क्या हिंदूकुश हिमालय का पिघलता 'थर्ड पोल' एशिया को विनाश की ओर धकेल रहा है?

Gaon Connection | Mar 23, 2026, 14:46 IST
हिंदूकुश पर्वत के ग्लेशियर अपने तेज गति से पिघलने के कारण चिंताजनक स्थिति में हैं। पिछले 20 वर्षों में पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो गई है। इससे गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी महत्वपूर्ण नदियों का जलस्तर प्रभावित होगा, जो करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर विपरीत प्रभाव डालेगा।
पिघल रहा है हिंदकुश ग्लेशियर

हिंदूकुश हिमालय (HKH) क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की दर साल 2000 के बाद से दोगुनी हो गई है, जो जलवायु परिवर्तन का एक गंभीर संकेत है। यह स्थिति एशिया की प्रमुख नदियों के जल प्रवाह को प्रभावित कर रही है, जिससे करोड़ों लोगों के जीवन, पानी की उपलब्धता और खेती पर सीधा खतरा मंडरा रहा है। इस क्षेत्र को पृथ्वी का तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है क्योंकि यहां ध्रुवों के बाद सबसे अधिक बर्फ जमा है।



ICIMOD की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, 1990 से 2020 के बीच, यानी केवल 30 वर्षों में, 12 प्रतिशत ग्लेशियरों का कुल क्षेत्र गायब हो चुका है। 4500 से 6000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित 78 प्रतिशत ग्लेशियर अब सबसे अधिक खतरे में हैं, क्योंकि इन क्षेत्रों में तापमान तेजी से बढ़ रहा है।



थर्ड पोल क्यों कहते हैं इस क्षेत्र को?

हिंदूकुश हिमालय को पृथ्वी का थर्ड पोल भी कहा जाता है क्योंकि यहां ध्रुवों के बाद सबसे ज्यादा बर्फ जमा है। यहां से निकलने वाली नदियां जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु एशिया की कई बड़ी नदियां हैं। ये नदियां लगभग दो अरब लोगों को पानी देती हैं। अगर ग्लेशियर तेजी से पिघलते रहे तो इन नदियों में पानी का बहाव पहले बढ़ेगा, फिर बहुत कम हो जाएगा। इससे भविष्य में पानी का संकट गहरा हो सकता है।



ग्लेशियर कितने हैं और कितना नुकसान हुआ?

इस क्षेत्र में कुल 63700 ग्लेशियर हैं जो 55782 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1990 से 2020 के बीच यानी सिर्फ 30 साल में 12 प्रतिशत ग्लेशियर का कुल इलाका गायब हो चुका है। 4500 से 6000 मीटर ऊंचाई वाले 78 प्रतिशत ग्लेशियर अब सबसे ज्यादा खतरे में हैं क्योंकि यहां तापमान तेजी से बढ़ रहा है।



GLOF का खतरा बढ़ रहा है, बाढ़ और भूस्खलन का डर

ग्लेशियर सिकुड़ने से ग्लेशियल झीलें बन रही हैं। ये झीलें कभी भी फट सकती हैं। इसे ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड - GLOF कहते हैं। इससे अचानक भारी बाढ़, भूस्खलन और दूसरे प्राकृतिक खतरे बढ़ रहे हैं। खेती, बिजली बनाने वाली परियोजनाएं और जंगलों की वैराइटी भी प्रभावित हो रही है। गर्मियों और मानसून के समय यह समस्या और ज्यादा दिखाई देगी।



सदी के अंत तक क्या होगा?

ICIMOD के वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग इसी रफ्तार से जारी रही तो इस सदी के अंत तक यहां के 70-80 प्रतिशत ग्लेशियर गायब हो सकते हैं। लेकिन अगर दुनिया भर का तापमान बढ़ना 1.5 डिग्री सेल्सियस तक ही सीमित रखा जाए तो नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।



सरकारों और दुनिया से क्या अपील?

रिपोर्ट में सरकारों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तुरंत कदम उठाने की अपील की गई है। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करना, बेहतर निगरानी सिस्टम बनाना और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए रणनीतियां बनाना जरूरी है।



ICIMOD के निदेशक पेमा गिमस्थो ने कहा कि अब यह समस्या रीयल टाइम की है और पूरी दुनिया पर इसका असर पड़ेगा। यह रिपोर्ट एक बड़ी चेतावनी है। हिंदूकुश हिमालय में ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो गई है। अगर हमने समय रहते ग्रीनहाउस गैसें कम नहीं कीं तो पानी, खेती, पर्यावरण और करोड़ों लोगों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा।

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