Protein Deficiency : उत्तर प्रदेश में प्रोटीन की कमी, बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य पर गंभीर असर, जानें समाधान

Preeti Nahar | Feb 23, 2026, 15:31 IST
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उत्तर प्रदेश एक बड़ा शाकाहारी राज्य माना जाता है। अलग-अलग सर्वे बताते हैं कि यहाँ लगभग 40 से 50 प्रतिशत परिवार शाकाहारी भोजन पर निर्भर हैं। ऐसे में दाल-चावल, रोटी-सब्ज़ी से पेट तो भर जाता है, लेकिन शरीर को जितना प्रोटीन चाहिए, उतना नहीं मिल पाता। यही वजह है कि बच्चों में कुपोषण, लंबाई न बढ़ना और पढ़ाई में कमजोरी जैसी समस्याएँ बनी रहती हैं। जानिए घर पर ही मिलने वाले किन प्रोडक्ट्स से आपको मिल सकता है भरपूर प्रोटीन।

<p>उत्तर प्रदेश में प्रोटीन की कमी<br></p>

Protein Deficiency in Uttar Pradesh: उत्तर प्रदेश में के लोगों में प्रोटीन की कमी एक ऐसी समस्या है, जो दिखती नहीं लेकिन बच्चों, महिलाओं और मेहनतकश लोगों की सेहत को अंदर ही अंदर कमजोर कर देती है। आज भी उत्तर प्रदेश में औसतन एक व्यक्ति करीब 58 ग्राम प्रोटीन ही रोज़ खा पा रहा है, जबकि मेहनत करने वाले व्यक्ति, गर्भवती महिलाएँ और किशोरों को ज़्यादा प्रोटीन की ज़रूरत होती है। प्रोटीन की कमी की वजह से बच्चों में कद न बढ़ना (स्टंटिंग), पढ़ाई में ध्यान की कमी और बार-बार बीमार पड़ने की समस्या देखी जाती है।



प्रोटीन की कमी से सेहत पर असर

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शरीर में दैनिक प्रोटीन की मात्रा कम रहने से हर वर्ग के लोगों की सेहत पर इसका नकारात्मक असर होता है। जैसे महिलाओं में प्रोटीन की कमी से कमजोरी की समस्या होती है। साथ ही शरीर में खून की कमी भी प्रोटीन की कमी के कारण पाई जाती हैा साथ ही खेत-खलिहानों में काम करने वाले किसान हों या फिर बच्चों की सेहत की बात की जाए, हर वर्ग की सेहत बढ़िया हो इसके लिए सही मात्रा में प्रोटीन मिलना बेहद ज़रूरी हो जाता है-



1- बच्चों में कुपोषण की समस्या



2- बौनापन (स्टंटिंग)- संज्ञानात्मक कमी



3- मातृ स्वास्थ्य- प्रसव के समय अधिक कमजोरी और पीड़ा



4- रोग प्रतिरोध क्षमता का कम होना



5- मांंशपेशियाँ कमजोर



6- जल्दी थकान



रोज़ाना कितने प्रोटीन की ज़रूरत?

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उत्तर प्रदेश में औसतन 60–75 किलोग्राम वजन वाले एक वयस्क व्यक्ति को न्यूनतम जीवनशैली में रोज़ लगभग 50–60 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है, जबकि मध्यम रूप से सक्रिय व्यक्ति के लिए यह ज़रूरत 72–120 ग्राम प्रतिदिन और अत्यधिक सक्रिय व्यक्ति के लिए 96–165 ग्राम प्रतिदिन तक पहुँच जाती है।



इसके मुकाबले राज्य में वर्तमान में प्रति व्यक्ति प्रोटीन सेवन ग्रामीण क्षेत्रों में औसतन लगभग 58.3 ग्राम प्रतिदिन है। वहीं शहरी क्षेत्रों में लगभग 58.5 ग्राम प्रतिदिन है। इसका अर्थ यह है कि मौजूदा प्रोटीन सेवन केवल न्यूनतम जीवनशैली की जरूरत को ही किसी तरह पूरा कर पा रहा है, जबकि मेहनत करने वाले वयस्कों, युवाओं और सक्रिय आबादी के लिए रोज़ाना 14 से 60 ग्राम तक अतिरिक्त प्रोटीन की कमी बनी हुई है।



प्रोटीन इनटेक पूरा करने के लिए शाकाहारी लोग क्या खाएँ?

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दूध, दही, छाछ और पनीर जैसे खाद्य पदार्थ शाकाहारी परिवारों के लिए उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन देते हैं। खास बात यह है कि दूध से मिलने वाला प्रोटीन शरीर में जल्दी और बेहतर तरीके से पचता है। अगर रोज़ के भोजन में एक गिलास दूध या एक कटोरी दही को शामिल कर लिया जाए, तो पोषण की स्थिति में साफ सुधार देखा जा सकता है।



- दूध और दुग्ध उत्पादों में प्रोटीन की मात्रा अलग-अलग होती है और हर उत्पाद की अपनी खासियत है।



- 100 मि.ली फूल फैट दूध में लगभग 3.2–3.4 ग्राम प्रोटीन प्रति होता है, जो रोज़मर्रा के संतुलित पोषण के लिए उपयुक्त है।



- मध्यम वसा और कम वसा वाले दूध में भी लगभग 3.3–3.4 ग्राम प्रोटीन मिलता है, लेकिन वसा कम होने के कारण ये उन लोगों के लिए बेहतर हैं जो हल्का आहार चाहते हैं।



- स्किम दूध में वसा लगभग न के बराबर होती है, फिर भी इसमें करीब 3.4 ग्राम प्रोटीन रहता है, जिससे यह कम कैलोरी में अच्छा प्रोटीन देता है।



- प्रति 100 ग्राम दही (कम वसा) में लगभग 5 ग्राम प्रोटीन होता है और किण्वन/Fermentation की वजह से इसका प्रोटीन शरीर में बेहतर तरीके से पचता है।



- पनीर (कॉटेज चीज़) में करीब 11 ग्राम प्रोटीन होता है, जो उच्च गुणवत्ता का दूध प्रोटीन है और मांसपेशियों के लिए उपयोगी माना जाता है।



- प्रति 100 ग्राम चेडर चीज़ में लगभग 25 ग्राम प्रोटीन मिलता है , ये सबसे बढ़िया स्रोत प्रोटीन के लिए। इसलिए ये थोड़ी मात्रा में ही ज़्यादा प्रोटीन देता है।



- कंडेन्स्ड दूध में करीब 8 ग्राम प्रोटीन होता है, लेकिन इसमें शक्कर अधिक होती है।



- मक्खन में प्रोटीन न के बराबर होता है और यह मुख्य रूप से वसा का स्रोत है।



प्रोटीन के लिए अन्य पदार्थ

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साथ ही, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध चना, मूंग, अरहर, सोयाबीन और मूंगफली जैसे खाद्य पदार्थ भी प्रोटीन के अच्छे स्रोत हैं। इनका इस्तेमाल अगर सरकारी पोषण योजनाओं, स्कूल के मिड-डे मील और आंगनवाड़ी कार्यक्रमों में सही ढंग से हो, तो बच्चों का पोषण स्तर काफी बेहतर हो सकता है। उत्तर प्रदेश के लिए पोषण का रास्ता किसी महंगे या आयातित समाधान से नहीं, बल्कि स्थानीय और रोज़मर्रा की चीज़ों से होकर जाता है। दूध, दालें और मोटे अनाज को भोजन का हिस्सा बनाकर कुपोषण से लड़ाई जीती जा सकती है।



स्त्रोत- भारत सरकार सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) – "Nutritional Intake in India (2022–24)" ; WHO मानक प्रोटीन आवश्यक्ता

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