाँ कमाने के लिए गया कोई अपना अक्सर लौटकर नहीं आता, और पीछे रह जाते हैं सवाल, इंतज़ार और अधूरे सपने।



किस वजह से यह जीत खास है?

‘बूंग’ को Best Children’s & Family Film के कैटेगरी में BAFTA मिला और यह जीत बड़े-बड़े हॉलीवुड ब्लॉकबस्टर जैसे ‘Lilo & Stitch’ और ‘Zootopia 2’ को पीछे छोड़कर आई। ये दिखाता है कि सीधे दिल को छू लेने वाली कहानी, सच्चे भाव और स्थानीय जीवन की जड़ों से जुड़ा चित्रण, ग्लोबल स्तर पर भी कितना प्रभाव डाल सकता है।



क्या कहा निर्माताओं ने?

फरहान अख्तर, जो फिल्म के प्रोड्यूसर हैं, के साथ को-प्रोड्यूसर और टीम ने माना कि यह जीत भारत के उन अनसुने और कम पहचाने क्षेत्रों की आवाज़ के लिए है। उन्होंने कहा कि फिल्म बनाते समय कहानी को बड़े दिल से लिया गया — इसे बड़े बजट से नहीं, बल्कि दिल की सच्चाई से बनाया गया।



बच्चों की नज़र से भारत

यहाँ बच्चों के नज़रिए से बनी 5 ऐसी फिल्में हैं, जो सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि समाज के अहम मुद्दों को भी बेहद सादगी से सामने रखती हैं जैसे-



तारे ज़मीन पर



यह फिल्म एक ऐसे बच्चे की कहानी है जिसे पढ़ने-लिखने में दिक्कत होती है, लेकिन कोई उसकी परेशानी समझ नहीं पाता। घर और स्कूल में उसे “नालायक” कहा जाता है, जबकि असल में वह डिस्लेक्सिया से जूझ रहा होता है। फिल्म बताती है कि हर बच्चा अलग होता है और अगर समय पर समझ और सहारा मिल जाए, तो वही बच्चा अपनी पहचान बना सकता है। यह कहानी शिक्षा व्यवस्था और माता-पिता—दोनों से सवाल करती है (इसे Netflix पर देख सकते हैं।)



स्टेनली का डब्बा



स्टेनली एक मासूम बच्चा है, जो रोज़ स्कूल बिना टिफिन के आता है, लेकिन इसकी असली वजह कोई नहीं जानता। फिल्म बच्चों की दुनिया, दोस्ती और गरीबी को बहुत चुपचाप दिखाती है। बिना किसी बड़े भाषण के यह कहानी बताती है कि कई बच्चे हालात की वजह से भूखे रहते हैं, लेकिन अपनी इज़्ज़त और मुस्कान बचाए रखते हैं। यह फिल्म संवेदनशीलता सिखाती है। (इसे YouTube पर देख सकते हैं।)



धनक



राजस्थान की पृष्ठभूमि में बनी यह फिल्म एक छोटी लड़की और उसके नेत्रहीन भाई की यात्रा की कहानी है। बहन को भरोसा है कि अगर वह अपने भाई को उसके पसंदीदा हीरो से मिलवा देगी, तो उसकी आँखों की रोशनी लौट आएगी। यह फिल्म बच्चों की उम्मीद, भरोसे और भाई-बहन के रिश्ते को बेहद खूबसूरती से दिखाती है। कम संवाद, ज़्यादा एहसास—यही इसकी ताकत है। (इसे YouTube पर देख सकते हैं।)



आई एम कलाम



यह फिल्म एक गरीब बच्चे की कहानी है, जो पढ़ना चाहता है और देश के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से प्रेरित है। हालात उसके खिलाफ हैं—काम करना ज़रूरी है, पढ़ाई लग्ज़री मानी जाती है। लेकिन बच्चा हार नहीं मानता। यह कहानी बताती है कि सपने अमीर-गरीब नहीं देखते, और अगर हौसला हो तो रास्ता निकल ही आता है। (इसे Prime/YouTube पर देख सकते हैं।)



चिल्लर पार्टी



यह फिल्म बच्चों की एक टोली की कहानी है, जो अपने दोस्त और एक आवारा कुत्ते के हक़ के लिए सिस्टम से टकरा जाती है। बच्चे मासूम हैं, लेकिन उनका सवाल सीधा है—गलत क्यों सही माना जाए? फिल्म लोकतंत्र, आवाज़ उठाने और सामूहिक ताकत को बच्चों की भाषा में समझाती है। यह दिखाती है कि बदलाव की शुरुआत छोटे कदमों से होती है। (इसे YouTube पर देख सकते हैं।)

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