Essential Oil Farming: ऑयल बेस्ड फसलें बदल रहीं पहाड़ी किसानों की किस्मत,
हिमालयी क्षेत्रों में सुगंधित खेती को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल की गई है, जिसने किसानों के लिए नई उम्मीद जगाई है। CSIR-Indian Institute of Integrative Medicine द्वारा चलाई जा रही यह पहल न केवल खेती के स्वरूप को बदल रही है, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में आय के स्थायी साधन भी तैयार कर रही है। CSIR एरोमा मिशन (फेज-III) के अंतर्गत उत्तराखंड के Chamoli District में 55 किसानों के बीच 70,000 क्वालिटी प्लांटिंग मैटेरियल (QPM) के रूप में रोज़मेरी पौधों का वितरण किया गया। इस पहल के जरिए करीब 5 हेक्टेयर क्षेत्र में रोज़मेरी की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे किसानों की आय में बढ़ोतरी की नई संभावनाएँ बन रही हैं।
एरोमा मिशन से खेती को मिलेगी नई दिशा
दरअसल, हिमालयी क्षेत्रों में पारंपरिक खेती लंबे समय से सीमित आय का जरिया रही है। छोटी जोत, कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ और बाजार तक सीमित पहुँच के कारण किसान अक्सर आर्थिक चुनौतियों से जूझते रहे हैं। ऐसे में CSIR एरोमा मिशन जैसी पहलें खेती को नई दिशा दे रही हैं, जहाँ कम क्षेत्र में भी अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। रोज़मेरी जैसी सुगंधित फसलें न केवल कम पानी में उगाई जा सकती हैं, बल्कि इनसे निकलने वाले आवश्यक तेल (Essential Oils) की बाजार में अच्छी माँग भी है।
तकनीकी मार्गदर्शन और बाजार की सही जानकारी की कमी
इस विशेष कार्यक्रम में देवाल ब्लॉक के एक गाँव और थराली ब्लॉक के चार गाँवों को शामिल किया गया। किसानों ने इस पहल में उत्साहपूर्वक भाग लिया और रोज़मेरी जैसी उच्च मूल्य वाली फसल को अपनाने में गहरी रुचि दिखाई। कई किसानों का मानना है कि अगर उन्हें तकनीकी मार्गदर्शन और बाजार की सही जानकारी मिलती रही, तो वे पारंपरिक फसलों से हटकर ऐसी फसलों की ओर तेजी से बढ़ सकते हैं, जो कम लागत में बेहतर लाभ दें।
क्या है CSIR एरोमा मिशन?
CSIR एरोमा मिशन, जिसे केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री Jitendra Singh की परिकल्पना के तहत शुरू किया गया, देशभर में सुगंधित फसलों की खेती, आवश्यक तेल उत्पादन और कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देने का काम कर रहा है। मिशन के पिछले चरणों में भी कई राज्यों में किसानों को इससे लाभ मिला है, जहाँ लैवेंडर, लेमनग्रास और पामारोज़ा जैसी फसलों ने किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।
आगे की बात करें तो इस तरह की पहलें केवल पौधे बाँटने तक सीमित नहीं हैं। इसके तहत किसानों को प्रशिक्षण, प्रोसेसिंग यूनिट से जोड़ने और बाजार उपलब्ध कराने पर भी काम किया जा रहा है। यदि इन प्रयासों को लगातार और व्यापक स्तर पर लागू किया गया, तो आने वाले समय में हिमालयी क्षेत्र सुगंधित खेती और आवश्यक तेल उत्पादन का एक बड़ा हब बन सकता है।
कुल मिलाकर, यह पहल न सिर्फ किसानों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में एक मजबूत कदम है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती देने का काम कर रही है। आने वाले वर्षों में यदि इस मॉडल का विस्तार किया गया, तो यह पहाड़ी किसानों के लिए आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख सकता है।