Olive Ridley कछुओं की समुद्री यात्रा अब होगी रिकॉर्ड, तमिलनाडु में शुरू हुई पहली वैज्ञानिक ट्रैकिंग पहल
इस पहल का उद्देश्य कछुओं की समुद्री यात्रा, भोजन क्षेत्रों और ख़तरनाक इलाकों की वैज्ञानिक पहचान करना है। इससे कछुआ संरक्षण, जिम्मेदार मछली पकड़ने और तटीय जैव विविधता को सुरक्षित करने में मदद मिलेगी।
चेन्नई के समुद्री किनारे बसे बेसेंट नगर से एक ऐसी वैज्ञानिक पहल की शुरुआत हुई है, जो भारत में समुद्री जीव संरक्षण के इतिहास में मील का पत्थर मानी जा सकती है। Olive Ridley समुद्री कछुओं पर देश का पहला टेलीमेट्री अध्ययन और फ्लिपर टैगिंग कार्यक्रम आज सुबह तड़के शुरू किया गया।
यह काम तमिलनाडु वन विभाग के नेतृत्व में, वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII), एडवांस्ड इंस्टीट्यूट फॉर वाइल्डलाइफ कंज़र्वेशन (AIWC) और SSTN चेन्नई के सहयोग से किया जा रहा है।
अब तक Olive Ridley कछुओं के संरक्षण की चर्चा ज़्यादातर उनके अंडे देने तक ही सीमित रहती थी। हर साल जब ये कछुए तमिलनाडु, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटों पर अंडे देने आते हैं, तब स्वयंसेवक और वन विभाग मिलकर अंडों की सुरक्षा करते हैं, हैचरी में उन्हें सुरक्षित रखते हैं और फिर बच्चों को समुद्र में छोड़ देते हैं। लेकिन इसके बाद कछुओं का क्या होता है, वे समुद्र में कहाँ जाते हैं, किन रास्तों से सफ़र करते हैं, कहाँ भोजन करते हैं और किन इलाकों में सबसे ज़्यादा ख़तरे झेलते हैं। इन सवालों के जवाब अब तक अनुमान पर आधारित थे।
यही वह खाली जगह है जिसे यह नया अध्ययन भरने जा रहा है। इस परियोजना के तहत कुछ Olive Ridley कछुओं के फ्लिपर यानी पंख जैसे पैरों पर पहचान टैग लगाए गए हैं, और कुछ कछुओं पर सैटेलाइट ट्रैकिंग डिवाइस भी लगाए गए हैं। इन उपकरणों की मदद से वैज्ञानिक यह देख पाएँगे कि कछुए समुद्र में किस दिशा में जाते हैं, कितनी दूरी तय करते हैं, किस मौसम में कहाँ रुकते हैं और किन इलाकों को बार-बार चुनते हैं।
यह जानकारी इसलिए भी बेहद अहम है क्योंकि Olive Ridley कछुए समुद्र में कई तरह के ख़तरों से घिरे रहते हैं। मछली पकड़ने के जालों में फँसना, प्लास्टिक और कचरा निगल लेना, तेज़ जहाज़ी गतिविधियाँ और तटीय इलाकों का तेज़ी से विकास, ये सभी उनके जीवन के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। कई बार मछुआरों को यह भी पता नहीं होता कि वे जिन इलाकों में जाल डाल रहे हैं, वही कछुओं के भोजन क्षेत्र या यात्रा मार्ग हैं। ऐसे में टेलीमेट्री से मिलने वाला डेटा बेहद उपयोगी साबित होगा।
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इस अध्ययन से मिले आँकड़ों के आधार पर यह तय किया जा सकेगा कि कौन-से समुद्री क्षेत्र कछुओं के लिए सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं। इससे सरकार और संबंधित एजेंसियाँ सुरक्षित समुद्री ज़ोन, मौसमी मछली पकड़ने के प्रतिबंध, और कछुआ-मित्र मछली पकड़ने की तकनीक को बढ़ावा दे सकेंगी। इसका सीधा फायदा कछुओं के साथ-साथ मछुआरों को भी होगा, क्योंकि लंबे समय में इससे समुद्री संसाधनों का संतुलन बना रहेगा।
Olive Ridley कछुए सिर्फ़ एक प्रजाति नहीं हैं, बल्कि वे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का अहम हिस्सा हैं। ये समुद्र में जेलीफ़िश जैसी प्रजातियों की संख्या को नियंत्रित रखते हैं और समुद्री खाद्य श्रृंखला के संतुलन में मदद करते हैं। अगर इनकी संख्या घटती है, तो उसका असर पूरे समुद्री तंत्र पर पड़ सकता है, जिसका सीधा असर इंसानों पर भी होगा।
तमिलनाडु के तट खासतौर पर Olive Ridley कछुओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। हर साल सैकड़ों कछुए यहाँ अंडे देने आते हैं, लेकिन शहरीकरण, रोशनी का बढ़ता प्रदूषण और समुद्र तटों पर मानवीय गतिविधियाँ इनके लिए मुश्किलें बढ़ा रही हैं। ऐसे में यह वैज्ञानिक पहल न केवल संरक्षण को मज़बूत करेगी, बल्कि यह भी बताएगी कि तट विकास और समुद्री गतिविधियों को कैसे संतुलित किया जाए।
इस परियोजना की एक और खास बात यह है कि यह अनुमान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम है। जब नीति-निर्माण वास्तविक डेटा पर आधारित होता है, तो उसके नतीजे ज़्यादा टिकाऊ और प्रभावी होते हैं। इससे आने वाले समय में भारत के अन्य तटीय राज्यों में भी इसी तरह के अध्ययन शुरू किए जा सकते हैं।
Olive Ridley कछुओं की यह यात्रा अब सिर्फ़ समुद्र तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भारत के समुद्री संरक्षण प्रयासों को नई दिशा देने वाली साबित हो सकती है।
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